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टेक्नोलॉजी

रोबोट से राउटर तक, चीनी गैजेट्स पर अमेरिका की बढ़ती सुरक्षा चिंता

घर साफ करने वाले रोबोट, वाईफाई राउटर, ड्रोन और सीसीटीवी कैमरे अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी पर खतरा कैसे बन रहे हैं? अमेरिका और चीन के बीच की राइवरली बढ़ती ही जा रही है. लेकिन इसी बीच अब अमेरिका ने एक बार फिर से चीनी कंपनियों के गैजेट्स और प्रोडक्ट्स अमेरिका में बैन करने शुरू कर दिए हैं.

पहले Huawei पर रोक लगी, फिर ZTE पर कार्रवाई हुई, उसके बाद Hikvision, DJI, TikTok और अब ह्यूमनॉयड रोबोट, रोबो डॉग, रोबोट वैक्यूम क्लीन, स्मार्ट राउटर सहित कई AI गैजेट्स अब अमेरिकी ट्रंप सरकार के निशाने पर हैं. बाहर से देखने पर यह सिर्फ ट्रेड वॉर या अमेरिका-चीन की राजनीतिक लड़ाई लग सकती है, लेकिन असल में यह उससे कहीं बड़ी कहानी है.

गौरतलब है कि हाल ही में भारत सरकार की तरफ से भी एडवाइजरी जारी की गई थी. बताया गया कि Hikvision और TP Link जैसी कंपनियों के सीसीटीवी कैमरे भारत में बैन किए जा सकते हैं. हालांकि अब तक ये डिवाइसेज भारत में उपलब्ध हैं.

यह लड़ाई दुनिया की अगली टेक सुपरपावर बनने की है. यह लड़ाई डेटा की है. यह लड़ाई AI की है. और सबसे बढ़कर यह लड़ाई उस जानकारी की है जो आज हर स्मार्ट गैजेट आपके बारे में कलेक्ट कर रहा है. ज्यादातर लोग इस बात से पूरी तरह अनजान रहते हैं कि इस तरह के गैजेट्स आपका डेटा इस कदर कलेक्ट करते हैं कि आप चाह कर भी बच नहीं सकते हैं.

अमेरिका की फेडरल कम्यूनिकेशन कमिशन यानी FCC ने हाल ही में नए नियम जारी किए हैं. इन नियमों के तहत चीन समेत कुछ और देशों में बने कई नए स्मार्ट डिवाइस को अमेरिकी बाजार में मंजूरी नहीं मिलेगी. इनमें ह्यूमनॉयड रोबोट, रोबोट डॉग, रोबोट वैक्यूम क्लीनर, स्मार्ट राउटर, पावर इन्वर्टर और कई नेटवर्क से जुड़े AI डिवाइस शामिल हैं.

FCC का कहना है कि ऐसे प्रोडक्ट सिर्फ मशीन नहीं हैं, बल्कि डेटा इकट्ठा करने वाले नेटवर्क डिवाइस हैं और अगर इनका डेटा किसी विदेशी सरकार तक पहुंचता है तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है.

अमेरिका को अचानक यह डर क्यों लगने लगा?
अगर इस फैसले को सिर्फ आज की खबर मानेंगे तो पूरी कहानी समझ नहीं आएगी. इसकी शुरुआत करीब एक दशक पहले हो चुकी थी. 2018 में अमेरिका ने पहली बार चीन की बड़ी कंपनी Huawei और ZTE पर गंभीर आरोप लगाए. दावा किया गया कि इन कंपनियों के नेटवर्क उपकरणों का इस्तेमाल जासूसी के लिए किया जा सकता है. Huawei ने इन आरोपों को बार-बार खारिज किया, लेकिन इसके बावजूद अमेरिका ने अपने 5G नेटवर्क से हुआवे को लगभग बाहर कर दिया.

