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उत्तर प्रदेश

अखिलेश का लंदन दौरा बना चर्चा का विषय, सियासी गलियारों में तेज हुई अटकलें

लखनऊ 
यूपी की राजनीति में एक खतरनाक खेल चल रहा है। यह खेल अजीब है लेकिन बहुत जाना-पहचाना भी है। जब भी सूबे में किसी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम की तपिश बढ़ती है, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव अचानक विदेश की ओर निकल जाते हैं। 
यानी, जब राज्य में विपक्ष की जमीनी मौजूदगी की जरूरत सबसे ज्यादा होती है, तब अक्सर वह अपनी 'रहस्यमयी' विदेशी यात्रा पर होते हैं। यहां एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या यह महज कोई इत्तेफाक है? या फिर किसी गहरे षड्यंत्र का हिस्सा? यह कोई आम छुट्टियां बिताने का कार्यक्रम तो किसी भी एंगल से बिल्कुल नहीं लगता। 

इसी बीच, राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज है। कहा जा रहा है कि यह केवल निजी यात्राएं नहीं हैं बल्कि इनके पीछे एक बड़ा मकसद है। लंदन और अमेरिका में भारत-विरोधी संस्थाएं सक्रिय हैं। ये संस्थाएं अराजकता फैलाने के लिए फंडिंग करती हैं। शक है कि 2027 के यूपी चुनावों के लिए विदेशी समर्थन जुटाया जा रहा है। 
जाहिर है कि चुनाव जीतने के लिए विदेशी मदद लेना कितना खतरनाक हो सकता है। उस पर भी, खासकर उन ताकतों से जिनका इतिहास ही सरकारें गिराने का रहा है।
तो, आखिरकार क्या है अखिलेश की इन निजी विदेश यात्राओं का मकसद? क्या इसके तार विदेशी प्रोपेगेंडा एजेंसियों से जुड़े हैं? क्या सत्ता परिवर्तन कराने वाले विदेशी ताकतें भी इसमें शामिल हैं? आइए, परत-दर-परत इस पूरे मामले की पड़ताल करते हैं।

सियासी तपिश के बीच विदेशी यात्राओं की टाइमिंग से उठे सवाल
अखिलेश यादव का ट्रैक रिकॉर्ड देखिए। राजनीति छोड़कर अचानक विदेश जाना उनके लिए नया नहीं है। सूबे की राजनीति जब भी गरमाई, वे अक्सर विदेश में ही रहे। वैसे तो समाजवादी पार्टी इन्हें हमेशा निजी दौरा बताती है, लेकिन इन दौरों की टाइमिंग शक के दायरे में रही है।
जून 2018 को याद कीजिए। अखिलेश परिवार के साथ विदेशी छुट्टी पर गए थे। तब सपा विपक्ष को एकजुट कर रही थी। लखनऊ के सरकारी बंगले में नुकसान का विवाद भी चल रहा था। ऐसे गंभीर समय में उनके विदेश जाने पर सवाल उठे थे।
वहीं, साल 2020 में हाथरस कांड हुआ। यह पूरे देश का सबसे बड़ा मुद्दा था। सभी विपक्षी नेता हाथरस पहुंच रहे थे, लेकिन अखिलेश यादव तब भी विदेश में थे।

हद तो 2025 में हो गई। लोकसभा चुनाव 2024 में सपा ने वापसी की थी और 2025 के बजट सत्र में अखिलेश को सरकार का घेराव करना चाहिए था। लेकिन, वे परिवार के साथ लंदन टूर पर चले गए और देश में राजनीति करने के बजाय वे विदेश में जश्न मना रहे थे। 
उन्होंने अपनी पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान नहीं दिया। प्रदेश के मुद्दों पर सक्रियता नहीं दिखाई। खुद पर लगे आरोपों का जवाब भी नहीं दिया। वे सिर्फ विदेश घूमने में व्यस्त रहे। उन्हें विदेश यात्रा का भारी शौक है। वे अब तक ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन और चीन जा चुके हैं। स्विट्जरलैंड, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, कनाडा और जापान की भी यात्रा कर चुके हैं।

