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उत्तर प्रदेश

अविमुक्तेश्वरानंद की सभाओं में क्यों नहीं जुट रही भीड़? सामने आई बड़ी वजह

इसलिए नहीं आते अविमुक्तेश्वरानंद की सभाओं में लोग

लखनऊ

गोरक्षा के नाम पर एजेंडे के तहत यात्रा पर निकले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की सभाओं में भीड़ का न आना अब उनके लिए नया सिरदर्द बन गया है। लखनऊ के आशियाना इलाके में उन्होंने जो सभा की, उसमें उनके निशाने पर बस एक ही शख्स था और वह थे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। अगर कोई उनकी इस सभा में उनका पूरा भाषण सुन ले, तो उसे ये भी समझ आ जाएगा कि अविमुक्तेश्वरानंद की सभाओं में भीड़ क्यों नहीं आती।

अविमुक्तेश्वरानंद लगातार बताते रहे कि उनके समर्थकों को उनकी सभाओं में आने नही आने दिया जा रहा, उन्हें घर पर ही रोक दिया जा रहा है। हालांकि ऐसी एक भी शिकायत सामने नहीं आई है। लखनऊ की अपनी सभा में उन्होंने मुख्यमंत्री के लिए जिन शब्दों का जब प्रयोग किया तो समझ में आ गया कि वह मुख्यमंत्री के प्रति घनघोर ईर्ष्या और द्वेष के घातक सम्मिश्रण वाले विष का ही शिकार नहीं हैं, बल्कि प्रतिशोध की अग्नि में भी जल रहे हैं।

हम तो यही सुनते आए थे कि कोई व्यक्ति जब दुनियावी बातों से परे हो जाता है, तो संत हो जाता है। और फिर यह तो स्वयं को शंकराचार्य कहते हैं, उनकी जिह्वा से गोरक्षपीठाधीश्वर जैसे अत्यंत श्रद्धेय व्यक्ति के विषय में अनर्गल प्रलाप शंकराचार्य जैसी श्रेष्ठ पदवी को शोभा नहीं देता। उनको सुनने पर यह चिंता भी होती है कि हिंदू समाज के श्रेष्ठ संत अगर इस प्रकार की असुरक्षा की भावना से ग्रस्त हैं, तो वह हिंदू समाज का उद्धार कैसे करेंगे।

अपने भाषणों में जब अविमुक्तेश्वरानंद कहते हैं कि इन्हीं योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के लिए कुछ लोगों ने उनसे परामर्श किया था और उन्होंने योगी को मुख्यमंत्री बनाए जाने की सिफारिश की थी, तो यह भी लगता है कि वह किसी बेहद सामान्य व्यक्ति की तरह मुख्यमंत्री को अपना तथाकथित अहसान याद दिलाना चाहते हैं। उनका यह आचरण और भाषाई संस्कृति किसी तरह से शंकराचार्य पद के अनुकूल नहीं है। इसीलिए सनातन के लिए चिंता होना स्वाभाविक है।
  
कुछ दिन पहले इन्हीं अविमुक्तेश्वरानंद ने भारत माता पर सवाल खड़े कर दिए थे। जिस भाषा में वह अपने समर्थकों को संबोधित करते हैं, वह बताती है कि अगर किसी से उनकी वैचारिक असहमति है, तो उनके हमले किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। लेकिन यह व्यवहार किसी संत को शोभा नहीं देता। उन्होंने तमाम प्रशासनिक व्यवस्थाओं को धता बताकर महाकुंभ में स्नान करने के लिए रथ पर जाने की ज़िद की, यूपी पुलिस से उनकी और उनके समर्थकों की हाथापाई हुई, इससे सनातन समाज में उनकी एक नकारात्मक छवि बनी। उसके बाद उन्होंने यह कह कर कि शास्त्रों में भारत माता का कॉन्सेप्ट ही नहीं है और भारत माता आरएसएस का कॉन्सेप्ट है, एक और मोर्चा खोल लिया।

सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ जो कुछ कहा जा रहा हो, लोग यह समझने लगे हैं कि अविमुक्तेश्वरानंद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इसकी साफ वजह समाजवादी पार्टी की वह सोच है, जिसके तहत उसे लगने लगा है कि सत्ता फिर से पाने के लिए थोड़ा गेरुआ दिखना ज़रूरी है। राममंदिर चढ़ावा चोरी पर योगी सरकार और बीजेपी पर आरोप लगाने के लिए एक तथाकथित शंकराचार्य का साथ मिले तो परफेक्ट केमिस्ट्री बनती है, इसलिए अविमुक्तेश्वरानंद के बहाने अखिलेश यादव थोड़ा-थोड़ा सनातनी होने का रास्ता भी तलाश रहे हैं। दोनों के अपने स्वार्थ हैं, अखिलेश को सनातनी होने में मदद अविमुक्तेश्वरानंद करें और योगी को हटा कर अखिलेश मुख्यमंत्री बनें, फिर अविमुक्तेश्वरानंद सत्ता संरक्षण में पल्लवित पुष्पित हों।

हो सकता है कि सनातन पर 'सॉफ्ट अटैक' अविमुक्तेश्वरानंद की योजना का ही एक अंग हो और ऐसा वह बीजेपी के कोर वोटर्स को कमज़ोर करने या कनफ्यूज़ करने के लिए कर रहे हैं। उनकी उम्मीद है कि शायद ऐसा करने से हिंदू भ्रम में पड़ जाए और उसका वोट तितर-बितर हो जाए। ज़ाहिर है हिंदू वोट संगठित होकर बीजेपी के पक्ष में नहीं पड़े तो सपा जीत जाएगी क्योंकि उसके पास मुस्लिम और यादव वोट पहले से ही मौजूद हैं।।लेकिन भारतीय राजनीति के रास्ते इतने सरल और निष्कंटक नहीं है। यह नहीं कहा जा सकता कि महज किसी संत के आशीर्वाद और सहयोग से किसी राज्य का चुनाव जीता जा सकता है।

हर चुनाव में भारतीय जनमानस का रुझान बदला हुआ होता है, ऐसे में समाजवादी पार्टी को अपनी पहले की छवि और काम पर ही लड़ना होगा और साबित करना होगा कि कामकाज के स्तर पर मौजूदा सरकार उनकी सरकारों से निम्न स्तर की साबित हुई है। यह एक कठिन काम है क्योंकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की छवि एक दबंग, ईमानदार और साधारण जीवन व्यतीत करने वाले एक योगी की है, उनके गेरुए पर कभी कोई दाग नहीं लगा। कानून और प्रशासन के स्तर पर उनके पिछले नौ साल बेहतरीन माने जाते हैं। इसलिए अविमुक्तेश्वरानंद राजनीति के इस खेल में समाजवादी पार्टी की कोई मदद कर पाएंगे, इसमें सन्देह है। संभव है कि उनकी सभाओं में उनके तल्ख होते भाषण और भीड़ में उत्तरोत्तर होती कमी इसी बात की परिचायक हों।

– सुधाकर श्रीवास्तव

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