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मध्यप्रदेश

मुकद्दस हज का रूहानी सफर, काबा शरीफ के साये में छलके आंसू और मिला सुकून

लखनऊ 

​विशेष रिपोर्ट मक्का मुअज्जमा: रात के करीब का वक्त है। आसमान ने काले रंग की मखमली चादर ओढ़ रखी है, लेकिन जमीन पर रोशनी का एक ऐसा समंदर है जो आंखों को चौंधिया नहीं रहा, बल्कि रूह को सुकून दे रहा है। मक्का की ठंडी हवाएं जब बदन को छूती हैं, तो ऐसा लगता है कि गुनाहों की तपिश धीरे-धीरे ठंडी हो रही है। इस वक्त दुनिया के सबसे पाक और मुकद्दस मुकाम यानी मस्जिद-अल-हरम के बिल्कुल बीचों-बीच, अल्लाह के घर 'काबा शरीफ' के ठीक सामने खड़े होकर जब कोई अपनी नजरें उठाता है, तो लफ्ज कम पड़ जाते हैं और आंखें खुद-ब-खुद छलक उठती हैं।

​यह कोई आम रात नहीं है। यह हज का वो मुबारक हफ्ता है, जब दुनिया के कोने-कोने से, हर मुल्क, हर रंग और हर जुबान के लोग एक ही मकसद के लिए एक जगह जमा हुए हैं। उनके दिलों में एक ही तड़प है—अपने खालिक (बनाने वाले) के सामने सजदा करना और उसकी रहमतों को समेट लेना।

​1. काबा की दीवारें और दिल की धड़कनें
​वीडियो के शुरुआती दृश्यों में काबा शरीफ की वो गगनचुंबी, आलीशान और रूहानी इमारत नजर आती है, जिसे देखने की तमन्ना हर मुसलमान अपने बचपन से पालता है। काले और सुनहरे गिलाफ (किस्वा) से ढकी काबा की दीवारें रात की रोशनी में जगमगा रही हैं। गिलाफ पर सोने और चांदी के तारों से उकेरी गई कुरान की आयतें इस कदर नूरानी लग रही हैं कि देखने वाला बस देखता ही रह जाए।
​सफेद संगमरमर का वो फर्श (मताफ) जो दिन की चिलचिलाती धूप में भी कुदरती तौर पर ठंडा रहता है, उस पर बैठे और खड़े जायरीन (तीर्थयात्री) काबा को एकटक निहार रहे हैं। काबा के ठीक नीचे की सुनहरी ईंटों वाली दीवार और सफेद किनारा इस मुकद्दस इमारत की भव्यता में चार चांद लगा रहा है। यहाँ वक्त जैसे ठहर सा गया है। न कोई जल्दी में है, न किसी को दुनियावी सुख-सुविधाओं की फिक्र है। सब के सब बस इसी पल को अपने वजूद में उतार लेना चाहते हैं।

​2. 'लब्बैक' की गूंज और इंसानी समंदर
​काबा के चारों तरफ नजर दौड़ाएं तो इंसानी आस्था का एक ऐसा सैलाब नजर आता है जिसकी मिसाल दुनिया में कहीं और नहीं मिलती। हजारों-लाखों लोग एक साथ सफे बांधे (लाइनों में) बैठे हैं। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि यहाँ कोई वीआईपी नहीं है और न ही कोई आम।

