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धर्म/ज्योतिष

एकादशी ही नहीं! अन्न न खाने के 5 बड़े नियम

 सनातन धर्म में व्रत, उपवास और नियमों का गहरा महत्व है. जब भी बिना अन्न खाए उपवास रखने की बात आती है, तो हमारे दिमाग में सबसे पहला नाम एकादशी का आता है. हिंदू धर्म में एकादशी के दिन चावल या भारी भोजन का त्याग करना अनिवार्य माना गया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे धर्मग्रंथों और स्मृतियों में सिर्फ एकादशी ही नहीं, बल्कि 5 अन्य ऐसे बेहद खास और संवेदनशील मौके बताए गए हैं, जब सामान्य व्यक्ति

को अन्न ग्रहण करने से सख्त परहेज करना चाहिए?
पौराणिक शास्त्रों के सूत्रों के अनुसार, इन विशेष अवसरों पर भोजन करने से पुण्य का नाश होता है और दोष लगता है. आइए जानते हैं एकादशी के अलावा वो कौन से 5 मौके हैं, जब रसोई में अन्न की जगह फलाहार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.

सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण (Eclipse)
शास्त्रों के अनुसार, ग्रहण के सूतक काल से लेकर ग्रहण समाप्त होने तक अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए. मान्यता है कि ग्रहण के समय नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है, जिससे भोजन दूषित हो जाता है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इस दौरान बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं, जिससे पका हुआ भोजन सही नहीं रहता है.

कन्यादान: महादान के संकल्प से पहले का संयम
हिंदू विवाह पद्धति में कन्यादान को संसार के सबसे बड़े और पवित्र पुण्यों में गिना गया है. माता-पिता अपनी लाडली को किसी अन्य कुल को सौंपते समय एक महान संकल्प लेते हैं. शास्त्रों का नियम है कि जिस दिन घर में यह महादान होना हो, उस दिन माता पिता को कन्यादान या फेरे पूरे होने तक अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए. इस मांगलिक कार्य से पहले अन्न ग्रहण करना धार्मिक दृष्टि से दोषपूर्ण माना गया है. संकल्प की पवित्रता बनाए रखने के लिए इस नियम का कड़ाई से पालन किया जाता है.

हरिजन्मकाले: प्रभु के प्राकट्य और जन्मोत्सव का पावन दिन
भगवान राम का जन्मोत्सव (रामनवमी), भगवान कृष्ण की जन्मतिथि (जन्माष्टमी), इसके साथ ही नरसिंह जयंती, हनुमान जयंती और जानकी नवमी जैसे पावन अवसर 'हरिजन्मकाले' की श्रेणी में आते हैं. यह वो समय होता है जब साक्षात ईश्वर ने पृथ्वी पर अवतार लिया था. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन देवी-देवताओं के जन्मोत्सव के दिन दोपहर या मध्यरात्रि तक उपवास रखना चाहिए. इस दिन अन्न खाने के बजाय शुद्ध सात्विक फलाहार या दूध का सेवन करना अधिक शुभ माना जाता है.

द्विजभोजने: संत और ब्राह्मण की थाली से पहले स्वयं का त्याग
भारतीय संस्कृति में अतिथि और संतों को साक्षात नारायण का रूप माना गया है. धर्म शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि यदि आपके द्वार पर कोई साधु, संत, ब्राह्मण या अतिथि खाने के लिए आमंत्रित है, तो द्विजभोजने के नियम का पालन करें. इसका सीधा अर्थ है कि जब तक आए हुए अतिथि आदरपूर्वक भोजन न कर लें, तब तक घर के सदस्यों को अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए. उनके भोजन करने से पहले खुद पेट भर लेना मर्यादा के खिलाफ और दोषपूर्ण माना गया है.

प्राणप्रयाणे: शोक और सूतक का समय
मानव जीवन का सबसे अंतिम और कड़वा सच मृत्यु है. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, जब परिवार में या किसी करीबी के यहां किसी के प्राण चले जाए तो वह समय बेहद शोक और संयम का होता है. किसी की मृत्यु होने पर या अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी होने तक घर में चूल्हा जलाना या अन्न ग्रहण करना पूरी तरह वर्जित माना गया है. यह समय सूतक का होता है और मानसिक रूप से गहरे शोक का, इसलिए इस दौरान भोजन से दूरी बनाकर मृतक के प्रति सम्मान और संवेदना प्रकट करनी चाहिए.

 

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