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देश

भूजल पर देशभर में खतरे की घंटी, पंजाब-हरियाणा सबसे ज्यादा संकट में, आंध्र-गुजरात की बेहतर जल नीति

नई दिल्ली

सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक एक इंसान की दिनचर्या में एक चीज ऐसी है जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. ये चीज है पानी. भारतीय मानक ब्यूरो और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एक व्यक्ति को रोजाना 200 लीटर पानी की औसतन जरूरत होती है. इसमें नहाना-धोना, कपड़े और घर की सफाई, खाना पकाना व पीना शामिल है। 

हमारी ये जरूरतें धरती के नीचे सदियों से दबे पानी से पूरी होती हैं. कह सकते हैं कि भूजल यानी ग्राउंडवाटर हमारी लाइफ-लाइन है. लेकिन, इसी लाइफलाइन का हम खुद दम घोंट रहे हैं. केंद्रीय भूमि जल बोर्ड (CGWB), नीति आयोग और संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत ‘जल दिवालियापन’ (Water Bankruptcy) की ओर बढ़ रहा है. यानी धरती का पानी खत्म होने के कगार पर है. आईए, समझते हैं कि देश में भूजल संकट की बड़ी वजह क्या है? किस राज्य में संकट ज्यादा है और कहां पर स्थिति नियंत्रण में है?

आंकड़ों में देखिए भारत में भूजल की स्थिति.
देश में भूजल रिचार्ज और निकासी कितनी: सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड (CGWB) के 2025 के आकलन के अनुसार, देश में कुल सालाना भूजल (Groundwater) रिचार्ज 448.52 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) है. इसमें सालाना निकाले जा सकने वाले भूजल संसाधनों का अनुमान 407.75 BCM लगाया गया है. इसके अलावा, देश में कुल सालाना भूजल निकासी यानी दोहन का आकलन 247.22 BCM है. इसके आधार पर, भूजल निकासी और सालाना निकाले जा सकने वाले भूजल संसाधन का अनुपात है 60.63% है। 

ग्राउंडवाटर निकालने में भारत की वैश्विक स्थिति: पानी एक नॉन-रिन्यूएबल (दोबारा न बनने वाला) संसाधन है. पानी की कमी मुख्य रूप से खेती और जलवायु परिवर्तन के कारण ग्राउंडवाटर के खत्म होने से हो रही है. भारत हर साल 250 क्यूबिक मीटर पानी निकालता है, जो दुनिया भर में निकाले जाने वाले कुल ग्राउंडवाटर का 25% है. भारत दुनिया भर में सबसे ज्यादा ताजा ग्राउंडवाटर निकालता है, जो हर साल लगभग 250 बिलियन क्यूबिक मीटर है. चीन भी इसके ठीक पीछे है, जो उत्तरी इलाकों में इंडस्ट्री और खेती की जरूरतों के लिए बहुत ज्यादा पानी निकालता है. जबकि, अमेरिका खासकर कैलिफोर्निया और टेक्सास में फसलों के लिए काफी मात्रा में पानी निकालता है।

पाकिस्तान और ईरान भी खींच रहे ग्राउंडवाटर: पाकिस्तान, ईरान और सऊदी अरब भी ग्राउंडवाटर खींचने वाले टॉप देशों में शामिल हैं. पाकिस्तान के सिंधु बेसिन में ट्यूबवेल से कपास की खेती होती है और ईरान के सूखे इलाकों में गहरे एक्विफर (जमीन के नीचे पानी के भंडार) का इस्तेमाल होता है. हाल के आंकड़ों के अनुसार, ये देश दुनिया भर में निकाले जाने वाले कुल पानी के आधे से ज्यादा हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं। 

पंजाब में भूजल दोहन सबसे ज्यादा: CGWB की आकलन रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब का कुल सालाना भूजल रिचार्ज 18.60 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) है और सालाना निकाले जा सकने वाले संसाधनों का अनुमान 16.80 BCM. इसके सापेक्ष पंजाब में सालाना भूजल निकासी 26.27 BCM है. इसके आधार पर, भूजल निकासी का स्तर पंजाब में 156.36% है। 

पंजाब के 153 ब्लॉकों में से 111 (72.55%) को 'ओवर-एक्सप्लॉयटेड' (अत्यधिक दोहन वाले) श्रेणी में रखा गया है. 10 ब्लॉक 'क्रिटिकल' (गंभीर), 15 'सेमी-क्रिटिकल' (आंशिक रूप से गंभीर) और 17 'सेफ' (सुरक्षित) श्रेणी में हैं। 

