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विदेश

ट्रंप के बदले सुर से मची हलचल, समझौते के बाद ईरान की मिसाइलों पर दिया चौंकाने वाला बयान

वाशिंगटन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो ईरान की मिसाइलों के जखीरे को खत्म करना चाहते थे, वो अब अपनी बात से पलट चुके हैं. उन्होंने कहा कि ईरान को कुछ बैलिस्टिक मिसाइलें रखने की इजाजत दी जा सकती है. जी-7 सम्मेलन के दौरान फ्रांस में ट्रंप ने इस बात का बचाव किया. उन्होंने कहा कि अगर दूसरे देशों के पास मिसाइलें हैं तो ईरान को भी कुछ रखने की अनुमति मिलनी चाहिए। 

ट्रंप ने स्पष्ट किया कि मिसाइलें कोई बड़ी समस्या नहीं हैं क्योंकि वे सिर्फ एक जगह को नुकसान पहुंचाती हैं, लेकिन न्यूक्लियर हथियार पूरे ग्रह को तबाह कर सकते हैं. उन्होंने सऊदी अरब और कतर जैसे देशों का उदाहरण दिया जिनके पास मिसाइलें हैं। 

ट्रंप का कहना है कि ईरान को भी अनुपात में कुछ मिसाइलें रखने की छूट मिलनी चाहिए. इस बयान से अमेरिकी नीति में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं क्योंकि पहले ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने पर जोर दिया जा रहा था। 

ईरान के साथ समझौते की पृष्ठभूमि
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी. उस समय ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को खत्म करना और उसके न्यूक्लियर हथियार बनाने की कोशिश को रोकना मुख्य लक्ष्य था. लेकिन अब ट्रंप प्रशासन इस मुद्दे को कम महत्व दे रहा है। 

ट्रंप ने कहा कि अगर यह समझौता नहीं होता तो और तीन-चार हफ्ते बमबारी जारी रखी जाती, लेकिन इससे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद हो जाता और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारी तबाही आ जाती. ट्रंप ने कहा कि अगर हम बमबारी जारी रखते तो रोज 500-700 मिलियन डॉलर का खर्च होता. हम चार हफ्तों में हथियारों के भंडार खत्म कर देते। 

उन्होंने समझौते को आर्थिक तबाही से बचाने वाला बताया. ईरानी विदेश मंत्रालय ने घोषणा की कि दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने इस MOU पर आधिकारिक तौर पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. समझौते का पूरा टेक्स्ट अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिसकी वजह से आलोचना हो रही है। 

यूरेनियम स्टॉक पर ट्रंप की नरम राय
समझौते में ईरान को अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम स्टॉक को सौंपने की शर्त नहीं रखी गई है. यह स्टॉक 11 परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त माना जाता है. इसके बजाय दोनों देश अगले दो महीनों में इस मुद्दे पर बातचीत करेंगे. ट्रंप ने कहा कि ईरान इन स्टॉक तक पहुंच ही नहीं सकता क्योंकि अमेरिका ने उसके तीन मुख्य न्यूक्लियर साइटों को बमबारी से तबाह कर दिया है।  

ट्रंप का दावा है कि न्यूक्लियर डस्ट मलबे के नीचे दबा हुआ है और सिर्फ अमेरिका व चीन के पास उसे निकालने का उपकरण है. उन्होंने इसे मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण बताया लेकिन व्यावहारिक रूप से कम मूल्यवान माना. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान के पास अन्य जगहों पर भी कम संवर्धित यूरेनियम का स्टॉक हो सकता है. ट्रंप ने फिर भी कहा कि अगले दो महीनों में यह मुद्दा चर्चा का मुख्य विषय रहेगा। 

आगे की बातचीत और धमकी
ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि अगर ईरान समझौते का उल्लंघन करता है तो अमेरिका फिर से बमबारी करेगा. उन्होंने कहा कि अगर वे समझौते का पालन नहीं करेंगे तो हम उन पर भारी बमबारी करेंगे. MOU एक सामान्य दस्तावेज है जिसमें सख्त कानूनी बाध्यता नहीं है. ट्रंप का कहना है कि बमबारी की धमकी ही काफी है। 

