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धर्म/ज्योतिष

पितृपक्ष में 28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध, जानें कुतुप काल और पूजा विधि

 पितृपक्ष में 28 सितंबर को द्वितीया तिथि का श्राद्ध किया जाएगा. इस दिन उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु हिंदू पंचांग के अनुसार किसी भी महीने के कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को होती है. इस दिन पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं. मान्यता है कि चावल, दूध, शहद, घी और काले तिल से बना पिंड पाकर हमारे पितृ शांत होते हैं और अपनी कृपा बनाए रखते हैं.

द्वितीया तिथि श्राद्ध
आश्विन कृष्ण द्वितीया तिथि 27 सितंबर को रात 08 बजकर 58 मिनट से लेकर 28 सितंबर को शाम 07 बजकर 13 मिनट तक रहेगी. ऐसे में उदिया तिथि के अनुसार, द्वितीया तिथि का श्राद्ध 28 सितंबर दिन सोमवार को किया जाएगा.

श्राद्ध और तर्पण का श्रेष्ठ मुहूर्त
शास्त्रों में पितरों के तर्पण और श्राद्ध के लिए कुतुप वेला को सबसे उत्तम माना गया है. यह समय दोपहर के आस-पास पड़ता है. 28 सितंबर को कुतुप काल दोपहर 11:48 बजे से दोपहर 12:36 बजे तक रहेगा. लेकिन अलग-अलग शहरों में इसका समय एक-दूसरे से थोड़ा अलग हो सकता है. इसलिए पंचांग देखकर समय सुनिश्चित कर लें.

द्वितीया तिथि के श्राद्ध की विधि?
द्वितीया तिथि के श्राद्ध में आटे, चावल या जौ से बनाए गए गोल पिंड पितरों को अर्पित करने की परंपरा है. पिंडदान करने के बाद जल में काले तिल मिलाकर पितरों का तर्पण किया जाता है. पितरों का तर्पण करते वक्त हाथ में कुशा जरूर रखें. कुश एक प्रकार की घास होती है, जिसकी अंगूठी बनाकर दाएं हाथ की अनामिका उंगली में पहनी जाती है. श्राद्ध के बाद गरीब ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें. आखिर में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें.

श्राद्ध के दौरान गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए भोजन का एक अंश निकालकर अलग रख दिया जाता है, जिसे पंचबलि कहा जाता है. कहते हैं कि इन जीवों के माध्यम से हमारे पितृ भोजन ग्रहण करते हैं और प्रसन्न होते हैं. इससे पितृ दोष समाप्त हो जाता है और उन्हें शांति मिलती है.

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