हरियाणा-राजस्थान में ग्राउंडवाटर लेवल गिरा: राजस्थान का स्वाभाविक रूप से शुष्क राज्य है. इसके 302 ब्लॉकों में से 214 अति-दोहित श्रेणी में आ चुके हैं. राज्य में भूजल दोहन की दर 147.11 फीसदी तक पहुंच गई है. इंदिरा गांधी नहर होने के बावजूद भूजल पर निर्भरता राज्य में कम नहीं हुई है. वहीं, हरियाणा में भूजल दोहन की दर 136% से अधिक हो चुकी है. पिछले एक दशक में हरियाणा राज्य के कई जिलों में जलस्तर औसतन 5 से 7 मीटर तक नीचे चला गया है। 

बेंगलुरु में हर साल दिखता जल संकट: दक्षिण भारत की जमीन कठोर चट्टानी (Hard Rock Aquifers) है. यहां उत्तर भारत के मैदानी इलाकों की तरह रेतीली या जलोढ़ मिट्टी नहीं है जो पानी को सोखकर नीचे स्टोर करके रख सके. यहां की चट्टानों में पानी सीमित मात्रा में रहता है जिसे एक बार निकाल लिया जाए तो रीचार्ज होने में सैकड़ों साल लगते हैं. यही कारण है कि बेंगलुरु जैसे शहरों में पानी का संकट हर साल गर्मियों में देखने को मिलता है। 

पूर्वोत्तर राज्यों में भूजल लेवल अच्छा लेकिन, क्वालिटी खराब: बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और ओडिशा जैसे राज्यों में ग्राउंडवाटर अभी सुरक्षित श्रेणी में है. यहां भूजल का दोहन 50% से भी कम है. इन राज्यों में अधिक बारिश और गंगा-ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों का होना, ग्राउंडवाटर लेवल को मेंटेन करके रखे हुए है. लेकिन, इस पानी की गुणवत्ता का संकट है. पश्चिम बंगाल और बिहार के कई जिलों के भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड खतरनाक स्तर पर है. इससे यह पानी पीने योग्य नहीं रह गया है। 

क्या ग्राउंडवाटर लेवल बढ़ाना संभव है: केंद्र सरकार अपनी विभिन्न योजनाओं के जरिए भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए काम कर रही है. राज्यों को केंद्र सरकार तकनीकी और वित्तीय सहायता दे रही है. देश में पानी/भूजल संसाधनों को बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार मुख्य रूप से 'जल शक्ति अभियान' (JSA) चला रही है. यह एक समय-सीमा वाला और मिशन मोड कार्यक्रम है, जिसे 2019 से जल शक्ति मंत्रालय चला रहा है। 

इसके तहत सभी प्रयासों और फंड को एक साथ लाकर जमीनी स्तर पर जल संचयन और कृत्रिम पुनर्भरण (artificial recharge) के काम किए जाते हैं. JSA के तहत पिछले 4 साल में देश भर में लगभग 1.21 करोड़ जल संरक्षण और कृत्रिम पुनर्भरण कार्यों को पूरा किया गया है, जिसने भूजल संसाधनों की स्थिरता को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। 

भूजल स्थिरता के लिए सरकार के प्रयास

    जल संचय जन भागीदारी: यह जल शक्ति अभियान का एक सामुदायिक विस्तार है, जिसका मकसद वर्षा जल संचयन को एक बड़े राष्ट्रीय आंदोलन में बदलना है। 

    अटल भूजल योजना: यह 7 राज्यों के 80 जल-संकट वाले जिलों में लागू की गई भूजल प्रबंधन की एक सहभागी योजना है। 
    अमृत (AMRUT) और अमृत 2.0: शहरी जल निकायों के कायाकल्प के माध्यम से शहरों को जल-सुरक्षित बनाने पर केंद्रित यह एक शहरी विकास योजना है। 

