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उत्तर प्रदेश

यूपी के कुकरैल में घड़ियाल संरक्षण की सफलता, 1970 से अब तक बड़ी उपलब्धि

लखनऊ
यूपी में कभी विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके घड़ियाल आज सफल संरक्षण का घंटा बजा रहे हैं। लखनऊ स्थित कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र ने ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसकी गूंज अब देश ही नहीं, विदेश के कई चिड़ियाघरों तक सुनाई दे रही है।

कुकरैल के वैज्ञानिक कैप्टिव ब्रीडिंग (बंदी प्रजनन) मॉडल को नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी ने भारत के सबसे सफल संरक्षण प्रोजेक्ट्स में शामिल किया है। यही वजह है कि यहां जन्मे घड़ियाल आज भूटान, पाकिस्तान के साथ-साथ अमेरिका (न्यूयॉर्क) और जापान के चिड़ियाघरों में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। ये देश भी इस मॉडल को अपनाने की पहल कर रहे हैं।

1970 के दशक में स्थिति बेहद गंभीर थी, जब पूरे देश में केवल 250 से 300 घड़ियाल ही बचे थे। इस संकट को देखते हुए 1975 में कुकरैल पुनर्वास केंद्र की स्थापना की गई। शुरुआत में चंबल नदी (इटावा) से अंडे लाकर वैज्ञानिक तरीके से हैचिंग की गई और घड़ियाल संरक्षण की नींव रखी गई। 1988 से यहां नियमित प्रजनन शुरू हुआ और आज स्थिति यह है कि केंद्र में 466 घड़ियाल मौजूद हैं। हर वर्ष लगभग 140 से 160 नए घड़ियाल यहां जन्म ले रहे हैं। इस वर्ष नमामि गंगे परियोजना के तहत 500 अंडों को हैच करने का लक्ष्य तय किया गया है।

नदियों को मिल रहा नया जीवन
कुकरैल में जन्म लेने वाले घड़ियालों को ढाई वर्ष तक विशेष देखरेख में रखा जाता है, जिसके बाद उन्हें गंगा, घाघरा, चंबल, गेरुआ और गंडक जैसी नदियों में छोड़ा जाता है। इससे नदियों का पारिस्थितिक संतुलन मजबूत हो रहा है और जैव विविधता को नई ऊर्जा मिल रही है। इसके अलावा दुधवा, कतर्नियाघाट, हस्तिनापुर और महाराजगंज की नदियों में भी घड़ियाल फल-फूल रहे हैं।

राज्य ईको-पर्यटन का बड़ा केंद्र बनकर उभरा
उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह के अनुसार, राज्य ईको-पर्यटन का बड़ा केंद्र बनकर उभरा है और दुर्लभ घड़ियालों को देखने देश-विदेश से पर्यटक आ रहे हैं। कुकरैल केंद्र में म्यूजियम और इंटरप्रिटेशन सेंटर जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं, जहां हर साल लगभग दो लाख घरेलू और सैकड़ों विदेशी पर्यटक पहुंच रहे हैं। सनातन परंपरा में देवी गंगा के वाहन मकर के रूप में पूजनीय यह जीव आज उत्तर प्रदेश के प्रयासों से वैश्विक पटल पर नई जिंदगी पा चुका है।

 

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