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उत्तर प्रदेश

योगी सरकार का जल प्रबंधन मॉडल बदलेगा बुंदेलखंड की कृषि व्यवस्था, खेतों तक पहुंचेगी इजराइली तकनीक

लखनऊ

 बुंदेलखंड में जल संकट की चुनौती से निपटने के लिए योगी सरकार का इंडिया-इजराइल बुंदेलखंड वाटर प्रोजेक्ट अब केवल जलाशय और सिंचाई ढांचा तैयार करने तक सीमित नहीं है। झांसी के गंगावली में चल रहे मिनी पायलट प्रोजेक्ट के जरिए अब यह परखा जा रहा है कि उपलब्ध पानी का वैज्ञानिक प्रबंधन कर कम पानी में अधिक और बेहतर कृषि उत्पादन कैसे हासिल किया जा सकता है। परियोजना के अगले चरण में ड्रिप, स्प्रिंकलर, ऑटोमेटेड इरिगेशन, सोलर पंपिंग, वाटर बजटिंग और संरक्षित खेती जैसी तकनीकों को स्थानीय परिस्थितियों में परखा जाएगा।

नमामि गंगे और ग्रामीण जलापूर्ति विभाग के विशेष सचिव एवं निदेशक, भूगर्भ जल विभाग डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने कहा कि सबसे खास बात यह है कि परियोजना में ‘जितना पानी उपलब्ध, उसी के अनुरूप खेती’ की अवधारणा को बढ़ावा देने की तैयारी है। पांड वाटर बजटिंग के जरिए तालाब में उपलब्ध उपयोगी पानी का आकलन किया जाएगा और उसी आधार पर फसल क्षेत्र व गर्मी की फसलों के लिए पानी की सीमा तय करने का प्रस्ताव है। इससे जरूरत से ज्यादा पानी निकालने के बजाय उपलब्ध जल का अधिकतम उत्पादक उपयोग किया जा सकेगा।

पानी के हिसाब से तय होगी खेती की योजना

बुंदेलखंड जैसे जल-संवेदनशील क्षेत्र में वाटर बजटिंग को परियोजना की महत्वपूर्ण कड़ी बनाया जा रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रमों में किसानों को तालाब के पानी का हिसाब-किताब और संतुलन तैयार करने की जानकारी दी जाएगी। उपलब्ध उपयोगी पानी के आधार पर फसल क्षेत्र निर्धारित करने और गर्मी की फसलों के लिए वाटर सीलिंग तय करने की व्यवस्था प्रस्तावित है। इसका सीधा फायदा यह होगा कि खेती की योजना उपलब्ध जल संसाधनों को ध्यान में रखकर बनाई जाएगी। अनियंत्रित सिंचाई और जरूरत से अधिक पानी निकालने के बजाय जल-बजट आधारित सिंचाई को बढ़ावा मिलेगा। इससे सीमित जल का बेहतर उपयोग करते हुए कृषि उत्पादकता बढ़ाने की संभावना बनेगी।

भूजल की स्थिति पर भी रखी जाएगी वैज्ञानिक नजर

डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने कहा कि परियोजना के शुरुआती चरण में भूजल स्तर में सुधार को लेकर अभी कोई मात्रात्मक निष्कर्ष स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है। हालांकि, भविष्य में वास्तविक प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन करने के लिए बोरवेल और ऑब्जर्वेशन वेल की व्यवस्था की गई है। इनके माध्यम से जल स्रोत और जल उपयोग की निगरानी की जाएगी।

परियोजना में प्री-प्रोजेक्ट और पोस्ट-प्रोजेक्ट भूजल आंकड़ों की तुलना कर यह आकलन करने की तैयारी है कि जल दक्षता बढ़ाने वाली व्यवस्थाओं से भूजल पर दबाव कितना कम होता है। यानी परियोजना का मूल्यांकन केवल दावों के आधार पर नहीं, बल्कि आंकड़ों के आधार पर करने की व्यवस्था तैयार की जा रही है।