इसके बाद Hikvision और Dahua जैसी सीसीटीवी कैमरा कंपनियां निशाने पर आईं. फिर DJI ड्रोन को लेकर सवाल उठे. बाद में TikTok पर यूजर डेटा चीन जाने का आरोप लगा. अब अमेरिका का मानना है कि AI और रोबोटिक्स के दौर में खतरा सिर्फ मोबाइल फोन तक ही नहीं है. घर में रखा हर स्मार्ट डिवाइस पोटेंशियल डेटा कलेक्टर बन चुका है. यही वजह है कि इस बार कार्रवाई की लिस्ट में ऐसे गैजेट्स भी शामिल हैं जिनके बारे में कुछ साल पहले तक किसी ने सोचा भी नहीं था.

एक रोबोट वैक्यूम क्लीनर कैसे जासूसी कर सकता है?
ज्यादातर लोगों को लगता है कि रोबोट वैक्यूम क्लीनर सिर्फ घर की सफाई करता है. लेकिन असलियत इससे काफी अलग है. आज के प्रीमियम रोबोट वैक्यूम क्लीनर्स LiDAR सेंसर से पूरे घर का 3D मैप बनाता है. उसमें कैमरा हो सकता है. कई मॉडल माइक्रोफोन का इस्तेमाल करते हैं. वह Wi-Fi से हमेशा इंटरनेट से जुड़ा रहता है. उसका मोबाइल ऐप आपके फोन से कनेक्ट रहता है और कई कंपनियां यह डेटा क्लाउड सर्वर पर भी स्टोर करती हैं. फ्रंट में कैमरा भी दिया गया होता है जो रिकॉर्ड करके सेव करता है.

मतलब यह मशीन सिर्फ धूल नहीं देख रही होती, बल्कि उसे आपके घर का पूरा नक्शा पता होता है. किस कमरे में कौन सा फर्नीचर है, मुख्य दरवाजा कहां है, कितने कमरे हैं और घर का लेआउट कैसा है. घर में कौन कौन है ये भी देख रहा होता है.

FCC का तर्क है कि अगर ऐसे डिवाइस बड़ी संख्या में किसी विदेशी कंपनी के सर्वर से जुड़े हों और उस कंपनी को अपने देश के कानून के तहत डेटा साझा करना पड़े, तो यह केवल प्राइवेसी का मामला नहीं रहेगा बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन सकता है.

रोबोट डॉग और ह्यूमनॉयड रोबोट से अमेरिका क्यों परेशान है?
AI रोबोट आज पहले जैसे नहीं रहे. अब उनमें कई कैमरे, डेप्थ सेंसर, माइक्रोफोन, GPS, AI चिप और लगातार इंटरनेट कनेक्टिविटी होती है. अगर कोई ह्यूमनॉयड रोबोट किसी फैक्ट्री, लैब, सरकारी दफ्तर, एयरपोर्ट या बिजली स्टेशन में काम कर रहा है तो वह अपने आसपास का वीडियो, आवाज और दूसरी जानकारी रिकॉर्ड कर सकता है. आने वाले समय में यही रोबोट सुरक्षा, हेल्थकेयर, मैन्युफैक्चरिंग और सैन्य क्षेत्र में भी इस्तेमाल होंगे.

अमेरिका का कहना है कि अगर अभी नियम नहीं बनाए गए तो फ्यूचर में ऐसे AI रोबोट सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम बन सकते हैं. इसलिए पहली बार ह्यूमनॉयड रोबोट को भी राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में लाया गया है. इसके अलावा बैन की लिस्ट में स्मार्ट राउटर्स भी हैं.

रोबोट वैक्यूम क्लीनर की तुलना में स्मार्ट राउटर ज्यादा खतरनाक माना जा रहा है. आपके घर का राउटर सिर्फ इंटरनेट नहीं चलाता. आपके घर का पूरा डिजिटल ट्रैफिक उसी से होकर गुजरता है. कौन सा डिवाइस कब जुड़ा, कौन सी वेबसाइट खुली, कितना डेटा इस्तेमाल हुआ, कौन सा स्मार्ट टीवी, कैमरा, लैपटॉप या मोबाइल नेटवर्क पर है, इन सबकी जानकारी राउटर के पास होती है. यहां तक कौन कहां बैठा है ये भी हैकर्स राउटर के जरिए पता लगा सकते हैं. ये कैसे मुमकिन है आप हमारे इस आर्टिकल को पढ़ कर समझ सकते हैं.

