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उत्तर प्रदेश

50 वर्ष पुराने विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों को मिलेगा अवसर, 5,000 से अधिक छात्र संख्या वाले संस्थान होंगे पात्र

योगी सरकार की पहल पर उच्च शिक्षा संस्थानों में स्थापित होंगी 'भारतीय ज्ञान परंपरा संवर्धन शोधपीठ'

50 वर्ष पुराने विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों को मिलेगा अवसर, 5,000 से अधिक छात्र संख्या वाले संस्थान होंगे पात्र

प्रत्येक शोधपीठ को 5 वर्षों के लिए 2 करोड़ रुपए का एकमुश्त अनुदान, एफडी के ब्याज से होगा शोधपीठों का नियमित संचालन

वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत सहित भारतीय ज्ञान-विज्ञान पर होगा शोध, पीएचडी, पोस्ट-डॉक्टरेट एवं शोधार्थियों को मिलेगा प्रोत्साहन 

दुर्लभ पांडुलिपियों एवं ग्रंथों का होगा डिजिटलीकरण, ओपन-एक्सेस लाइब्रेरी और एमओओसीज से वैश्विक स्तर पर होगी पहुंच

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, कार्यशालाएं और व्याख्यानमालाएं होंगी आयोजित, भारतीय ज्ञान परंपरा पर डिप्लोमा एवं सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम भी होंगे शुरू

संचालन के लिए गठित होगी विशेषज्ञों की उच्चस्तरीय समिति, पारदर्शी चयन प्रक्रिया के आधार पर होगा शोधपीठों का गठन

युवाओं में सांस्कृतिक गौरव और आत्मविश्वास बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम,  भारतीय ज्ञान-विज्ञान का वैश्विक केंद्र बनेगा उत्तर प्रदेश

लखनऊ
 योगी सरकार प्रदेश के अंदर भारतीय ज्ञान परंपरा को उच्च शिक्षा के मुख्य प्रवाह में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (एनईपी-2020) के अनुरूप राज्य सरकार ने विश्वविद्यालयों तथा राजकीय एवं अशासकीय सहायता प्राप्त महाविद्यालयों में "भारतीय ज्ञान परंपरा संवर्धन शोधपीठ" की स्थापना के लिए विस्तृत नीति और दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। इस योजना का उद्देश्य भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, दर्शन, विज्ञान, संस्कृति और बौद्धिक विरासत को आधुनिक शिक्षा प्रणाली से जोड़ना है। सरकार चाहती है कि नई पीढ़ी केवल आधुनिक शिक्षा तक सीमित न रहे, बल्कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान, दर्शन और सांस्कृतिक मूल्यों को भी समझे तथा उन पर शोध कर विश्व स्तर पर नई पहचान स्थापित करे। शोधपीठों के माध्यम से भारत के महान ऋषियों, मनीषियों, वैज्ञानिकों, दार्शनिकों एवं समाज सुधारकों के विचारों का अध्ययन, अनुसंधान और व्यापक प्रसार किया जाएगा। इससे उत्तर प्रदेश भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक प्रचार-प्रसार का अग्रणी केंद्र बन सकेगा।

50 वर्ष पूर्ण कर चुके विश्वविद्यालय और महाविद्यालय कर सकेंगे आवेदन
प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने बताया कि शोधपीठों की स्थापना के लिए स्पष्ट पात्रता मानक निर्धारित किए गए हैं। केवल वे विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय आवेदन कर सकेंगे, जिनकी स्थापना को कम से कम 50 वर्ष पूरे हो चुके हों। इसके साथ ही संस्थान में वर्तमान छात्र संख्या 5,000 से अधिक होना आवश्यक होगा तथा यूजीसी अधिनियम, 1956 की धारा 2(f) एवं 12(B) के अंतर्गत मान्यता प्राप्त होना अनिवार्य होगा। योगी सरकार प्रत्येक चयनित शोधपीठ को पांच वर्षों के लिए 2 करोड़ रुपए का एकमुश्त अनुदान उपलब्ध कराएगी। यह धनराशि सावधि जमा (एफडी) के रूप में सुरक्षित रखी जाएगी तथा उससे प्राप्त ब्याज का उपयोग शोधपीठ के नियमित संचालन, शोध गतिविधियों और अन्य शैक्षणिक कार्यक्रमों में किया जाएगा। शोधपीठों को और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर), दान एवं अन्य वैधानिक स्रोतों से भी संसाधन जुटाए जा सकेंगे। पांच वर्ष की अवधि पूर्ण होने पर शोधपीठों के कार्यों की समीक्षा कर आगे विस्तार का निर्णय लिया जाएगा।