इजराइली तकनीक का बुंदेलखंड की जमीन पर परीक्षण
इंडिया-इजराइल सहयोग के तहत माइक्रो इरिगेशन, ड्रिप, स्प्रिंकलर, ऑटोमेटेड इरिगेशन, एससीएडीए, सोलर पंपिंग, रिजर्वायर आधारित जल प्रबंधन, वाटर बजटिंग और संरक्षित खेती जैसी आधुनिक तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है। परियोजना का उद्देश्य केवल विदेशी तकनीक को स्थापित करना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि बुंदेलखंड की स्थानीय परिस्थितियों में कौन सी तकनीक सबसे ज्यादा प्रभावी साबित होती है। इसके लिए पानी की मात्रा, सिंचाई दक्षता, फसल की पैदावार, खेती की लागत और जल उत्पादकता जैसे मानकों को मापने की व्यवस्था प्रस्तावित है।

जलाशय से खेत तक पहुंचेगी आधुनिक सिंचाई व्यवस्था

परियोजना के अगले चरण में जलाशय से खेत तक पाइपलाइन बिछाने, ड्रिपलाइन और स्प्रिंकलर लगाने, ग्रीनहाउस/टनल व सिंचाई स्वचालन प्रणाली को क्रियाशील करने की योजना है। इसके साथ किसानों को खाद एवं उर्वरक के उचित इस्तेमाल, जल बजट तैयार करने, फसल की योजना बनाने और कृषि यंत्रों के संचालन का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। इससे किसानों को केवल सिंचाई का नया साधन नहीं मिलेगा, बल्कि पानी, फसल और कृषि लागत को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने की तकनीकी जानकारी भी मिलेगी।

प्रदर्शन खेत से किसानों के अपने खेत तक पहुंचेगा मॉडल

परियोजना की एक महत्वपूर्ण कड़ी सफल तकनीकों को किसानों के अपने खेतों तक पहुंचाना है। गंगावली के डेमोस्ट्रेशन फार्म यानी प्रदर्शन खेत में जिन तकनीकों और व्यवस्थाओं के बेहतर परिणाम सामने आएंगे, उन्हें किसानों के खेतों में अपनाने और दोहराने का अवसर दिया जाएगा। इससे मिनी पायलट प्रोजेक्ट केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सफल मॉडल को व्यापक स्तर पर किसानों तक ले जाने का आधार तैयार होगा।

हर फसल और हर बूंद का रखा जाएगा रिकॉर्ड

परियोजना में निगरानी को केवल निर्माण कार्यों तक सीमित नहीं रखा गया है। प्रदर्शन खेतों पर फसल उत्पादन, पानी के इस्तेमाल, पानी के समान वितरण, कृषि सामग्री की मात्रा, लागत, सकल लाभ और किसानों द्वारा नई तकनीकों को अपनाने जैसे महत्वपूर्ण मानकों का नियमित रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था प्रस्तावित है।

खेत से जुड़े अभिलेख डिजिटल रूप में दर्ज किए जाएंगे। मौसम के अनुसार किसानों के परिणामों का सूचना-पटल तैयार करने की भी व्यवस्था प्रस्तावित है। इससे परियोजना के प्रभाव का चरणबद्ध और वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जा सकेगा।

कृषि और भूजल विभागों की भी रहेगी तकनीकी भागीदारी

भूगर्भ जल विभाग के अधिशासी अभियंता व वैयक्तिक सहायक निदेशक अनुपम ने कहा कि परियोजना के परिणामों के सत्यापन के लिए कृषि, उद्यान और भूजल विभागों को तकनीकी सहयोग से जोड़ने का प्रावधान किया गया है। इससे अलग-अलग विभागों की विशेषज्ञता का इस्तेमाल कर परियोजना के परिणामों को जांचने और आगे की रणनीति तैयार करने में मदद मिलेगी।

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