​अमीर-गरीब का भेद मिटा: सफेद बिना सिला हुआ दो टुकड़ों का कपड़ा—जिसे 'इहराम' कहते हैं—पहने हुए लाखों मर्द एक जैसे नजर आ रहे हैं। इस लिबास ने राजा और रंक, मालिक और नौकर का फर्क हमेशा के लिए मिटा दिया है।​विविधता में एकता: कोई हिंदुस्तान से आया है, कोई पाकिस्तान से, कोई अफ्रीका के किसी सुदूर गांव से है तो कोई यूरोप की चमचमाती दुनिया छोड़कर यहाँ पहुंचा है। किसी के चेहरे पर लंबी दाढ़ी है, तो किसी का सिर पूरी तरह मुंडा हुआ है। किसी की त्वचा का रंग एकदम साफ है, तो कोई अश्वेत है। लेकिन जब जुबान खुलती है, तो सबकी एक ही आवाज होती है:​"लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैक ला शरीका लका लब्बैक…" > (हाजिर हूँ ऐ अल्लाह, मैं तेरे दरबार में हाजिर हूँ, तेरा कोई शरीक नहीं, मैं हाजिर हूँ…)

​3. हर चेहरे पर एक अलग दास्तान, हर आंख में आंसू
​अगर आप मस्जिद-अल-हरम के प्रांगण में बैठे लोगों के चेहरों को गौर से देखें—जैसा कि इस वीडियो में भी कैद हुआ है—तो आपको हर चेहरे पर इबादत का एक अलग ही नूर और सुकून दिखाई देगा।

​कुछ लोग फर्श पर घुटनों के बल बैठे अपने हाथों को दुआ के लिए आसमान की तरफ उठाए हुए हैं। उनकी उंगलियां कांप रही हैं और होंठ धीरे-धीरे हिल रहे हैं। वे अपने गुनाहों की माफी मांग रहे हैं, अपने बच्चों के मुस्तकबिल (भविष्य) के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं, और अपने वतन की अमन-चैन के लिए दुआएं कर रहे हैं।

​कुछ बुजुर्ग जायरीन ऐसे हैं जो शायद जिंदगी भर की जमा-पूंजी जोड़कर इस मुकाम तक पहुंचे हैं। उनके चेहरों की झुर्रियों में थकान नहीं, बल्कि एक अजीब सी संतुष्टि है कि 'या अल्लाह, मौत से पहले तूने मुझे अपने घर बुला ही लिया।' वहीं युवा जायरीन अपने मोबाइल कैमरों में इन पाक लम्हों को कैद कर रहे हैं ताकि जब वे वापस लौटें, तो अपने परिवार को इस रूहानी सफर का गवाह बना सकें।

​4. मुस्तैद सुरक्षाकर्मी और खादिम: खिदमत की मिसाल
​इस बेहद भावुक और आध्यात्मिक माहौल के बीच, सऊदी अरब के सुरक्षाकर्मी और मस्जिद के खादिम (वॉशर्स/सफाई कर्मचारी) बेहद खामोशी और मुस्तैदी से अपना फर्ज निभा रहे हैं। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि डिजिटल कैमलाफ्लाज (सैन्य पोशाक) पहने सुरक्षाकर्मी बेहद अदब के साथ जायरीन को रास्ता दिखा रहे हैं, भीड़ को नियंत्रित कर रहे हैं और यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि किसी भी हाजी को इबादत में कोई खलल न पड़े।

​दूसरी तरफ, हरे और नीले रंग की वर्दी पहने सफाईकर्मी लगातार मताफ की सफाई में लगे हैं ताकि अल्लाह के मेहमानों को सजदा करने में जरा सी भी असुविधा न हो। इन खादिमों के चेहरों पर भी एक अलग तरह का गर्व होता है, क्योंकि वे जानते हैं कि वे दुनिया के सबसे सम्मानित मेहमानों—यानी अल्लाह के मेहमानों—की सेवा कर रहे हैं।

