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विदेश

नर्क से भी भयावह था हिटलर का यह कैंप, हजारों बेगुनाहों की मौत की डरावनी कहानी

दाचाऊ

एडोल्फ हिटलर ने नाजी जर्मनी में अपने राज के दौरान यहूदियों समेत लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा। इस इतिहास से तो हर कोई परिचित है, लेकिन क्या आपको मालूम है कि हिटलर की क्रूरताओं के किस्सों में मार्च का महीना काफी अहम है। ये वही महीना है, जब हिटलर ने नाजी कैंपों की नींव रखना शुरू किया था, जो आगे चलकर यहूदियों समेत उन तमाम लोगों की मौत की वजह बनें, जिन्हें सरकार नापसंद करती थी। इसी महीने हिटलर ने पहले 'जहन्नुम' यानी नाजी कैंप की नींव रखी थी, जिसे दाचाऊ कैंप के तौर पर जाना जाता है।

दाचाऊ कैंप का इतिहास इतना दर्दनाक है, जिसे जानकर लोगों की रूह कांप जाती है। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या महिलाएं और जवान, हिटलर जिसको भी नापसंद करता था, उन्हें कैंपों में ठेल दिया जाता था, जहां उनकी जिंदगी जहन्नुम से कम ना थी। एडोल्फ हिटलर ने जनवरी 1933 में नाजी जर्मनी की कमान संभाली और इसी साल मार्च में दाचाऊ कंसन्ट्रेशन कैंप खोला गया। ये कैंप दक्षिणी जर्मनी के दाचाऊ शहर में स्थित था। वैसे तो इस कैंप को राजनीतिक बंदियों के लिए बनाया गया था, लेकिन फिर यहां यहूदियों को कैद किया जाने लगा।

दाचाऊ कैंप में क्या होता था?
नेशनल म्यूजिम के मुताबिक, शुरुआत में यहां उन राजनीतिक बंदियों को कैद किया गया, जो हिटलर की नीतियों के खिलाफ थे। यहां कैद किए जाने वाले ज्यादातर लोग समाजवादी और कम्युनिस्ट थे। मगर नाजी सरकार का इरादा तो कुछ और ही था। राजनीतिक कैदियों के बाद नंबर आया कलाकारों, बुद्धिजीवियों, शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांगों, रोमानी लोगों और समलैंगिकों का, जिन्हें नाजी सरकार हीन भावना से देखती थी। फिर यहां यहूदियों को भी कैद किया जाने लगा। इस कैंप को चलाने का जिम्मा हिलमार वैकरले को मिला हुआ था, जो नाजी अर्धसैनिक संगठन SS का एक अधिकारी था।

कैंप में कैद किए गए लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार होता था। इसका अंदाजा कुछ यूं लगाया जा सकता है कि हिटलर ने एक फरमान जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि कैंप के अंदर जर्मनी का कानून लागू नहीं होगा। इसका मतलब था कि कैदियों के साथ मारपीट की जाए या उन्हें मौत के घाट उतारा जाए, ऐसा करने पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। इससे कैंप के नाजी अधिकारियों को अपने मनमुताबिक सजा देने का अधिकार मिल गया। हिलमार वैकरले के बाद कैंप का जिम्मा थियोडोर आइके के पास आ गया, जिसने यहां वो बर्बरता फैलाई, जो रूह कंपा देती है।

सबसे पहले थियोडोर आइके ने एक रेगुलेशन जारी किया, जिसमें ये बताया गया कि कैंप किस तरह चलेगा। इसके तहत अगर कोई कैदी छोटी सी भी गलती कर देता था, तो उसकी बेहरमी से पिटाई होती थी। अगर किसी ने यहां से भागने की हिम्मत की या फिर उसकी राजनीतिक विचारधारा सरकार के खिलाफ है, तो फिर उसे तुरंत मौत के घाट उतार दिया जाता था। कैदियों को खुद का बचाव करने या अपने साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के खिलाफ बोलने की आजादी नहीं थी। अगर कोई कुछ कहता, तो उसे पहले पीटा जाता और फिर उसकी हत्या कर दी जाती।

थियोडोर आइके ने यहां पर जो रेगुलेशन बनाई थी, उसको एक ब्लूप्रिंट के तौर पर देखा गया। इसके बाद जितने भी नाजी कैंप बनाए गए, वहां इसी आधार पर सजा देने का प्रावधान किया गया। यहां कैद किए लोगों को समय पर खाना नहीं मिलता था। उनसे कई-कई घंटों तक काम करवाया जाता था। जब 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हुई, तो दाचाऊ में कैद किए गए लोगों से हथियार और अन्य चीजें बनवाई जाने लगीं। इसके अलावा हजारों ऐसे कैदी भी थे, जिनके ऊपर नाजी वैज्ञानिक और डॉक्टर मेडिकल एक्सपेरिमेंट किया करते थे।

दाचाऊ में कितने लोग मारे गए थे?
यूएस होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजिम के अनुसार, 1940 तक दाचाऊ एक कंसन्ट्रेशन कैंप का रूप धारण कर चुका था, जहां के हालात बेहद क्रूर और भीड़भाड़ भरे थे। इसे लगभग 6,000 बंदियों को रखने के लिए डिजाइन किया गया था, लेकिन आबादी लगातार बढ़ती रही और 1944 तक लगभग 30,000 कैदियों को शिविर में ठूंस दिया गया। द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत में, हिटलर को यह विश्वास हो गया कि जर्मनी और नाजियों द्वारा कब्जा किए गए देशों में यहूदियों की दैनिक गतिविधियों पर बैन लगाने भर से 'यहूदी समस्या' का समाधान नहीं होगा। उस लगने लगा कि ये समस्या तभी सुलझेगी, जब सारे यहूदियों का सफाया कर दिया जाए।

इसके बाद 1941 से लेकर 1944 तक जहां हजारों यहूदियों और उन लोगों को भेजा जाने लगा, जिन्हें सरकार पसंद नहीं करती थी। फिर यहां उन्हें जहरीली गैस देकर मारने का सिलसिला शुरू हुआ। 1933 से 1945 तक दाचाऊ के हजारों कैदी बीमारी, कुपोषण और अत्यधिक काम की वजह से जान गंवा बैठे। कैंप के नियमों के उल्लंघन के लिए हजारों लोगों को फांसी दे दी गई। 1942 में इस कैंप में बैरक एक्स का निर्माण शुरू हुआ, जो एक श्मशानगृह था और इसमें शवों को जलाने के लिए इस्तेमाल होने वाली चार बड़ी भट्टियां शामिल थीं।

नाजियों ने दाचाऊ के कैदियों पर खूब मेडिकल एक्सपेरिमेंट भी किए। उदाहरण के लिए, नाजी वैज्ञानिक ये पता लगाना चाहते थे कि क्या बर्फीले पानी में डूबे व्यक्ति को जीवित किया जा सकता है। इस संभावना का पता लगाने के लिए कैदियों को बर्फीले पानी में डुबोकर परीक्षण किया जाता था। उन्हें घंटों तक बर्फीले पानी से भरे टैंकों में जबरन डुबोया जाता था। इस दौरान भी कैदी मारे जाते रहे। यहां कैद हुए लोगों को आजादी तब मिली, जब 29 अप्रैल 1945 को अमेरिकी सेना ने दाचाऊ कैंप पर अपना कंट्रोल जमाया। 1933 से लेकर 1945 तक यहां 2 लाख से ज्यादा कैदियों को रखा गया था, जिसमें से हजारों ने अपनी जान गंवाई।

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