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वसुधैव कुटुम्बकम के भारतीय दर्शन का जश्न मनाता है पन्ना में पृथ्वी परिक्रमा का उत्सव

प्रकृति के सम्मान और संरक्षण का संदेश देता उत्सव

Realindianews.com

भोपाल। मध्य प्रदेश के पन्ना में प्रणामी धर्मावलम्बियों की पृथ्वी परिक्रमा की अनूठी परम्परा, जो देती है प्रकृति प्रेम की सीख प्रणामी धर्मावलम्बियों के सबसे बड़े तीर्थ पन्ना धाम में पिछले लगभग चार सौ सालों से पृथ्वी परिक्रमा करने की परंपरा चली आ रही है जो आज भी जारी है।
शरद पूर्णिमा के ठीक एक माह बाद कार्तिक पूर्णिमा को पृथ्वी परिक्रमा बुंदेश खण्ड के पन्ना में होती है, जिसमें देश के विभिन्न प्रान्तों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालू पृथ्वी परिक्रमा की एक अनूठी प्राचीन परंपरा में भाग लेने के लिए इक_ा हुए हैं। यह अनुष्ठान वसुधैव कुटुम्बकम के भारतीय दर्शन का जश्न मनाता है, जिसका अर्थ है कि दुनिया एक परिवार है। यह प्रकृति के सम्मान और संरक्षण का संदेश देता है।

धार्मिक आस्थाओं व परम्पराओं को मिलता है पूरा सम्मान
पूरी दुनिया में भारत इकलौता देश है जहाँ सदियों पूर्व बसुधैव कुटुंबकम की उद्घोषणा की गई थी। यह इस देश की खूबसूरती है कि यहां पर विविध धर्मावलम्बियों की धार्मिक आस्थाओं व परम्पराओं को न सिर्फ पूरा सम्मान मिलता है, बल्कि उन्हें पल्लवित और पुष्पित होने का अवसर व अनुकूल वातावरण भी सहज उपलब्ध होता है। यही वजह है कि हमारे देश में हर धर्म और हर जाति के लोगों की अलग-अलग परंपराएं और मान्यताएं मौजूद हैं। ऐसी ही एक अनूठी परंपरा बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना शहर में लगभग चार सौ सालों से चली आ रही है। प्राचीन भव्य मंदिरों के इस शहर पन्ना में प्रणामी धर्मावलम्बियों की आस्था का केंद्र महामती प्राणनाथ जी का मंदिर स्थित है, जो प्रणामी धर्म का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल माना जाता है।

भगवान श्री कृष्ण के उस स्वरूप को खोजते
पूरी परिक्रमा लगभग 30 किमी. की हो जाती है, जिसमें महिला, पुरुष, बच्चे व बुजुर्ग भी बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ शामिल होते हैं। इसी प्रणामी संप्रदाय के अनुयाई और श्रद्धालु शरद पूर्णिमा के ठीक एक माह बाद कार्तिक पूर्णिमा को देश के कोने कोने से यहां पहुंचते हैं। यहाँ किलकिला नदी के किनारे व पहाड़ियों के बीचों बीच बसे समूचे पन्ना नगर के चारों तरफ परिक्रमा लगाकर भगवान श्री कृष्ण के उस स्वरूप को खोजते हैं, जो कि शरद पूर्णिमा की रासलीला में उन्होंने देखा और अनुभव किया है। अंतर्ध्यान हो चुके प्रियतम प्राणनाथ को उनके प्रेमी सुन्दरसाथ भाव विभोर होकर नदी, नालों, पहाड़ों तथा घने जंगल में हर कहीं खोजते हैं। सदियों से चली आ रही इस परम्परा को प्रणामी धर्मावलम्बी पृथ्वी परिक्रमा कहते हैं।

परिक्रमा गाते-बजाते करना सुखद अनुभव
मंदिरों की नगरी पन्ना में पृथ्वी परिक्रमा में भाग लेने के लिए देश के विभिन्न प्रांतों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु (सुन्दरसाथ) पन्ना पहुँचे हैं। पूरे भक्ति भाव और उत्साह के साथ पन्ना पहुंचे ये श्रद्धालु परम्परानुसार पृथ्वी परिक्रमा में भाग लेंगे। अंतर्ध्यान हो चुके प्रियतम प्राणनाथ को उनके प्रेमी सुन्दरसाथ भाव विभोर होकर नदी, नालों, पहाड़ों तथा घने जंगल में हर कहीं खोजते हैं। सदियों से चली आ रही इस परम्परा को प्रणामी धर्मावलम्बी पृथ्वी परिक्रमा कहते हैं। नदी, नालों, पहाड़ों और घने जंगलों से होकर पूरे पन्ना धाम की परिक्रमा गाते-बजाते करना सुखद अनुभव है।