​5. रात का जादुई नजारा और हरम के मीनार
​जैसे ही कैमरा ऊपर की तरफ घूमता है, मस्जिद-अल-हरम के विशाल और ऊंचे मीनार रात के अंधेरे आसमान को चीरते हुए नजर आते हैं। इन मीनारों पर लगी दूधिया और हरी रोशनियां पूरे परिसर को एक दिव्य रूप दे रही हैं। आसमान में बादलों के बीच से झांकता हुआ चांद भी जैसे इस अलौकिक दृश्य को देखने के लिए लालायित नजर आता है। पृष्ठभूमि में बनी आधुनिक गगनचुंबी इमारतें और 'मक्का क्लॉक टॉवर' यह अहसास कराते हैं कि इतिहास और आधुनिकता का यह अद्भुत संगम सिर्फ और सिर्फ इसी पाक सरजमीं पर मुमकिन है।
​6. हज: सिर्फ एक सफर नहीं, रूह का शुद्धिकरण है
​इस्लाम में हज को पांच स्तंभों (Arkan-e-Islam) में से एक माना गया है, जो हर उस मुसलमान पर जिंदगी में एक बार फर्ज है जो शारीरिक और आर्थिक रूप से इसके काबिल हो। लेकिन यह सिर्फ एक शारीरिक यात्रा नहीं है। यह इंसान के अहंकार, उसके घमंड और उसकी दुनियावी व्यस्तताओं की 'मौत' का नाम है। यहाँ आकर इंसान को अहसास होता है कि वह ब्रह्मांड के रचयिता के सामने कितना छोटा और तुच्छ है।
​जब कोई हाजी काबा के चारों तरफ सात चक्कर (तवाफ) लगाता है, तो वह यह प्रतिज्ञा करता है कि अब उसकी जिंदगी का केंद्र केवल अल्लाह की मर्जी होगी। यहाँ बहाया गया आंसू का एक-एक कतरा दिल के मैल को धो देता है।
​दिलों को जोड़ने वाला पैगाम
​आज जब दुनिया नफरत, सरहदों के विवाद और ऊंच-नीच के भेदभाव से जूझ रही है, मक्का मुअज्जमा से आने वाली ये तस्वीरें और वीडियो पूरी इंसानियत को एक बड़ा सबक देती हैं। यहाँ न कोई नस्लवाद है, न कोई राष्ट्रवाद। यहाँ सब बराबर हैं।

​काबा शरीफ के साये में गुजारी गई यह रात इन जायरीन की जिंदगी को हमेशा-हमेशा के लिए बदल देगी। जब ये हाजी अपने-अपने मुल्कों को लौटेंगे, तो वे अपने साथ सिर्फ खजूर या जमजम का पानी लेकर नहीं जाएंगे, बल्कि वे लेकर जाएंगे अमन, भाईचारे, सब्र और इंसानियत का वो पैगाम, जिसकी आज पूरी दुनिया को शिद्दत से जरूरत है।

​वाकई, जिसने काबा की इस रूहानी रात को एक बार देख लिया, उसका दिल हमेशा के लिए इसी चौकठ पर छूट जाता है।      मुकद्दस सफर-ए-हज और मक्का मुअज्जमा के इस रूहानी मंजर के बीच, इस बार का हज एक बेहद ऐतिहासिक और बड़े बदलाव का गवाह बन रहा है। इस विशेष रिपोर्ट में जानिए कि कैसे इस साल भीषण गर्मी के मद्देनजर जायरीन को एक बड़ी राहत दी गई है और स्थानीय स्तर पर इस मुबारक सफर को लेकर क्या खास खबरें हैं:

​ऐतिहासिक फैसला: भीषण गर्मी के चलते इहराम की पाबंदी में ढील, अन्य कपड़ों में तवाफ करते दिखे जायरीन
​मक्का मुअज्जमा / विशेष रिपोर्ट:

सऊदी अरब में इस साल पड़ रही रिकॉर्ड तोड़ और अत्यधिक गर्म मौसम (Hot Weather) को देखते हुए जायरीन (तीर्थयात्रियों) की सहूलियत और उनकी सेहत की सुरक्षा के लिए एक बेहद बड़ा और संवेदनशील फैसला लिया गया है। इस चिलचिलाती धूप और लू के थपेड़ों से हाजियों को बचाने के लिए इहराम के सख्त कंपल्शन (अनिवार्यता) में कुछ विशेष ढील दी गई है।

