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विदेश

खुफिया विवाद से हड़कंप: अमेरिकी वार्ताकारों पर निगरानी के आरोप, इज़रायल पर सवाल

नई दिल्ली
 मिडल ईस्ट में चल रहे युद्ध के बीच नई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इजरायली खुफिया एजेंसियां ईरान के साथ शांति समझौते के लिए प्रयासरत अमेरिकी वार्ताकारों पर जासूसी कर रही हैं। इस घटना ने अमेरिकी खुफिया अधिकारियों में इजरायल की जासूसी गतिविधियों को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

मीडिया रिपोर्ट र्ट के अनुसार, हालिया अमेरिकी खुफिया आकलनों में इस बात पर चिंता जताई गई है कि जब तेहरान के साथ बातचीत रुकी हुई है, तब इजरायल ने वाशिंगटन की बातचीत की स्थिति के बारे में जानकारी जुटाने के प्रयास तेज कर दिए हैं।

इजरायली खुफिया सेवाओं ने वार्ता में शामिल वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों की निगरानी बढ़ा दी है। इनमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुख्य वार्ताकार स्टीव विटकॉफ, पेंटागन के नीति प्रमुख एलब्रिज कोल्बी और वरिष्ठ रक्षा अधिकारी माइकल डिमिनो शामिल हैं।

खुफिया इकाइयों ने यह चिंता जताई है कि इजरायली एजेंसियां वाशिंगटन और तेहरान के बीच शांति समझौते को हासिल करने के उद्देश्य से विटकॉफ और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की बातचीत को मॉनिटर करने का प्रयास कर रही थीं।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका और इजरायल ईरान के खिलाफ घनिष्ठ सैन्य सहयोग जारी रखे हुए हैं, लेकिन साथ ही अमेरिका तेहरान के साथ दीर्घकालिक समझौता करने के कूटनीतिक प्रयास भी कर रहा है।

क्रिटिकल स्तर पर पहुंचा खतरे का स्तर
अमेरिका और इजरायल ऐतिहासिक रूप से यह स्वीकार करते रहे हैं कि दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ खुफिया अभियान चलाते हैं, लेकिन कुछ अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इजरायल की हालिया गतिविधियों ने एक स्वीकार्य सीमा को पार कर लिया है।

डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी और अन्य सैन्य खुफिया एजेंसियों द्वारा तैयार किए गए एक अलग खुफिया आकलन में हाल के हफ्तों में इजरायल द्वारा उत्पन्न काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे को हाई से बढ़ाकर क्रिटिकल कर दिया गया है। इस रिपोर्ट में अमेरिकी सैन्य कर्मियों और सरकारी अधिकारियों पर खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के इजरायली प्रयासों को रेखांकित किया गया है।

जासूसी के लिए फोन टैपिंग
रिपोर्ट के अनुसार, 2024 के अंत से इजरायली खुफिया गतिविधियों के संदिग्ध मामलों में वृद्धि हुई है, जब गाजा में सैन्य अभियानों के संचालन को लेकर वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच तनाव पैदा हुआ था। 2025 में भी यह चिंताएं जारी रहीं, जब ट्रंप प्रशासन ने ईरान के संबंध में सैन्य और कूटनीतिक विकल्पों पर विचार किया।

इन घटनाओं में यह आरोप भी शामिल है कि इजरायल में तैनात अमेरिकी रक्षा कर्मियों ने पाया कि उनके मोबाइल फोन में संचार को इंटरसेप्ट करने में सक्षम सॉफ्टवेयर गुप्त रूप से इंस्टॉल किया गया था।

रिपोर्ट में 2021 की पिछले मामलों का भी जिक्र किया गया है, जिसमें कथित तौर पर इजरायली सैन्य खुफिया अधिकारियों को DIA मुख्यालय में लिसनिंग डिवाइस लगाने का प्रयास करते हुए पकड़ा गया था। एक अन्य मामले में इजरायल की शिन बेट सुरक्षा एजेंसी के सदस्यों द्वारा अमेरिकी सीक्रेट सर्विस के वाहन के अंदर लिसनिंग डिवाइस लगाने के कथित प्रयास का जिक्र है।

ईरान को लेकर अमेरिका और इजरायल के अलग-अलग लक्ष्य
ये चिंताएं ऐसे समय में सामने आई हैं जब ईरान को लेकर वाशिंगटन और तेल अवीव के सामरिक उद्देश्यों में स्पष्ट मतभेद दिखाई दे रहे हैं। हालांकि दोनों देश शुरुआत में इस संघर्ष के दौरान एकजुट नजर आ रहे थे, लेकिन जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ा, उनकी रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग होने लगीं

रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन का ध्यान मुख्य रूप से ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करने पर था ताकि बातचीत के जरिए रियायतें हासिल की जा सकें। इसके विपरीत, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के उद्देश्य कहीं अधिक व्यापक थे, जिनमें तेहरान की क्षमताओं को और अधिक नष्ट करना और ईरानी नेतृत्व को पूरी तरह कमजोर करना शामिल था।

इन खुलासों से दोनों सहयोगियों के बीच भविष्य के सैन्य समन्वय में गंभीर जटिलताएं आ सकती हैं। जानकारों का मानना है कि यदि पेंटागन इजरायली समकक्षों के साथ खुफिया जानकारी साझा करने पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने का फैसला करता है, तो इसका सीधा असर दोनों देशों के सैन्य संबंधों पर पड़ेगा।

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