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स्वस्थ-जगत

अस्पताल बनाम इंश्योरेंस कंपनियां: कैशलेस इलाज खतरे में, जिम्मेदारी किसकी?

नई दिल्ली
सरकार हेल्थ इंश्योरेंस के दायरे को बढ़ाने के लिए निजी कंपनियों को इसके प्रीमियम में कटौती से लेकर इंश्योरेंस से जुड़े छोटे-छोटे प्रोडक्ट लाने के लिए कह रही है। दूसरी तरफ मुनाफे को लेकर निजी कंपनियां और निजी अस्पतालों की आपसी लड़ाई में पहले से हेल्थ इंश्योरेस लेने वालों के लिए भी खतरे की घंटी बजने लगी है। अस्पताल उन्हें कभी भी कैशलेस इलाज के लिए मना कर सकते हैं। ऐसे में उन्हें पहले अपना पैसा लगाकर इलाज कराना होगा और फिर इंश्योरेंस कंपनियां उनके बिल का भुगतान करेंगी। जबकि अधिकतर उपभोक्ता हेल्थ इंश्योरेंस की खरीदारी यह सोचकर करते हैं कि जरूरत पड़ने पर वे अस्पताल में जाकर भर्ती हो जाएंगे और उनके इलाज का खर्चा उनके इंश्योरेंस की सीमा के मुताबिक कंपनी उठाएगी। लोग इत्मीनान से रहते हैं कि उनके खाते में पर्याप्त पैसा नहीं रहने पर भी हेल्थ इंश्योरेंस रहने पर उनका इलाज हो जाएगा।

एएचपीआई ने दिया था नोटिस
भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (इरडा) भी कैशलेस (बिना नकदी के) इलाज को बढ़ावा देता है। हाल ही में एसोसिएशन ऑफ हेल्थ प्रोवाइडर्स इंडिया (एएचपीआई) ने बजाज एल्यांज और केयर हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों की कैशलेस सुविधा को सितंबर से खत्म करने का नोटिस दिया था।

अस्पताल कभी भी कैशलेस इलाज के लिए कर सकते हैं मना
एएचपीआई निजी अस्पतालों का एसोसिएशन है। हालांकि अब इंश्योरेंस कंपनियों की तरफ से कहा जा रहा है कि एएचपीआई से बातचीत हो गई है और ग्राहकों को सूचीबद्ध या पैनल में शामिल अस्पतालों में कैशलेस इलाज की सुविधा जारी रहेगी। लेकिन जानकारों का कहना है कि पिछले 15 दिनों से अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनियों के बीच जो झगड़ा चल रहा था उसे देखते हुए साफ है कि अस्पताल कभी भी कैशलेस इलाज के लिए मना कर सकता है।

इंश्योरेंस कंपनियों का क्या कहना है?
इंश्योरेंस कंपनियों की तरफ से इस बारे पूछने पर बताया गया कि निजी अस्पताल और उनके बीच कैशलेस इलाज को लेकर समझौता होता है जिसके तहत इलाज से जुड़े रूम किराया से लेकर डॉक्टर की फीस तक की राशि तय होती है।

प्राइवेट अस्पतालों ने क्या कहा?
निजी अस्पतालों का कहना है कि इलाज से जुड़ी महंगाई सालाना 14 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, लेकिन इंश्योरेंस कंपनियां उस हिसाब से उनकी दरों को नहीं बढ़ा रही है। इसलिए अस्पताल कैशलेस इलाज से इनकार करने के मूड में है। इंश्योरेंस कंपनियों का कहना है कि हेल्थ इंश्योरेंस का क्लेम लगातार बढ़ रहा है जिससे उन पर काफी वित्तीय दबाव है। निजी अस्पताल इलाज का खर्च भी बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं। हालांकि इस वित्तीय दबाव को कम करने के लिए हर साल हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम 10 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।

कौन लेगा जिम्मेदारी?
पिछले तीन सालों में हेल्थ इंश्योरेंस के प्रीमियम में 15-30 प्रतिशत तक का इजाफा देखा गया है। जानकारों का कहना है कि ग्राहकों को हेल्थ इंश्योरेंस बेचने के दौरान उन्हें कंपनी के पैनल में शामिल अस्पतालों में कैशलेस इलाज की सुविधा का आश्वासन दिया जाता है और अचानक वे अस्पताल कैशलेस इलाज से मना कर दे तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा।

इरडा की नजर अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनियों की इस लड़ाई पर है और इसका स्थायी हल निकालने का प्रयास किया जा सकता है। जानकार यह भी कह रहे हैं कि अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनियों के बीच कैशलेस इलाज देने का सिर्फ समझौता होता है, कोई कानूनी बंदिश नहीं है। अस्पताल उधार के इलाज को कभी भी बंद कर सकता है।

 

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