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धर्म/ज्योतिष

राधा रानी की मृत्यु कैसे हुई? अंतिम समय में कृष्ण ने बजाई बांसुरी, जानें पूरी पौराणिक कथा

 राधा रानी की मृत्यु कैसे हुई थी? इसे लेकर तरह-तरह की कथाएं प्रचलित हैं. अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और लोककथाओं में राधा रानी के जीवन के अंतिम समय को अलग-अलग तरीके से बताया गया है. लेकिन आज हम उस कथा को जानेंगे, जो पुराणों और वैष्णव परंपरा से जुड़ी कथाओं में मिलती है.

भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी का प्रेम भारतीय भक्ति परंपरा में प्रेम, समर्पण और भक्ति का प्रतीक माना जाता है. दोनों का जन्म एक ही तिथि यानी अष्टमी को हुआ था, लेकिन दोनों के जन्म पक्ष अलग थे.

श्री कृष्ण और राधा रानी का जन्म एक ही तिथि पर हुआ था
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था. वहीं राधा जी का प्राकट्य भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को माना जाता है. यानी भगवान कृष्ण के जन्म के करीब 15 दिन बाद राधाष्टमी का पर्व आता है. इसी दिन राधा रानी के प्राकट्य का उत्सव मनाया जाता है.

राधा जी के पिता का नाम वृषभानु और माता का नाम कीर्ति बताया जाता है. बरसाना को राधा रानी की जन्मभूमि माना जाता है. उनका लालन-पालन बरसाना में हुआ और वृंदावन से भी उनका गहरा संबंध बताया जाता है.

बांसुरी की धुन पर खिंची चली आती थीं गोपियां
राधा रानी और श्री कृष्ण के बीच प्रेम को सामान्य सांसारिक प्रेम से अलग दिव्य और आध्यात्मिक प्रेम के रूप में देखा जाता है. मान्यता है कि जब भगवान कृष्ण वृंदावन में अपनी बांसुरी बजाते थे, तो उसकी धुन सुनकर गोपियां सब कुछ भूलकर उनकी ओर खिंची चली आती थीं.

काव्य परंपरा में भी कृष्ण की बांसुरी के प्रभाव का बेहद सुंदर वर्णन मिलता है. बांसुरी की धुन कानों में पड़ते ही गोपियां सामाजिक मर्यादाओं और सांसारिक बंधनों को भूलकर कृष्ण की ओर चली आती थीं. इन गोपियों में राधा रानी का स्थान सबसे विशेष माना गया है. राधा और कृष्ण का प्रेम भक्ति परंपरा में आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक भी माना जाता है.

क्या राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था?
राधा और कृष्ण के विवाह को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में अलग मान्यताएं मिलती हैं. ब्रह्मवैवर्त पुराण से जुड़ी परंपरा में राधा-कृष्ण के विवाह का वर्णन मिलता है. इस कथा के अनुसार, भांडीर वन में ब्रह्मा जी ने राधा और कृष्ण का विवाह कराया था. मान्यता है कि इस विवाह के समय कई देवी-देवता भी साक्षी बने थे.

वृंदावन के पास स्थित भांडीर वन आज भी राधा-कृष्ण की इस कथा से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल माना जाता है. यहां राधा-कृष्ण विवाह की कथा से जुड़े स्थानों और परंपराओं के दर्शन किए जाते हैं.

श्री कृष्ण के वृंदावन छोड़ने के बाद क्या हुआ?
समय बीतता गया और भगवान कृष्ण वृंदावन छोड़कर मथुरा चले गए. इसके बाद वे द्वारका चले गए. दूसरी ओर राधा रानी का जीवन बरसाना और वृंदावन से जुड़ा रहा. श्री कृष्ण के मथुरा और फिर द्वारका चले जाने के बाद राधा और कृष्ण का मिलना बेहद दुर्लभ हो गया था.

कहा जाता है कि एक बार दोनों की मुलाकात कुरुक्षेत्र में हुई थी. उस समय सूर्य ग्रहण के अवसर पर भगवान कृष्ण द्वारका से कुरुक्षेत्र आए थे. नंद बाबा और वृंदावन के कई गोप-गोपिकाएं भी वहां पहुंचे थे. इसी दौरान राधा रानी और भगवान कृष्ण की भी मुलाकात हुई.

द्वारका में हुई राधा-कृष्ण की अंतिम मुलाकात
राधा-कृष्ण की अंतिम मुलाकात को लेकर एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा द्वारका से जुड़ी है. कथा के अनुसार, अपने जीवन के प्रमुख दायित्वों से मुक्त होने के बाद राधा रानी भगवान कृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचीं. वहां उन्होंने भगवान कृष्ण के महल में जाकर उनसे मुलाकात की.

कहा जाता है कि राधा जी को देखकर भगवान कृष्ण बेहद प्रसन्न हुए. राधा रानी के अनुरोध पर कृष्ण ने उन्हें महल में एक जिम्मेदारी भी सौंपी. इसके बाद राधा रानी कुछ समय तक द्वारका में रहकर महल के कार्यों में सहयोग करती रहीं और अवसर मिलने पर भगवान कृष्ण के दर्शन करती थीं. लेकिन द्वारका का राजसी वातावरण राधा रानी को वह आनंद नहीं दे पा रहा था, जो उन्हें वृंदावन में कृष्ण के साथ महसूस होता था.

क्यों छोड़ दिया था राधा रानी ने द्वारका का महल?
वृंदावन में राधा रानी का जीवन कृष्ण की भक्ति और प्रेम से जुड़ा था. द्वारका में रहते हुए उन्हें महसूस हुआ कि वह पहले जैसा दिव्य प्रेम और अपनापन महसूस नहीं कर पा रही हैं. धीरे-धीरे वह उदास रहने लगीं. आखिरकार उन्होंने द्वारका का महल छोड़ दिया और एकांत स्थान पर चली गईं.

समय बीतता गया. राधा रानी कमजोर होती गईं और उनके मन में भगवान कृष्ण की स्मृतियां और भी गहरी होती चली गईं.

अंतिम समय में कृष्ण ने दिया राधा को दर्शन
कथा के अनुसार, जब राधा रानी ने अपने अंतिम समय में भगवान कृष्ण को याद किया, तब कृष्ण उनके सामने प्रकट हुए. भगवान कृष्ण ने राधा जी से कहा कि वह अपनी कोई इच्छा बताएं. लेकिन राधा रानी ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा.

भगवान कृष्ण ने जब दोबारा उनसे अपनी इच्छा बताने को कहा, तब राधा रानी ने केवल इतना कहा कि वह कृष्ण की बांसुरी सुनना चाहती हैं. वह वही बांसुरी की धुन सुनना चाहती थीं, जिसे उन्होंने वृंदावन में सुना था.

बांसुरी की धुन सुनते-सुनते राधा रानी ने त्यागा था शरीर
कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने अपनी बांसुरी उठाई और उसी तरह बजाने लगे, जैसे वह वृंदावन में बजाया करते थे. कृष्ण बांसुरी बजाते रहे और राधा रानी उस मधुर धुन को सुनती रहीं. बांसुरी की धुन में खोई राधा रानी ने धीरे-धीरे अपने शरीर का त्याग कर दिया. पौराणिक कथा में आगे कहा जाता है कि राधा रानी की दिव्य आत्मा भगवान कृष्ण में विलीन हो गई. यही वजह है कि राधा-कृष्ण को केवल दो अलग-अलग स्वरूपों के रूप में नहीं, बल्कि एक ही दिव्य प्रेम और चेतना के दो रूपों के तौर पर भी देखा जाता है.

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