आखिर क्यों अखिलेश को प्रिय है पश्चिमी प्रोपेगेंडा?
अखिलेश यादव अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेशी रिपोर्टें खूब लहराते हैं। ऐसा लगता है कि मानो वे बीबीसी की रिपोर्ट को 'ईश्वरीय फरमान' मानते हैं। लेकिन, इस बीबीसी की असलियत क्या है? 

यह किसी से छिपा नहीं है कि बीबीसी की विचारधारा औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त है। बीबीसी की रिपोर्टें भारत के खिलाफ पूर्वाग्रह से भरी होती हैं। वे पश्चिमी नजरिए से भारत की छवि बिगाड़ते हैं। कश्मीर और मानवाधिकार पर इनकी रिपोर्टिंग एकतरफा है। सरकार ने इनकी डॉक्यूमेंट्री 'इंडिया: द मोदी क्वेश्चन' को तो शत्रुतापूर्ण प्रचार तक बता दिया था।
बीबीसी का यही एजेंडा यूपी में भी दिखता है। भाजपा शासित राज्यों को लेकर बीबीसी का रुख नकारात्मक है। महाकुम्भ में भगदड़ की झूठी कवरेज की गई। साथ ही, सक्षम कूड़ा निस्तारण प्रणाली पर और त्रिवेणी के स्नान के जल की शुद्धता पर अंगुली उठाई गई। बीबीसी ने हमेशा एकतरफा और पूर्वाग्रह से ग्रसित रिपोर्टिंग की है। 

निश्चित तौर पर, अखिलेश ने कभी इन मुद्दों का जाया नहीं जाने दिया। कोई बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस हो, बीबीसी ने अगर उस मुद्दे पर कवरेज की है तो उसका प्रिंट आउट अखिलेश के हाथ में लहराना स्वभाविक हो जाता है। 
चाहें महाकुम्भ हो या फिर कोई और मुद्दा, अखिलेश के लिए तो बीबीसी की रिपोर्ट जैसे 'ब्रह्मवाक्य' बन गई। इसी प्रकार हाल ही में, राम मंदिर में चंदा चोरी के प्रकरण को लेकर बीबीसी की रिपोर्ट का भी खूब उल्लेख किया गया। 

आखिर कितनी निष्पक्ष हैं बीबीसी जैसी संस्थाएं?
एक ओर, जहां अखिलेश अकसर देश की मीडिया पर एकतरफा कवरेज और पूर्वाग्रह से ग्रसित होने के आरोप लगाते रहे हैं, वहीं उनके पसंदीदा बीबीसी की असल सच्चाई तो और भी चौंकाने वाली है।

यूरोप और ब्रिटेन में भी बीबीसी पर पक्षपाती होने के गम्भीर आरोप लगते हैं। इसे वामपंथी या उदारवादी झुकाव वाला माना जाता है। स्टाफ से लेकर रिपोर्टिंग और कंटेंट ओरिएंटेशन तक पर भी वाम-उदारवादी विचारधारा थोपने के आरोप लगते रहे हैं।
बीबीसी की 'निष्पक्षता' का बड़ा पर्दाफाश अमेरिका में तब हुआ था जब डोनाल्ड ट्रम्प से जुड़ी एक डॉक्यूमेंट्री में भारी फर्जीवाड़ा हुआ था। इसमें तथ्यों को जानबूझकर गलत रूप में पेश किया गया था।

इसके कारण बीबीसी के महानिदेशक टिम डेवी को इस्तीफा देना पड़ा था और समाचार प्रमुख डेबोरा टर्नेस को भी अपना पद छोड़ना पड़ा। जिस संस्था के शीर्ष अधिकारियों पर तथ्यों के छेड़छाड़ के आरोप लगे हों, उसकी रिपोर्ट पर सपा मुखिया का इतना भरोसा कई सवालों को जन्म देता है। 
इसी कड़ी में सबसे प्रमुख सवाल यही है कि विश्वसनीयता के लिए बीबीसी और विदेशी संस्थाओं पर ही इतना भरोसा आखिर क्यों, कहीं ये किसी विदेशी टूलकिट से प्रेरित राजनीति का हिस्सा तो नहीं है?

