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छत्तीसगड़

पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा: छत्तीसगढ़ में मियावाकी तकनीक से तेजी से विकसित हो रहे वन

मियावकी वन तकनीक से हरित छत्तीसगढ़ की ओर बढ़ते कदम

कम समय में घने जंगल तैयार कर पर्यावरण संरक्षण को मिल रही नई दिशा

 रायपुर             

वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए मियावाकी तकनीक एक बेहद प्रभावी और लोकप्रिय विधि बन गई है। जापानी वनस्पतिशास्त्री डॉ. अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित यह तकनीक केवल 2-3 वर्षों में बंजर भूमि को घने, आत्मनिर्भर सूक्ष्म वनों में बदल देती है। पारंपरिक वृक्षारोपण की तुलना में यह विधि 10 गुना तेजी से बढ़ती है और 30 गुना अधिक घने जंगल बनाती है, जो शहरी क्षेत्रों के लिए आदर्श है।

         छत्तीसगढ़ में पर्यावरण संरक्षण और वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए मियावकी वन तकनीक तेजी से अपनाई जा रही है। राज्य में वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग तथा छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम लिमिटेड द्वारा इस तकनीक के जरिए शहरी क्षेत्रों, औद्योगिक क्षेत्रों और खनन प्रभावित इलाकों में बड़े पैमाने पर हरियाली विकसित की जा रही है। मियावकी पद्धति में स्थानीय प्रजातियों के पौधों को अधिक घनत्व में लगाया जाता है, जिससे मात्र 3 से 5 वर्षों में घना जंगल तैयार हो जाता है।

राज्य में तेजी से बढ़ रहा सघन वनीकरण

       छत्तीसगढ़ में वर्ष 2022 से मियावकी पद्धति के तहत लगातार वृक्षारोपण किया जा रहा है। वर्ष 2022 में कोटा मण्डल में एनटीपीसी लिमिटेड के सहयोग से 1 हेक्टेयर क्षेत्र में 23 हजार पौधे तथा 0.3 हेक्टेयर में 7 हजार पौधे लगाए गए। वर्ष 2023 में कोटा के भिल्मी क्षेत्र में 6.4 हेक्टेयर भूमि पर 64 हजार पौधों का रोपण किया गया। वहीं गेवरा क्षेत्र में 2 हेक्टेयर भूमि पर 20 हजार पौधे लगाए गए। वर्ष 2024 में कोटा के उच्चभट्टी क्षेत्र में 3.2 हेक्टेयर में 32 हजार पौधे लगाए गए। इसके अलावा रायगढ़ मण्डल के तिलईपाली और छाल क्षेत्रों में कुल 3.75 हेक्टेयर भूमि पर 37 हजार 500 पौधों का सफल रोपण किया गया।

वर्ष 2025 में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं जारी

          वर्तमान में राज्य के कई क्षेत्रों में वृक्षारोपण कार्य तेजी से जारी है। बारनवापारा मण्डल में ‘हरियर छत्तीसगढ़’ योजना के तहत 6 हजार पौधे लगाए जा रहे हैं। कोरबा और रायगढ़ क्षेत्रों में साउथ इस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड के सहयोग से 4 हेक्टेयर क्षेत्र में 40 हजार पौधों का रोपण किया जा रहा है। वहीं विशेष परियोजनाओं के अंतर्गत महानदीकोलफील्ड लिमिटेड द्वारा 1.9 हेक्टेयर भूमि पर 64 हजार पौधे लगाए जा रहे हैं। इसके साथ ही अरपा नदी के किनारे भी बड़े पैमाने पर पौधारोपण कर हरित क्षेत्र का विस्तार किया जा रहा है।

पर्यावरण संरक्षण में मिल रहे बहुआयामी लाभ

         विशेषज्ञों के अनुसार मियावकी वन सामान्य जंगलों की तुलना में अधिक कार्बन अवशोषित करते हैं। इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है। यह तकनीक वायु और ध्वनि प्रदूषण को कम करने, भू-जल स्तर सुधारने और मिट्टी संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इन वनों की शुरुआती वर्षों में देखभाल की जाती है, जिसके बाद ये जंगल स्वतः विकसित होने लगते हैं। इससे रखरखाव की लागत कम होती है और लंबे समय तक पर्यावरणीय लाभ मिलता है। 

बंजर डंप क्षेत्र से हरित जंगल बनने की ओर गेवरा की प्रेरक पहल

          छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम लिमिटेड ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अनूठी पहल करते हुए कोरबा जिले के गेवरा क्षेत्र के 12.45 हेक्टेयर डंप क्षेत्र में 33 हजार 935 मिश्रित प्रजातियों के पौधों का सफल रोपण किया है। वन मंत्री केदार कश्यप ने इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि राज्य सरकार पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए लगातार प्रभावी कदम उठा रही है।

जहां हरियाली संभव नहीं थी, वहां तैयार हो रहा जंगल

        कोयला खनन के बाद डंप क्षेत्रों में उपजाऊ मिट्टी नीचे दब जाती है और ऊपर पत्थर, कोयला अवशेष तथा अनुपजाऊ मिट्टी रह जाती है। ऐसे क्षेत्रों में पौधों का उगना बेहद कठिन माना जाता है। लेकिन वैज्ञानिक पद्धति और सतत प्रयासों से इस बंजर भूमि को अब हरियाली में बदला जा रहा है।

वैज्ञानिक तरीके से किया गया पौधारोपण

         डंप क्षेत्र की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए वर्मी कम्पोस्ट, नीमखली और डीएपी का उपयोग किया गया। जीपीएस सर्वे और सीमांकन के बाद व्यवस्थित गड्ढे तैयार किए गए तथा 3 से 4 फीट ऊंचाई वाले स्वस्थ पौधों का रोपण किया गया। इस क्षेत्र में नीम, शीशम, सिरस, कचनार, करंज, आंवला, बांस, महोगनी, महुआ और बेल जैसी विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। इससे आने वाले समय में यह क्षेत्र पक्षियों और अन्य वन्य जीवों के लिए भी उपयुक्त आवास बन सकेगा।

निरंतर देखभाल से मिल रही सफलता

        शुरुआती 2-3 वर्षों की देखभाल के बाद, यह वन पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो जाता है और इसे किसी उर्वरक या पानी की आवश्यकता नहीं होती है। रोपण के बाद पौधों की नियमित सिंचाई, खाद, निंदाई-गुड़ाई, घास कटाई और सुरक्षा का कार्य लगातार किया जा रहा है। मृत पौधों का समय पर प्रतिस्थापन भी सुनिश्चित किया जा रहा है। वर्ष 2025 से 2029 तक पांच वर्षों तक रखरखाव के बाद इस विकसित हरित क्षेत्र को साउथ इस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड गेवरा को सौंपा जाएगा।

हरित भविष्य की ओर मजबूत पहल

       कम जगह में घने जंगल बनाकर शहरों में प्रदूषण (धूल और ध्वनि) को कम करने में सहायक होते हैं। ये वन पारंपरिक वनों की तुलना में 30 गुना अधिक कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं। गेवरा की यह पहल दर्शाती है कि सही योजना, वैज्ञानिक तकनीक और निरंतर प्रयासों से बंजर और पत्थरीली भूमि को भी घने जंगल में बदला जा सकता है। आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र सघन हरित वन और जैव विविधता से भरपूर मानव निर्मित जंगल के रूप में विकसित होगा, जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रेरणादायक उदाहरण बनेगा।

   धनंजय राठौर 
                           संयुक्त संचालक 

                       अशोक कुमार चंद्रवंशी 
                     सहायक जनसंपर्क अधिकारी 

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