अगर ऐसे नेटवर्क इक्विप्मेंट्स में कोई कमजोरी हो या किसी तरह का बैकडोर मौजूद हो, तो साइबर हमले का खतरा बढ़ सकता है. इसी वजह से TP-Link जैसे चीनी नेटवर्किंग प्रोडक्ट भी लंबे समय से अमेरिकी जांच के दायरे में हैं.

क्या सिर्फ सुरक्षा की वजह से यह सब हो रहा है?
यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है. सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स का एक बड़ा वर्ग मानता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता पूरी तरह गलत नहीं है. लेकिन कई इकॉनमिस्ट और टेक एक्सपर्ट्स यह भी कहते हैं कि यह सिर्फ सिक्योरिटी का मामला नहीं है. आज दुनिया के रोबोट वैक्यूम बाजार में Roborock, Ecovacs, Dreame, Narwal और Xiaomi जैसी चीनी कंपनियों का दबदबा है. ड्रोन बाजार में DJI दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है. रोबोटिक्स, AI हार्डवेयर और बैटरी तकनीक में भी चीन तेजी से आगे बढ़ रहा है.

ऐसे में अमेरिका चाहता है कि उसके इंपॉर्टेंट नेटवर्क और भविष्य के AI इकोसिस्टम में विदेशी, खासकर चीनी कंपनियों की भूमिका कम हो. कई एक्सपर्ट्स इसे 'Tech Decoupling' कहते हैं, यानी अमेरिका और चीन का धीरे-धीरे अलग-अलग टेक इकोसिस्टम बनाना.

चीन क्या कह रहा है?
चीन ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है. चीन का कहना है कि अमेरिका बिना ठोस सबूत के राष्ट्रीय सुरक्षा का बहाना बनाकर चीनी कंपनियों को ग्लोबल बाजार से बाहर करना चाहता है. चीनी विदेश मंत्रालय का कहना है कि अगर किसी कंपनी के खिलाफ सबूत हैं तो उन्हें पब्लिक किया जाए. सिर्फ इस आधार पर कि कंपनी चीन की है, उस पर रोक लगाना निष्पक्ष व्यापार के फंडामेंटल्स के खिलाफ है.

चीन ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका मुक्त बाजार की बात करता है, लेकिन जब चीनी कंपनियां टेक्नोलॉजी में आगे निकलती हैं तो नए नियम बनाकर उन्हें रोकने की कोशिश करता है. चीन ने चेतावनी दी है कि अगर ऐसे कदम जारी रहे तो वह अपने हितों की रक्षा के लिए जवाबी कार्रवाई करेगा. इसलिए अब दुनिया अब दो टेक कैंप में बंट रही है.

कुछ साल पहले तक Apple, Samsung, Xiaomi या Huawei जैसे ब्रांड पूरी दुनिया के लिए लगभग एक जैसे प्रोडक्ट बनाते थे. अब स्थिति बदल रही है. अमेरिका अपने नेटवर्क, AI और सरकारी सिस्टम के लिए अलग नियम बना रहा है. यूरोप डेटा सुरक्षा के लिए अलग कानून बना रहा है. चीन अपना अलग डिजिटल इकोसिस्टम तैयार कर रहा है. इसका मतलब है कि आने वाले सालों में एक ही गैजेट हर देश में नहीं बिकेगा. कुछ डिवाइस अमेरिका में बैन होंगे लेकिन एशिया में उपलब्ध रहेंगे. कुछ ऐप यूरोप में चलेंगे लेकिन अमेरिका में नहीं.

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