​मस्जिद-अल-हरम और काबा शरीफ के प्रांगण (मताफ) से आ रही तस्वीरों और वीडियो में इस बदलाव का साफ असर देखा जा सकता है। जहाँ अमूमन सिर्फ सफेद बिना सिला हुआ कपड़ा (इहराम) ही पुरुषों के लिए अनिवार्य होता था, वहीं अब इस भीषण गर्मी के कारण पैदा होने वाली मेडिकल इमरजेंसी और डिहाइड्रेशन जैसी दिक्कतों से बचाने के लिए नियमों को लचीला बनाया गया है।

​अन्य कपड़ों में तवाफ का रूहानी नजारा
​इस ऐतिहासिक राहत के बाद, काबा शरीफ के चारों तरफ चक्कर (तवाफ) काटते हुए जायरीन अब पारंपरिक इहराम के साथ-साथ अन्य आरामदायक और ठंडे कपड़ों में भी इबादत करते नजर आ रहे हैं। कई हाजी सफेद रंग के हल्के कुर्ते-पायजामे या अपने स्थानीय आरामदायक लिबासों में तवाफ मुकम्मल कर रहे हैं। इस फैसले का दुनिया भर से आए लाखों हाजियों ने दिल से स्वागत किया है, क्योंकि इससे बुजुर्गों, बीमारों और बच्चों को इस झुलसाने वाली गर्मी में हज के अरकान (नियम) पूरे करने में बेहद आसानी हो रही है। प्रशासन का पूरा ध्यान इस बात पर है कि इबादत की रूहानियत भी बरकरार रहे और इंसानी जानों को भी कोई खतरा न हो।

​इस मुकद्दस सफर से जुड़ी एक और बेहद खुशनुमा और फख्र की खबर उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले से आ रही है। पुरकाजी नगर पालिका के चेयरमैन ने भी इस साल अल्लाह के इस सबसे पाक और मुबारक बुलावे पर लब्बैक कहा और कामयाबी के साथ अपना 'मबारक हज' मुकम्मल कर लिया है।

​क्षेत्र में खुशी का माहौल: जैसे ही पुरकाजी के चेयरमैन द्वारा काबा शरीफ के साये में हज के अरकान पूरे करने और मक्का मुअज्जमा में मौजूदगी की तस्वीरें और खबरें सामने आईं, उनके गृह क्षेत्र पुरकाजी में खुशी और जश्न का माहौल बन गया।
​वतन के लिए मांगी दुआएं: इस रूहानी सफर के दौरान न सिर्फ अपने परिवार बल्कि पूरे देश और विशेष रूप से पुरकाजी की आवाम की खुशहाली, तरक्की, आपसी भाईचारे और अमन-चैन के लिए काबा शरीफ के सामने विशेष दुआएं मांगी हैं।
​सोशल मीडिया पर उनके चाहने वाले और नगर वासी उन्हें इस मुकद्दस सफर की कामयाबी और 'हाजी' बनने पर लगातार मुबारकबाद और शुभकामनाएं भेज रहे हैं।

​निष्कर्ष: आधुनिकता और संवेदनशीलता का अनूठा हज
​इस साल का हज यह साबित करता है कि मजहब और प्रशासन दोनों ही इंसानी सहूलियत और जान की हिफाजत को सर्वोपरि मानते हैं। मौसम के कड़े मिजाज के बीच नियमों में दी गई यह ढील और दुनिया भर से आम ओ खास लोगों का एक ही सफ में खड़े होना, हज के उसी शाश्वत पैगाम को दोहराता है—कि अल्लाह की नजर में सबकी नीयत और तड़प मायने रखती है, लिबास चाहे जो भी हो।

रिपोर्टर मो. शाहिद

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