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उत्तर प्रदेश

कांवड़ यात्राः समावेशी हिंदू समाज का नव-जागरण आचार्य डॉ. विक्रमादित्य, पीतांबरा पीठाधीश

भगवान शिव को जलार्पण का अभीष्ट लेकर निकले कांवड़ियों के समूह को आंखें बंद कर आत्मसात कीजिए। श्रद्धा-आस्था की वह धारा दिखेगी जो प्रयागराज के महाकुंभ में दिखाई देती है, अयोध्या में भगवान रामलला के मंदिर परिसर में दिखाई देती है, बांके बिहारी मंदिर प्रांगण में नजर आती है और काशी विश्वनाथ कारिडोर में दिखाई देती है। हिंदू समाज की आंतरिक समरसता, सर्वसमावेशिता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अद्भुत दृश्य वर्तमान में कांवड़ मार्गों पर सजीव है। सदियों पुरानी सामाजिक सीमाएं और असमानताएं आस्था के पावन जल में विसर्जित हो चुकी हैं। कांवड़ियों की भीड़ में कोई ब्राह्मण है, कोई दलित, कोई ओबीसी तो कोई आदिवासी। कंधे पर बंधी कांवड़ किसी की जाति नहीं पूछती। रास्ते के भंडारे किसी की कुल-गोत्र जांच के बाद प्रसाद नहीं बांटते। यह कांवड़ यात्रा के रूप में भारत के सामाजिक अवचेतन का एक जीवंत मानचित्र है और उत्तर प्रदेश इसका प्रतिनिधि राज्य है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यह राज्य समावेशी हिंदू समाज के नव-जागरण का प्रतीक हो चला है।

हिंदुत्व की सामाजिक-सांस्कृतिक व्याख्या करने वाले विचारक कांवड़ यात्रा को हिंदू समाज की भीतरी समावेशिता के प्रमाण के रूप में देखते हैं और इसका आधार यात्रा में दलितों और पिछड़ों की बढ़ती भागीदारी है। संस्कृतिकरण और सांस्कृतिक वर्चस्व की धारणाओं को यह यात्रा व्यवहार के धरातल पर एक नई व्याख्या प्रदान करती है। यह यात्रा सिद्ध करती है कि सनातन संस्कृति में ईश्वर की भक्ति हर उस आत्मा का सहज अधिकार है जो शिवत्व में विलीन होना चाहती है। शिव तो देव, दानव, मानव, भूत, पिशाच, सबके 'विश्वनाथ' और 'भोलेनाथ' हैं। शिव विष को अपने कंठ में धारण कर जगत् की रक्षा करते हैं और औघड़दानी बनकर अपने हर भक्त पर समान रूप से अनुकंपा बरसाते हैं। कांवड़ मार्ग पर चलने वाला हर व्यक्ति 'भोले का भक्त' है। वहां उसकी कोई सामाजिक, आर्थिक या जातीय पहचान नहीं रह जाती। समाज के विभिन्न वर्गों के लोग कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं, तो सामाजिक असमानता की दीवारें अपने आप ढहने लगती हैं।

दलित और पिछड़ा वर्ग, जो पूर्व में कई सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों से वंचित रहा, आज इस यात्रा की रीढ़ है तो इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि योगी सरकार ने उन्हें समावेशी सम्मान का हकदार माना है। सनातन परंपरा के प्रति उनका अटूट विश्वास और अपने सांस्कृतिक अधिकारों पर उनके सहज दावे की स्वीकृति का यह बड़ा धरातल है। यह इस पूर्वाग्रह को खारिज करता है कि भारत में सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीक उच्च जातियों के वर्चस्व को बनाए रखने के साधन रहे हैं। जब लाखों की संख्या में वंचित और पिछड़े वर्ग के युवा शिवभक्ति के इस महायज्ञ का मुख्य ध्वजवाहक बनते हैं, तो वे सिद्ध करते हैं कि सनातन धर्म का वास्तविक ढांचा वर्चस्व पर नहीं, बल्कि सहअस्तित्व और भ्रातृत्व पर आधारित है। भक्ति आंदोलन के दौर में संत कबीर, संत रविदास, संत चोखामेला और संत कनकदास ने जिस आध्यात्मिक समता की अलख जगाई थी, वही अलख आज कांवड़ यात्रा के रूप में सड़कों पर साकार होती दिखाई देती है और समाज के अंतिम व्यक्ति के भीतर स्वाभिमान, गौरव और एकता की अनुभूति जाग्रत करती है।