कहीं राहुल गांधी की 'मॉडस ऑपरेंडी' की नकल तो नहीं कर रहे अखिलेश?
इस खेल को समझने के लिए कांग्रेस पार्टी के सांसद और वरिष्ठ नेता राहुल गांधी की विदेश यात्राओं के पैटर्न को समझना होगा। अखिलेश यादव के मित्र और इंडी गठबंधन में शामिल राहुल गांधी भी विदेश यात्राओं के बेहद शौकीन हैं। हाल ही में वे 20 दिनों की विदेश यात्रा से लौटे हैं। उनकी इस यात्रा में लंदन, जर्मनी और फिनलैंड शामिल थे। यह यात्रा काफी निजी और गुप्त रखी गई थी। 
ऐसी ही एक यात्रा उन्होंने सितंबर 2024 में अमेरिका की भी की थी। इस दौरान उनकी मुलाकात अमेरिकी सांसद इल्हान उमर से हुई, जो अपने भारत विरोधी विचारधारा के लिए जानी जाती है। वहीं, इसी यात्रा के दौरान जर्मनी में एक खास मुलाकात का भी उल्लेख आता है, जिसको लेकर दावा किया जाता है कि यह मुलाकात जॉर्ज सोरोस के नेटवर्क से जुड़े लोगों से हुई थी। सोरोस पर भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को अस्थिर करने के आरोप हैं।
ऐसे में, जब भारत के नेता विदेशी दौरों पर ऐसे लोगों या शक्तियों से मिलते हैं, जिनकी मंशा भारत में 'सत्ता परिवर्तन' की साजिश पर टिकी हो, तो सवाल उठने स्वभाविक हो जाते हैं। इसी कड़ी में अब अखिलेश की वर्तमान यात्राओं को लेकर भी उठ रहे हैं। 

..ऐसे तो यूपी में नहीं गलेगी दाल
सियासी गलियारों में इस बात को लेकर चर्चाएं हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि अखिलेश यादव भी यही कर रहे हैं? क्या वे बीबीसी और अराजक संगठनों से गठजोड़ कर रहे हैं और क्या 2027 के चुनाव को विदेशी फंडिंग व प्रोपगंडा से प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है?
इन्हीं संकेतकों की ओर हाल ही में सुभासपा सुप्रीमो और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने भी अंगुली उठायी है। उनके अनुसार, ऐसी चर्चा है कि अखिलेश यादव ने चुनाव जीतने के लिए आपने एक विदेशी कंपनी को खुफिया काम पर लगाया हुआ है। 
इसी बात को लेकर राजभर ने अखिलेश को सलाह तक दे डाली कि विदेशियों के चक्कर में मत पड़िए, वर्ना चुनावी प्रतिष्ठा तो जा चुकी है पैसा भी बर्बाद हो जाएगा। अगर फंडिंग से ही चुनाव जीता जाता तो राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल घर में बेरोजगार नहीं बैठे होते।
जाहिर है, अखिलेश भी अगर राहुल गांधी की मॉडस ऑपरेंडी पर चलेंगे तो इससे समाज में संदेश जाएगा कि उनके पास जमीन पर लड़ने का माद्दा नहीं बचा है। 
वैसे भी, यूपी की जनता इन बातों से अच्छी तरह से परिचित है और यही कारण है कि यहां विदेशी टूलकिल के अनुसरण से दाल गलाना आसान नहीं है।

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