शोधार्थियों को शोध अनुदान के रूप में मिलेगा लाभ 
मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने बताया कि शोधपीठों में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, जैन एवं बौद्ध दर्शन, आयुर्वेद, योग, भारतीय गणित, खगोल विज्ञान, स्थापत्य कला, कृषि विज्ञान, पर्यावरण संरक्षण तथा अन्य भारतीय ज्ञान परंपराओं पर गंभीर एवं गुणवत्तापूर्ण शोध को प्रोत्साहित किया जाएगा। इन शोधपीठों के माध्यम से पीएचडी, पोस्ट-डॉक्टरेट तथा स्नातक एवं परास्नातक स्तर के शोधार्थियों को शोध अनुदान एवं शैक्षणिक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। योजना के अंतर्गत शोध पुस्तकों, अनुवादों और समीक्षात्मक संस्करणों का प्रकाशन अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप आईएसबीएन एवं डीओआई के साथ कराया जाएगा। साथ ही दुर्लभ पांडुलिपियों, प्राचीन ग्रंथों एवं शोध सामग्री का डिजिटलीकरण कर उनका स्थायी संरक्षण किया जाएगा। शोध निष्कर्षों को ओपन-एक्सेस डिजिटल लाइब्रेरी तथा एमओओसीज प्लेटफॉर्म के माध्यम से देश-दुनिया के विद्यार्थियों एवं शोधकर्ताओं तक पहुंचाया जाएगा। शोधपीठों के माध्यम से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों, कार्यशालाओं, व्याख्यानमालाओं और अकादमिक सम्मेलनों का नियमित आयोजन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े डिप्लोमा एवं सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम भी संचालित किए जाएंगे, जिससे विद्यार्थियों को विषय की गहन जानकारी प्राप्त हो सके।

संचालन समिति की होगी नियुक्ति 
योजना के सफल संचालन के लिए प्रत्येक संस्थान में कुलपति अथवा प्राचार्य की अध्यक्षता में संचालन समिति गठित की जाएगी। समिति में विषय विशेषज्ञ, वित्त अधिकारी एवं बाह्य विशेषज्ञ शामिल होंगे। शोधपीठ के संचालन के लिए निदेशक/चेयर प्रोफेसर, शोध सहायक, शोध फेलो तथा डिजिटल एवं आईटी विशेषज्ञों की नियुक्ति की जाएगी। शोधपीठों के चयन हेतु निदेशक, उच्च शिक्षा, प्रयागराज की अध्यक्षता में गठित पांच सदस्यीय समिति सभी प्रस्तावों का परीक्षण कर शासन को संस्तुति भेजेगी। स्वीकृति के बाद ही बजट आवंटित किया जाएगा। यदि किसी संस्थान द्वारा धनराशि का दुरुपयोग किया जाता है अथवा दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जाता है तो शासन पूरी अनुदान राशि वापस लेने का अधिकार रखेगा। उच्च शिक्षा मंत्री ने कहा कि योगी सरकार की यह महत्वाकांक्षी पहल उत्तर प्रदेश को भारतीय ज्ञान-विज्ञान के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने कहा कि इससे युवाओं में अपनी सांस्कृतिक जड़ों, भारतीय दर्शन और ज्ञान परंपरा के प्रति गौरव, आत्मविश्वास और शोध की नई चेतना विकसित होगी। साथ ही भारतीय चिंतन और ज्ञान-विज्ञान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी।

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