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मध्यप्रदेश

परोपकारी संस्थाओं के प्रोत्साहन से दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का किया जाएगा सशक्तीकरण

भोपाल

उप मुख्यमंत्री एवं लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के मंत्री  राजेन्द्र शुक्ल की अध्यक्षता में वल्लभ भवन में मध्यप्रदेश (परोपकारी संस्थाओं के लिए) मेगा स्वास्थ्य सेवा अधोसंरचना प्रोत्साहन नीति-2026 के प्रारूप पर मंत्रिपरिषद समिति ने विमर्श किया। बैठक में प्रस्तावित नीति के विभिन्न प्रावधानों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया और समिति के सदस्यों ने नीति को जन-केंद्रित, सेवा-उन्मुख, गरीब एवं वंचित वर्गों की स्वास्थ्य आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने संबंधी महत्वपूर्ण सुझाव दिए।

बैठक में मंत्रिपरिषद समिति के सदस्य सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री  चैतन्य काश्यप, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री  नरेन्द्र शिवाजी पटेल, पंचायत एवं ग्रामीण विकास राज्य मंत्री मती राधा सिंह सहित अपर मुख्य सचिव लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा  अशोक बर्णवाल, आयुक्त  धनराजू एस तथा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

उप मुख्यमंत्री  शुक्ल ने कहा कि प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण तृतीयक एवं सुपर स्पेशलिटी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाना समय की आवश्यकता है। विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, ग्रामीण क्षेत्रों तथा दूरस्थ अंचलों के नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए परोपकारी संस्थाओं की सहभागिता को प्रोत्साहित किया जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित नीति का मूल उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को सेवा-भाव एवं सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ आमजन तक पहुंचाना है।

वर्तमान में प्रदेश गुणवत्तापूर्ण तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एवं पहुंच के क्षेत्र में चुनौतियों का सामना कर रहा है। सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों सहित उच्चस्तरीय स्वास्थ्य संस्थान मुख्यतः बड़े शहरों तक सीमित हैं, जिससे प्रदेश के अन्य क्षेत्रों के नागरिकों को उपचार के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। साथ ही विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी भी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को प्रभावित करती है। प्रस्तावित नीति का उद्देश्य प्रदेश में उच्चस्तरीय तृतीयक एवं सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों की स्थापना को प्रोत्साहित करना, चिकित्सा शिक्षा का विस्तार करना, विशेषज्ञ एवं एमबीबीएस चिकित्सकों की उपलब्धता बढ़ाना, गरीब मरीजों को गुणवत्तापूर्ण उपचार उपलब्ध कराना, अन्य राज्यों में उपचार के लिये मरीजों के पलायन को कम करना तथा मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार लाना है।

नीति के अंतर्गत केवल सेवा-उन्मुख एवं लाभ-निरपेक्ष परोपकारी संस्थाओं को पात्र माना जाएगा। इनमें कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के अंतर्गत पंजीकृत कंपनियां, भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 के अंतर्गत पंजीकृत धर्मार्थ ट्रस्ट तथा सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत पंजीकृत संस्थाएं शामिल हो सकेंगी। पात्र संस्थाओं के लिए न्यूनतम तीन वर्ष का पंजीकरण एवं सेवा गतिविधियों का संतोषजनक अनुभव होना प्रस्तावित किया गया है। चिकित्सा महाविद्यालय एवं नर्सिंग कॉलेज जैसी अतिरिक्त सुविधाएं विकसित करने वाली संस्थाओं को प्राथमिकता दिए जाने का भी प्रस्ताव है।

बैठक में प्रस्तावित प्रोत्साहनों की भी समीक्षा की गई। इसके अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा उपयुक्त भूमि का चयन कर रियायती दरों पर दीर्घकालीन लीज पर उपलब्ध कराने, सुपर स्पेशलिटी सेवाओं के लिये उच्च लागत वाले चिकित्सा उपकरणों पर निर्धारित शर्तों के अधीन अनुदान उपलब्ध कराने तथा विभिन्न स्वीकृतियों के लिए सिंगल-पॉइंट क्लियरेंस प्रणाली विकसित करने जैसे प्रावधानों पर चर्चा की गई।

मंत्रिपरिषद समिति ने नीति के प्रारूप का परीक्षण करते हुए सुझाव दिया कि इसके सभी प्रावधानों का केंद्र बिंदु आमजन, विशेषकर गरीब एवं वंचित वर्गों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना होना चाहिए। समिति ने नीति को अधिक सेवा-उन्मुख, पारदर्शी एवं जनहितकारी स्वरूप प्रदान करने पर बल दिया।

 

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