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छत्तीसगड़

खैरागढ़ में सहेजी गई 230 साल पुरानी लिथोग्राफी, जर्मनी से आए पत्थरों पर छात्रों को मिल रही ट्रेनिंग

खैरागढ़.

आज अखबार कुछ मिनटों में छप जाते हैं, पोस्टर कंप्यूटर से तैयार हो जाते हैं। AI के ज़रिए तो कुछ भी बनाया जा सकता है और तस्वीरें एक क्लिक में लाखों लोगों तक पहुंच जाती हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब न कंप्यूटर था, न ऑफसेट मशीन और न ही डिजिटल प्रिंटिंग।

उस समय एक खास पत्थर पर चित्र बनाए जाते थे और उसी से अखबार, पोस्टर, कैलेंडर और देवी-देवताओं के चित्रों की हजारों प्रतियां छपती थीं। इस तकनीक का नाम है लिथोग्राफी यानी छापा कला। लगभग 230 साल पुरानी यह कला आज भी छत्तीसगढ़ के राजकुमारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ में सिखाई जा रही है। देश के गिने-चुने संस्थानों में शामिल इस विश्वविद्यालय में आज भी जर्मनी से लाए गए विशेष लाइमस्टोन पर विद्यार्थी प्रिंट तैयार करते हैं और ब्रिटिशकालीन लिथोग्राफी प्रेस से इस ऐतिहासिक तकनीक का अभ्यास करते हैं। लिथोग्राफी का आविष्कार 1796 में जर्मनी के कलाकार एलोयस सेनेफेल्डर ने किया था। उनका उद्देश्य था कि कला और सूचनाएं केवल महलों तक सीमित न रहें, बल्कि आम लोगों तक भी पहुंचें।

उन्होंने एक ऐसे चूना पत्थर की खोज की, जो तेल और पानी के सिद्धांत पर काम करता था। इसी पत्थर पर चित्र बनाकर उसकी सैकड़ों और हजारों प्रतियां तैयार की जाती थीं। भारत में यह तकनीक सबसे पहले गोवा पहुंची, जहां इसका इस्तेमाल बाइबल और धार्मिक साहित्य की छपाई में हुआ। बाद में महान चित्रकार राजा रवि वर्मा ने इस तकनीक को नई पहचान दी। उन्होंने 1894 में अपना लिथोग्राफी प्रेस स्थापित किया और रामायण, महाभारत व पुराणों के देवी-देवताओं के चित्र कम कीमत पर छापकर आम लोगों तक पहुंचाए। यही वह दौर था, जब भारतीय कला पहली बार महलों से निकलकर आम घरों की दीवारों तक पहुंची।

विश्वविद्यालय के लेक्चरर डॉ. मनिंदर सिंह बताते हैं कि आज जिस ऑफसेट प्रिंटिंग से अखबार और किताबें छपती हैं, उसकी बुनियाद भी लिथोग्राफी ही है। आधुनिक CMYK कलर प्रिंटिंग का सिद्धांत भी इसी तकनीक से विकसित हुआ। पहले हर रंग के लिए अलग पत्थर तैयार किया जाता था, फिर उन्हें क्रमवार छापकर एक रंगीन चित्र बनाया जाता था। खैरागढ़ की सबसे बड़ी पहचान उसका लिथोग्राफी स्टूडियो है। यहां आज भी ब्रिटिशकालीन लिथोग्राफी प्रेस सुरक्षित है, जिसे विभाग के वरिष्ठ कलाकार प्रो. वी. नागदास इंग्लैंड से विश्वविद्यालय लेकर आए थे। उसी के साथ बड़ी संख्या में मूल लिथोग्राफी स्टोन भी यहां संरक्षित हैं। यही वजह है कि देशभर से विद्यार्थी इस दुर्लभ कला को सीखने खैरागढ़ पहुंचते हैं।
प्रोफेसर रबी नारायण गुप्ता बताते हैं कि लिथोग्राफी केवल एक कला नहीं, बल्कि प्रिंट मीडिया की जन्मदाता तकनीकों में से एक है।

शुरुआती दौर में अखबार, सरकारी घोषणाएं, पोस्टर, विज्ञापन और कैलेंडर इसी माध्यम से छपते थे। समय के साथ डिजिटल तकनीक ने इसकी जगह ले ली, लेकिन फाइन आर्ट की दुनिया में इसका महत्व आज भी बरकरार है। अब विश्वविद्यालय पारंपरिक स्टोन लिथोग्राफी के साथ प्लेट लिथोग्राफी भी शुरू करने की तैयारी कर रहा है। छात्र अश्वनी कुमार बताते हैं कि लिथोग्राफी में पहले विशेष पत्थर को तैयार किया जाता है, फिर उस पर तैलीय माध्यम से चित्र बनाया जाता है। गम अरेबिक, पानी और इंक की मदद से मशीन में प्रिंट निकाला जाता है। एक ही चित्र की कई एक जैसी प्रतियां तैयार की जा सकती हैं।
वहीं छात्रा नैन्सी अग्रवाल कहती हैं कि यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। एक ही कलाकृति हजारों लोगों तक बिल्कुल उसी रूप में पहुंच सकती है, इसलिए प्रिंटमेकिंग को जनसंचार का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता है। बीएफए से लेकर एमएफए, पीएचडी और डी.लिट. तक की पढ़ाई कराने वाला यह विभाग आज केवल कलाकार ही नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक तकनीक के संरक्षक भी तैयार कर रहा है, जिसने कभी दुनिया में छपाई और जनसंचार की दिशा बदल दी थी। डिजिटल युग में खैरागढ़ का यह स्टूडियो साबित करता है कि इतिहास केवल किताबों में नहीं, बल्कि मशीनों, पत्थरों और कलाकारों के हाथों में भी जीवित रहता है।

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