<?php /** * The template for displaying the header * */ defined( 'ABSPATH' ) || exit; // Exit if accessed directly ?><!DOCTYPE html> <html <?php language_attributes(); ?>> <head> <meta charset="<?php bloginfo( 'charset' ); ?>" /> <link rel="profile" href="http://gmpg.org/xfn/11" /> <?php wp_head(); ?> </head> <body id="tie-body" <?php body_class(); ?>> <?php wp_body_open(); ?> <div class="background-overlay"> <div id="tie-container" class="site tie-container"> <?php do_action( 'TieLabs/before_wrapper' ); ?> <div id="tie-wrapper"> <?php TIELABS_HELPER::get_template_part( 'templates/header/load' ); do_action( 'TieLabs/before_main_content' );
देश

बिहार में FSL समेत फिंगरप्रिंट और हैंडराइटिंग ब्यूरो अब गृह विभाग के नियंत्रण में

पटना
बिहार सरकार ने पर्व-त्योहारों पर लगने वाले मेले और जुलूस के दौरान विधि-व्यवस्था संधारण के लिए पुलिस पदाधिकारियों को विशेष कार्यपालक दंडाधिकारी की शक्तियां दी हैं। यह शक्तियां रेंज और प्रक्षेत्र में पदस्थापित आईजी, डीआईजी समेत जिलों के एसएसपी, एसपी, सिटी एसपी और ग्रामीण एसपी (रेल छोड़कर) को मिली हैं। गृह विभाग (आरक्षी शाखा) ने इससे संबंधित अधिसूचना जारी की है।

संबंधित पुलिस पदाधिकारी अपने-अपने कार्य क्षेत्र में सरस्वती पूजा, होली, रामनवमी, दुर्गापूजा, दीपावली, ईद, बकरीद, मुहर्रम, काली पूजा, छठ पूजा, शब-ए-बरात पर लगने वाले मेला व जुलूस के अवसर पर विधि व्यवस्था के संधारण में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 के अध्याय 9 (धारा 125 से 143) के अधीन विशेष कार्यपालक दंडाधिकारी की शक्तियों का उपयोग कर सकेंगे। यह अध्याय मजिस्ट्रेट और न्यायालयों को यह शक्ति देता है कि वे शांति भंग होने की आशंका या अपराधियों द्वारा दोबारा अपराध करने से रोकने के लिए मुचलका (बांड) या जमानत लें। इससे संबंधित सुरक्षा और निवारक कार्रवाई करने का अधिकार कार्यपालक दंडाधिकारी और कुछ मामलों में न्यायालय (सेशन कोर्ट या फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट) के पास होता है।

किसी अपराध में दोषसिद्धि होने पर धारा 125 के तहत शांति कायम रखने के लिए प्रतिभूति (बांड) मांगने का अधिकार सेशन कोर्ट या फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट को प्राप्त है। धारा 126, 127, 128 और 129 के अंतर्गत शांति भंग की आशंका, संदिग्ध या आदतन अपराधियों से मुचल्का/बांड भरवाने और निवारक कार्रवाई करने की मुख्य शक्ति कार्यपालक दंडाधिकारी के पास होती है।

फिंगरप्रिंट, हैंडराइटिंग और फोटो ब्यूरो की कमान भी गृह विभाग को मिली
आपराधिक मामलों की वैज्ञानिक जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली विधि विज्ञान प्रयोगशालाएं (एफएसएल) अब गृह विभाग के नियंत्रण में काम करेंगी। राज्य सरकार ने बिहार पुलिस मैनुअल में संशोधन करते हुए इसकी जिम्मेदारी बिहार पुलिस मुख्यालय से लेकर गृह विभाग को सौंप दी है। विधि विज्ञान प्रयोगशालाओं के साथ ही फिंगरप्रिंट ब्यूरो, हैंडराइटिंग ब्यूरो और फोटो ब्यूरो की कमान भी गृह विभाग को दी गयी है। नयी व्यवस्था में प्रदर्शों की वैज्ञानिक जांच संबंधित एफएसएल निदेशक के पूर्ण नियंत्रण में होगी। विभागाध्यक्ष के तौर पर फोरेंसिक जांच समय पर पूरी कर उसकी रिपोर्ट संबंधित न्यायालय को समर्पित करने का उत्तरदायित्व निदेशक पर होगा। जांच कार्य में किसी तरह की शंका की स्थिति में गृह विभाग के सचिव के परामर्श से उसका समाधान किया जा सकेगा।

गृह विभाग की अधिसूचना के मुताबिक, विधि विज्ञान प्रयोगशालाओं (एफएसएल) के प्रशासनिक, कार्यपालक एवं वित्तीय मामलों को तत्काल प्रभाव से गृह विभाग देखेगा। फिलहाल इन कार्यालयों की निगरानी बिहार पुलिस के एडीजी (अपराध अनुसंधान विभाग) संभाल रहे थे। वर्तमान में पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर और राजगीर (बिहार पुलिस अकादमी) में चार एफएसएल कार्यरत हैं। दो साल के अंदर क्षेत्रीय मुख्यालयों के 09 एफएसएल चालू करा लिए जाने का लक्ष्य है। इनके लिए भवन बनकर तैयार हैं। साथ ही 102 सहायक निदेशक और वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक की नियुक्तियां भी पूरी कर ली गयी हैं। शेष बचे 28 जिलों में, जहां एफएसएल नहीं है, वहां जिला चलंत प्रयोगशालाओं के लिए भवनों का निर्माण किया गया है। इसके अतिरिक्त, सभी 44 पुलिस जिलों को 50 मोबाइल फोरेंसिक वैन की सुविधा भी दी गयी है। पटना और राजगीर में साइबर फोरेंसिक लैब की स्थापना की तैयारी है।

जांच में समन्वय, जवाबदेही और दक्षता बढ़ेगी
विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, एफएसएल सहित फिंगरप्रिंट ब्यूरो, हैंडराइटिंग ब्यूरो और फोटो ब्यूरो की कमान गृह विभाग को सौंपे जाने से आपराधिक जांच से संबंधित साक्ष्यों की फोरेंसिक जांच में समन्वय, जवाबदेही और दक्षता बढ़ेगी। नये आपराधिक कानून में सात वर्ष या उससे अधिक सजा के मामलों में एफएसएल की अनिवार्यता होने से प्रदर्शों की संख्या कई गुना बढ़ी है। अब मोबाइल फोरेंसिक वैन से भी प्रदर्श इकट्ठा होने लगे हैं। इसके मुकाबले सालाना करीब 15 से 18 हजार कांडों में ही एफएसएल रिपोर्ट पेश की जा रही है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक प्रदर्शों के मामले में एफएसएल के सामने चुनौतियां अधिक हैं। मात्र पटना में इलेक्ट्रॉनिक प्रदर्शों की जांच होने से लंबित प्रदर्शों की संख्या 750 से अधिक हो गयी है। इसके चलते न्यायालयों को रिपोर्ट भेजने में विलंब हो रहा है। ऐसे प्रदर्शों की जांच के लिए आवश्यक उपकरण बढ़ाने से संबंधित प्रस्ताव गृह विभाग के साथ ही बिहार पुलिस मुख्यालय को भेजे गये हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button