पवित्र नगरी पन्ना का कण-कण प्रेम और आनंद से सराबोर हो उठता
कार्तिक पूर्णिमा को सुबह 6 बजे से ही सैकड़ों फिट गहरे कौआ सेहा से लेकर किलकिला नदी के प्रवाह क्षेत्र व चौपड़ा मंदिर हर कहीं प्राणनाथ प्यारे के जयकारे सुनाई देते हैं। रोमांचित कर देने वाले आस्था एवं श्रद्धा के इस सैलाब से पवित्र नगरी पन्ना का कण-कण प्रेम और आनंद से सराबोर हो उठता है। प्रकृति के निकट रहने और विश्व कल्याण व साम्प्रदायिक सद्भाव की सीख देने वाली इस अनूठी परम्परा को प्रणामी संप्रदाय के प्रणेता महामति श्री प्राणनाथ जी ने आज से लगभग 400 साल पहले शुरू किया था, जो आज भी अनवरत् जारी है। इस परम्परा का अनुकरण करने वालों का मानना है कि पृथ्वी परिक्रमा से उनको सुखद अनुभूति तथा शान्ति मिलती है।

सुबह 6 बजे से हो जाती है तैयारियां
पवित्र नगरी पन्ना में कार्तिक पूर्णिमा को हजारों की संख्या में देश के कोने-कोने से आये सुंदरसाथ व स्थानीय जनों द्वारा पृथ्वी परिक्रमा करने की परंपरा है, जिसका निर्वहन आज भी हो रहा है। कार्तिक शुक्ल की पूर्णमासी पर प्रात: 6 बजे से चारों मंदिरों की परिक्रमा के साथ पृथ्वी परिक्रमा का शुभारम्भ होता है। पूरी परिक्रमा लगभग 30 किमी. की हो जाती है, जिसमें महिला, पुरुष, बच्चे व बुजुर्ग भी बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ शामिल होते हैं।

मंदिर ट्रस्ट की रहती है पूरी व्यवस्था
मंदिर ट्रस्ट व नगरवासियों द्वारा परिक्रमा मार्ग पर जगह – जगह चाय, पानी व खाने का इंतजाम रहता है जिसे श्रद्धालु प्रसाद की तरह ग्रहण करते हैं। परिक्रमा में शामिल लोग रास्ते में बच्चों को टाफियां व मिठाई आदि भी बड़े प्रेम भाव से बांटते हैं तथा गरीबों को पैसा व सामग्री भेंट करते हैं। हजारों की संख्या में श्रद्धालु जिन्हे प्रणामी संप्रदाय में सुन्दरसाथ कहा जाता है वे नाचते गाते, झूमते और तरह – तरह के वाद्य यन्त्र बजाते हुए चलते हैं। जंगल के रास्ते से होते हुये श्रद्धालुओं की टोलियां जब प्राकृतिक व रमणीक स्थल चौपड़ा मंदिर पहुंचतीं तो यहां पर प्रकृति के साथ संबंध स्थापित करते हुये कुछ देर विश्राम कर प्रसाद आदि ग्रहण करतीं हैं और फिर अपनी अल्प थकान को मिटाकर आगे की यात्रा पर निकल पड़तीं हैं।

देश विदेश से शामिल होते हैं सुन्दरसाथ
इस साल पृथ्वी परिक्रमा में गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश तथा मध्यप्रदेश के दमोह, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर, इन्दौर व उज्जैन आदि जिलों से लगभग 10 हजार सुन्दरसाथ पन्ना पहुंचे हैं। पड़ोसी देश नेपाल से भी अनेकों सुन्दरसाथ पृथ्वी परिक्रमा में भाग लेने पन्ना धाम आये हैं। प्रणामी संप्रदाय में किलकिला नदी का वही महत्व है जो हिंदुओं के लिए गंगा नदी का है। यही वजह है कि किलकिला को प्रणामी संप्रदाय की गंगा कहा जाता है।

जयकारों से गूंजता है पूरा इलाका

पृथ्वी परिक्रमा में नदी, पहाड़ और गहरे सेहा से श्रद्धालु जब जयकारे लगाते हुए गुजरते हैं, तब यह नजारा मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है। कौआ सेहा की गहराई, चारो तरफ फैली हरीतिमा तथा जल प्रपात का कर्णप्रिय संगीत और जहाँ-तहाँ चट्टानों पर बैठकर विश्राम करती श्रद्धालुओं की टोली, सब कुछ बहुत ही मनभावन लगता है। पन्ना शहर के निकट से प्रवाहित होने वाली किलकिला नदी जंगल से गुजर कर कौवा सेहा में गिरती है और आगे चलकर केन नदी में मिल जाती है। प्रणामी संप्रदाय में किलकिला नदी का वही महत्व है जो हिंदुओं के लिए गंगा नदी का है। यही वजह है कि किलकिला को प्रणामी संप्रदाय की गंगा कहा जाता है।

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