उन्होंने यह भी माना कि यह स्थायी रोक तभी तक है जब तक वे राष्ट्रपति हैं. अगर कोई कमजोर राष्ट्रपति आया तो स्थिति बदल सकती है. अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि अगले 60 दिनों में स्विट्जरलैंड में और बातचीत होगी. इस दौरान ईरान को कुछ प्रतिबंधों में छूट दी जा रही है, खासकर तेल निर्यात पर. अमेरिका का कहना है कि यह छूट बहुत ज्यादा नहीं है क्योंकि ईरान पहले भी छूट-छूटकर तेल बेच रहा था। 

आर्थिक और वैश्विक प्रभाव
ट्रंप ने कहा कि ज्यादा बमबारी से वैश्विक तेल कीमतें आसमान छू जातीं और आर्थिक संकट आ जाता. अब समझौते से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुला रहेगा. तेल आपूर्ति बनी रहेगी. अमेरिका ईरानी फंड्स को भी वापस करने पर विचार कर रहा है जो पहले फ्रीज किए गए थे. ट्रंप का तर्क है कि अगर अमेरिका वह पैसा नहीं लौटाएगा तो कोई भी डॉलर में निवेश नहीं करेगा। 

ईरान पर युद्ध से सैकड़ों अरब डॉलर का नुकसान हुआ है. इसके मुकाबले प्रतिबंधों में छूट सिर्फ कुछ अरब डॉलर की है. अमेरिकी अधिकारी इसे न्यायसंगत समझौता बता रहे हैं. हालांकि इजरायल इस समझौते से संतुष्ट नहीं दिख रहा है. ट्रंप ने इजरायल को MOU की कॉपी भेजने की बात कही, लेकिन इजरायली मीडिया में पहले खबर आई थी कि अमेरिका ने इजरायल को टेक्स्ट दिखाने से इनकार कर दिया था। 

समझौते की कमियां और आलोचना
यह समझौता काफी सामान्य है. इसमें ईरान सिर्फ यह दोहराता है कि वह न्यूक्लियर हथियार नहीं बनाएगा. ट्रंप का दावा है कि यह ईरान को स्थाई रूप से न्यूक्लियर हथियार से रोकेगा, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह सिर्फ शब्दों का खेल है. ईरान ने स्विट्जरलैंड में होने वाली बैठक को टालने का संकेत दिया है। 

अमेरिका का कहना है कि अगले दो महीनों की बातचीत में असली रियायतें ली जाएंगी. इस बीच तेल निर्यात बढ़ाने की कोशिश की जा रही है ताकि अगर फिर युद्ध हुआ तो दुनिया तैयार रहे. कतर के साथ साझा गैस फील्ड का उदाहरण देकर अमेरिका ने कहा कि पैसा या तो विकास में लगाया जा सकता है या आतंकवाद को बढ़ावा देने में। 

आगे क्या होगा?
यह समझौता अमेरिका-ईरान संबंधों में नया मोड़ है. ट्रंप इसे अपनी कूटनीतिक जीत बता रहे हैं, जबकि आलोचक इसे ईरान को बहुत ज्यादा छूट देने वाला समझौता मान रहे हैं. अगले दो महीनों में होने वाली बातचीत बहुत महत्वपूर्ण होगी. अगर ईरान ने रियायतें दीं तो स्थायी समझौता हो सकता है, वरना फिर तनाव बढ़ सकता है। 

ट्रंप की नीति शक्ति के साथ शांति की लगती है- एक तरफ समझौता और दूसरी तरफ बमबारी की धमकी. दुनिया अब देख रही है कि यह रणनीति कितनी सफल होती है. ईरान के पास मिसाइलें रहने की इजाजत, यूरेनियम पर ढील और तेल निर्यात पर छूट- ये सब मिलकर मध्य पूर्व की राजनीति को नया रूप दे सकते हैं। 

भारत जैसे देशों के लिए भी इसका असर होगा क्योंकि तेल की कीमतें, क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक अर्थव्यवस्था इससे जुड़ी हुई हैं. फिलहाल ट्रंप का यह बयान और समझौता दोनों तरफ से सवाल खड़े कर रहा है – क्या यह वाकई शांति की ओर बढ़ता कदम है या सिर्फ अस्थायी राहत?

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