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राजनीति

ममता बनर्जी को राज्यसभा में बड़ा झटका? उपचुनाव के बाद तीनों सांसद रहेंगे बरकरार, बदलेगा सिर्फ दल

 नई दिल्ली

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने खाली हुई राज्यसभा की तीन सीटों पर उपचुनाव की घोषणा कर दी है. इस हादसे की सबसे दिलचस्प बात ये है कि उपचुनाव के बाद भी संसद के उच्च सदन में भेजने वाले चेहरे वही रहने की उम्मीद है, बस उनकी पार्टी का रंग बदल चुका है। 

BJP इन तीनों सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रही है. दूसरी तरफ, आपसी गुटबाजी और बिखराव से जूझ रही तृणमूल कांग्रेस के सामने राज्यसभा में अपनी ताकत और कम होने का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। जून में टीएमसी के तीन पूर्व राज्यसभा सांसदों- सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक ने अपनी ही पार्टी और राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. विधानसभा चुनाव में टीएमसी की करारी हार के बाद इन नेताओं ने नेतृत्व पर सवाल उठाए थे। 

बीजेपी में शामिल होते ही उम्मीदवार घोषित
सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक अब ये बीजेपी का दामन थाम चुके हैं. उन्होंने आज ही बीजेपी जॉइन की और पार्टी ने आज ही उन्हें ही अपना उम्मीदवार बना दिया है। 

संसदीय नियमों के मुताबिक, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बड़ाइक का कार्यकाल सितंबर 2029 तक था, जबकि सुष्मिता देव का कार्यकाल अप्रैल 2030 तक चलना था. अब इन खाली सीटों पर 24 जुलाई को उपचुनाव होने जा रहे हैं और यही तीनों नेता एक बार फिर उम्मीदवार होंगे. सिर्फ उनकी पार्टी नई होगी। 

विधानसभा का गणित: बीजेपी का पलड़ा भारी
बंगाल विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों को देखें तो नंबर गेम पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में झुका हुआ है. 294 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के पास अपने 208 विधायक हैं. राज्यसभा चुनाव के सिस्टम के मुताबिक, तीन सीटों वाले इस उपचुनाव में किसी भी उम्मीदवार को जीतने के लिए लगभग 70 वोटों की जरूरत होगी।

बीजेपी के पास विधायकों की संख्या इतनी ज्यादा है कि वो बिना किसी बाहरी समर्थन के अपने तीनों उम्मीदवारों को आसानी से 70, 69 और 69 वोट दिला सकती है. इस गणित के कारण बीजेपी की तीनों सीटों पर जीत पूरी तरह पक्की मानी जा रही है। 

दो गुटों में बंटी टीएमसी, चुनौती बड़ी
बीजेपी के इस बड़े 'खेले' के सामने टीएमसी बेबस नजर आ रही है. किसी भी विरोधी उम्मीदवार को जीतने के लिए कम से कम 70 वोटों की जरूरत होगी. वैसे तो टीएमसी के टिकट पर जीते विधायकों की कुल संख्या अभी भी करीब 80 है. लेकिन पार्टी के भीतर मचे घमासान ने इसे कमजोर कर दिया है. टीएमसी के विधायक अब दो धड़ों में बंट चुके हैं- एक खेमा ममता बनर्जी के साथ है, तो दूसरा बागी गुट विधानसभा में विपक्ष के नेता रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व में काम कर रहा है। 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर टीएमसी एकजुट होती, तो वह कम से कम एक सीट के लिए मुकाबला कड़ा कर सकती थी. लेकिन अंदरूनी लड़ाई इतनी बढ़ चुकी है कि दोनों गुटों के बीच किसी आम सहमति की गुंजाइश खत्म हो गई है. बागी गुट का दावा है कि टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों ने पहले ही रीताब्रत बनर्जी का समर्थन किया था और अब उनके साथ करीब 65 विधायक हैं। 

'विश्वासघात' बनाम 'नेतृत्व का संकट'
ममता बनर्जी का खेमा इस नुकसान को कम आंकने की कोशिश कर रहा है. उनका कहना है कि ये उन नेताओं का 'विश्वासघात' है जिन्होंने संकट के समय पार्टी को छोड़ दिया. टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'ये सीटें टीएमसी की थीं, जो पिछले चुनाव में पार्टी की ताकत के दम पर जीती गई थीं. कुछ लोगों ने मुश्किल समय में पार्टी छोड़ दी, बंगाल की जनता सब देख रही है। 

दूसरी तरफ, बागी गुट के नेताओं का कहना है कि ये कोई आम इस्तीफा नहीं है, बल्कि ये पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लेकर अविश्वास का नतीजा है. उन्होंने कहा, 'नेतृत्व ने संगठन के भीतर से मिल रही चेतावनियों को नजरअंदाज किया, जिसका नतीजा विधानसभा चुनाव में देखने को मिला. असली मुद्दा राज्यसभा सीट का नहीं, बल्कि ये है कि चुने हुए प्रतिनिधियों का अब मौजूदा नेतृत्व पर भरोसा क्यों नहीं रहा। 

फिलहाल, दोनों गुटों के बीच टीएमसी के नाम, सिंबल और संगठन पर कब्जे की लड़ाई चुनाव आयोग के सामने लंबित है. अगर 24 जुलाई को होने वाले उपचुनाव में बीजेपी इन तीनों सीटों पर जीत हासिल करती है, तो राज्यसभा में उसकी ताकत बढ़ेगी और टीएमसी का कद घटेगा। 

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