    शैलो एक्विफर मैनेजमेंट (SAM): शहरी भूजल की कमी और जल-जमाव की समस्या से निपटने के लिए आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) के तहत यह एक लक्षित पायलट प्रोग्राम है। 
    मिशन अमृत सरोवर: हर जिले में कम से कम 75 जल निकायों को विकसित और पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से शुरू की गई यह एक राष्ट्रीय योजना है। 
    NAQUIM 2.0: जल-संकट और पानी की गुणवत्ता से प्रभावित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग करने वाला यह एक एडवांस्ड एक्विफर मैपिंग प्रोजेक्ट है। 
    भूजल के कृत्रिम पुनर्भरण (Artificial Recharge) के लिए मास्टर प्लान-2020: कृत्रिम जल पुनर्भरण के लिए राज्यों के साथ साझा किया गया यह एक व्यापक राष्ट्रीय ब्लूप्रिंट है। 
    अटल भूजल योजना के तहत 83,000 संरचनाएं बनाई गईं, जिनमें चेक डैम, तालाब और शाफ्ट शामिल हैं। 
    9 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को कुशल सिंचाई प्रणालियों के दायरे में लाया गया। 
    पूरे भारत में 69,000 अमृत सरोवरों का सफलतापूर्वक निर्माण या कायाकल्प किया गया। 
    मास्टर प्लान के तहत 185 BCM पानी संचयन के लिए 1.42 करोड़ संरचनाओं की योजना बनाई गई। 

सरकारी प्रयासों ने भूजल में किया सुधार: सरकार के प्रयासों के परिणामस्वरूप देश में भूजल की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है. CGWB के डायनामिक भूजल संसाधन मूल्यांकन डेटा के अनुसार, 2017 से 2025 के बीच देश में कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण 432 BCM से बढ़कर 448.52 BCM हो गया है. इसी तरह, सुरक्षित मूल्यांकन इकाइयों का प्रतिशत 62.6% से बढ़कर 73.14% हो गया है. अत्यधिक दोहन वाली इकाइयों का प्रतिशत 17.2% से घटकर 10.8% हो गया है। 

भूजल खत्म होने के कगार पर कैसे पहुंचा: सदियों से जमीन के नीचे दबा अकूत लीटर पानी आखिर खत्म कैसे हो रहा है. दरअसल, इसके जिम्मेदार हम इंसान ही हैं, इसका कोई प्राकृतिक कारण नहीं है. भारत हो या दुनिया का कोई अन्य देश सभी जगह पानी का सबसे ज्यादा प्रयोग खेती में होता है. बात भारत की करें तो यहां पर दोषपूर्ण फसल चक्र भूजल को खत्म करने का सबसे बड़ा कारण है। 

उदाहरण स्वरूप, भारत के जिन इलाकों में बारिश कम होती है,वहां गन्ना और धान जैसी फसलें उगाई जा रही हैं. यह सीधे तौर पर पानी की बर्बादी जैसा है. ऐसे राज्य पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र का मराठवाड़ा है, जहां बारिश कम होती है लेकिन, इन फसलों को काफी ज्यादा क्षेत्र में उगाया जाता है। 

फ्री बिजली की राजनीति ने किया बेड़ागर्क: देश के कई राज्यों की सरकारें वोट के चक्कर में बिजली फ्री बांट रही हैं. किसानों को कृषि के लिए मुफ्त या अत्यधिक सब्सिडी वाली बिजली दी जाती है. इससे ट्यूबवेल दिन-रात चलते रहते हैं. क्योंकि पानी निकालने के लिए किसी तरह का पैसा नहीं चुकाना पड़ता। 

ऐसे में भूजल का ज्यादा दोहन हो रहा है. इसके साथ ही शहरों में तालाबों, झीलों को पाटकर इमारतें बना दी गई हैं. जमीन की मिट्टी के ऊपर कंक्रीट बिछ रही है. ऐसे में बारिश का पानी जमीन के भीतर रिसकर नहीं जा पा रहा और वाटर रीचार्ज में कमी आ रही है। 

क्या है भूजल: भूजल वह पानी है जो जमीन की सतह के नीचे सेचुरेटेड जोन में मौजूद होता है. इसकी ऊपरी सतह को वाटर टेबल कहा जाता है. आम धारणा के विपरीत, भूजल जमीन के नीचे नदियां नहीं बनाता है. यह रेत, बजरी और अन्य चट्टानों जैसी जमीन के नीचे की दरारों को भरता है. अगर भूजल चट्टानी सामग्रियों से प्राकृतिक रूप से बाहर बहता है या इसे पंपिंग के जरिए निकाला जाता है, तो उन चट्टानी सामग्रियों को 'एक्विफर' (aquifers) कहा जाता है। 

भूजल धीरे-धीरे चलता है, आमतौर पर एक्विफर में इसकी गति 7-60 सेंटीमीटर (3-25 इंच) प्रति दिन होती है. नतीजतन, पानी एक्विफर में सैकड़ों या हजारों सालों तक रह सकता है. संयुक्त राज्य अमेरिका में सार्वजनिक आपूर्ति के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी का लगभग 40 प्रतिशत और खेती के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी का लगभग 39 प्रतिशत हिस्सा भूजल से आता है। 

 

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