हम इसे सनातन समाज के वास्तविक ऐश्वर्य की संज्ञा दे सकते हैं जो प्रशासनिक इच्छाशक्ति, राज्य का संरक्षण और एक अनुकूल वातावरण से संभव होता है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने कांवड़ यात्रा को भव्य, सुरक्षित और गौरवमयी 'सांस्कृतिक उत्सव' का रूप दिया है तो यह ऐश्वर्य दिखाई दे रहा है। अब से दस साल पहले की बात करें तो राज्य के स्तर पर कांवड़ यात्रा को उपेक्षा, प्रशासनिक बाधाओं, सुरक्षा के खतरों और संदेह की दृष्टि से देखा जाता था। योगी सरकार ने इस दृष्टिकोण को पूरी तरह से बदला है।

सरकार ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि आस्था का सम्मान करना और प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक परंपराओं को सुरक्षित व सम्मानजनक वातावरण में जीने का अवसर देना सरकार का प्राथमिक दायित्व है। कांवड़ मार्गों पर पुष्पवर्षा का जो दृश्य पिछले कुछ वर्षों में उभरा है, वह राज्य द्वारा अपने नागरिकों की आस्था को दिया गया बड़ा सम्मान है। जब हेलीकॉप्टर से कांवड़ियों पर फूल बरसाए जाते हैं, तो यह दृश्य पूरे समाज के मन में एक नया आत्मविश्वास और गौरव भर देता है। कांवड़ यात्रा के सुचारु संचालन के लिए की गई व्यापक व्यवस्थाएं, जैसे सुरक्षित और स्वच्छ मार्ग, चिकित्सा शिविर, विश्राम स्थल, प्रकाश व्यवस्था, और कांवड़ियों के भोजन-पानी के लिए उचित प्रबंध यह दर्शाते हैं कि योगी सरकार अध्यात्म को सामाजिक सशक्तीकरण और समरसता का माध्यम मानती है। कांवड़ मार्गों पर लगने वाले सेवा शिविरों में जो सेवा भावना दिखाई देती है, वह समाज के भीतर से छुआछूत, ऊंच-नीच और वैमनस्य के भाव को जड़ से समाप्त कर देती है।

सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए आर्थिक या राजनीतिक प्रयास तब तक पर्याप्त नहीं होते,  जब तक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरातल पर बराबरी का अहसास न हो। कांवड़ यात्रा इसी आध्यात्मिक समता का व्यावहारिक मंच है। योगी सरकार ने इस मंच को जो भव्यता, सुरक्षा और सम्मान प्रदान किया है, उससे समाज के शोषित और वंचित वर्गों के भीतर सनातन धर्म के प्रति नया स्वाभिमान पैदा हुआ है। कांवड़ यात्रा का यह विहंगम स्वरूप भारत की उस आंतरिक शक्ति का दर्शन कराता है जो विविधता में एकता और समरसता में ही अपना प्राण देखती है। यह यात्रा उन ताकतों को भी जवाब है जो समाज को जातियों में बांटकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहती हैं। संस्कृतिकरण की यह धारा समस्त हिंदू समाज के एक साथ मिलकर उठ खड़े होने का पर्याय है। यह सनातन समाज को उसकी वास्तविक पहचान 'वसुधैव कुटुंबकम' और 'सर्वे भवंतु सुखिनः' की ओर ले जा रही है।

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