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मध्यप्रदेश

बालिगों के सहमति वाले रिश्ते पर MP हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, शादी से इनकार को नहीं माना रेप या आत्महत्या के लिए उकसाना

जबलपुर
 मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों के बाद यदि किसी कारणवश शादी नहीं हो पाती या आरोपित शादी से इनकार कर देता है, तो केवल इसी आधार पर उसे दुष्कर्म या आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

कठोर कारावास की सजा निरस्त कर दी
न्यायमूर्ति राजेंद्र कुमार वानी की एकलपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए सीधी जिले के एक आरोपित को दुष्कर्म और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में दोषमुक्त कर दिया व अधीनस्थ अदालत द्वारा सुनाई गई 10-10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा निरस्त कर दी।

क्या था मामला
मामला सीधी जिले का है। अभियोजन के अनुसार 10 फरवरी 2020 को सीधी जिले की रहने वाली युवती बकरियों के लिए चारा और सब्जी लेने घर से निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। इसके दो दिन बाद 12 फरवरी 2020 को उसका शव मझौली थाना क्षेत्र में अरहर के खेत में एक पेड़ से फंदे पर लटका मिला।

पुलिस जांच और डीएनए रिपोर्ट में सामने आया कि मृतका गर्भवती थी और गर्भ में पल रहे बच्चे का जैविक पिता आरोपी था, जो सीधी जिले का ही निवासी है। अभियोजन का आरोप था कि आरोपी ने युवती से शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी से इनकार कर दिया। इससे मानसिक रूप से आहत होकर युवती ने आत्महत्या कर ली।

आहत होकर युवती ने आत्महत्या कर ली
आरोप था कि आरोपित ने शादी का वादा कर संबंध बनाए और बाद में शादी से इनकार कर दिया, जिससे आहत होकर युवती ने आत्महत्या कर ली।

निचली अदालत ने सुनाई थी सजा
मामले में मझौली थाना जिला सीधी में फरवरी 2020 में अपराध दर्ज किया गया। सुनवाई के बाद प्रथम सत्र न्यायाधीश, सीधी ने 28 जून 2025 को आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(1) और धारा 306 के तहत दोषी ठहराते हुए 10-10 वर्ष के कठोर कारावास तथा 1,000-1,000 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई।

इसके खिलाफ आरोपी ने 8 जुलाई 2025 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि मृतका के परिजन दोनों के प्रेम संबंध से परिचित थे और उन्हें इस रिश्ते पर कोई आपत्ति नहीं थी। इसी आधार सहित अन्य साक्ष्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को निरस्त कर आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।

जांच में पुलिस ने दावा किया कि आरोपी के पीड़िता के साथ शारीरिक संबंध थे और उसने शादी का झूठा वादा किया था। पीड़िता 3 महीने की गर्भवती थी जब आरोपी ने शादी से इंकार कर दिया, तो पीड़िता ने परेशान होकर आत्महत्या कर ली।

अदालत ने क्या कहा
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी की मंशा शुरू से ही शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाने की थी। अदालत ने कहा कि यदि शादी का प्रस्ताव शुरुआत में वास्तविक था, लेकिन बाद की परिस्थितियों के कारण विवाह नहीं हो सका, तो इसे बलात्कार का अपराध नहीं माना जा सकता।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आरोपी ने बाद में शादी से इनकार किया, तो केवल इसी आधार पर उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसके ऐसे कृत्य का प्रत्यक्ष संबंध आत्महत्या के लिए उकसावे से साबित न हो।

आरोपी को संदेह का लाभ
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आपराधिक न्याय शास्त्र के स्थापित सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि उपलब्ध साक्ष्यों से दो न्यायसंगत संभावनाएं बनती हैं, तो आरोपी के पक्ष में जाने वाली संभावना को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा। इसी आधार पर आरोपी को दोषमुक्त करते हुए उसकी सजा रद्द कर दी गई।

अधीनस्थ अदालत ने सुनाई थी सजा
प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश, सीधी ने 28 जून 2025 को आरोपी को आईपीसी की धारा 376(1) और 306 के तहत दोषी ठहराते हुए 10-10 वर्ष के कठोर कारावास एवं एक-एक हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके विरुद्ध आरोपित ने आठ जुलाई, 2025 को हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां

  1.     सुनवाई में यह तथ्य भी सामने आया कि मृतका के स्वजन दोनों के प्रेम संबंध से परिचित थे और उन्हें इस रिश्ते पर कोई आपत्ति नहीं थी।
  2.     अदालत ने कहा कि रिकार्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह सिद्ध हो कि आरोपित ने शुरू से ही धोखे की नीयत से शादी का झूठा वादा किया था।
  3.     यदि विवाह का प्रस्ताव प्रारंभ में वास्तविक था और बाद में परिस्थितियों के कारण विवाह नहीं हो सका, तो इसे बलात्कार नहीं माना जा सकता।
  4.     कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल शादी से इनकार कर देना आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनाता। आरोपित के आचरण और आत्महत्या के बीच प्रत्यक्ष उकसावे का संबंध साबित होना आवश्यक है।

संदेह का लाभ आरोपित को
हाई कोर्ट ने आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि जब उपलब्ध साक्ष्यों से दो संभावनाएं बनती हों, तो आरोपी के पक्ष वाली संभावना को स्वीकार किया जाना चाहिए। चूंकि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका, इसलिए आरोपी को दोषमुक्त कर उसकी सजा निरस्त कर दी गई।

  •  
  •     दो बालिगों के बीच सहमति से बने संबंध अपने आप में रेप नहीं।
  •     शादी न होने या इनकार मात्र से रेप का अपराध सिद्ध नहीं होगा।
  •     शुरुआत से धोखाधड़ी की मंशा साबित करना अभियोजन की जिम्मेदारी।
  •     शादी से इनकार मात्र आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं।
  •     साक्ष्य संदेह से परे न होने पर आरोपित को मिला दोषमुक्ति का लाभ।

 

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