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मध्यप्रदेश

वन्यजीव संरक्षण में मध्यप्रदेश की बड़ी छलांग, CM डॉ. यादव के नेतृत्व में नई पहचान

भोपाल 

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश ने वन और वन्य जीव संरक्षण के क्षेत्र में वैश्विक पहचान बनाई है। राज्य सरकार ने वन्य जीवों के संरक्षण को केवल पर्यावरणीय दायित्व नहीं माना। सरकार ने इसे विकास, पर्यटन, स्थानीय रोजगार, सांस्कृतिक चेतना और सामुदायिक सहभागिता से जोड़कर व्यापक जन आंदोलन का स्वरूप दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव की दूरगामी सोच से मध्यप्रदेश आज ‘टाइगर स्टेट’ के साथ ही देश के सबसे व्यापक और वैज्ञानिक वन्य जीव संरक्षण मॉडल के रूप में उभरा है।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव का विजन है कि प्रदेश के वन और नदियां केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि राष्ट्र की अमूल्य धरोहर हैं। मध्यप्रदेश के वन देश की कई प्रमुख नदियों का मायका हैं। इस तरह ये वन कई राज्यों की जल सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। इसी सोच के साथ राज्य सरकार जलवायु अनुकूल, विज्ञान आधारित और समुदाय केंद्रित वन प्रबंधन मॉडल को आगे बढ़ा रही है।

कूनो बना वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन का ग्लोबल प्रयोगशाला

श्योपुर का कूनो नेशनल पार्क आज विश्व स्तर पर वन्यजीव संरक्षण का प्रतीक बन चुका है। प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में प्रारंभ हुए ‘प्रोजेक्ट चीता’ को नई गति देते हुए मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने बोत्सवाना से लाई गई मादा चीतों को खुले जंगल में छोड़कर इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाया। वर्तमान में कूनो में चीतों की संख्या 57 तक पहुंच चुकी है। एक शताब्दी पूर्व लुप्त हो चुके चीतों की देश में सफल पुनर्स्थापना ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि वैज्ञानिक प्रबंधन और राजनीतिक प्रतिबद्धता के बल पर विलुप्त प्रजातियों का पुनर्वास संभव है। मध्यप्रदेश में चीतों साथ ही लुप्त हो चुकी ‘जंगली भैंसा’ प्रजाति को भी कान्हा की घास-भूमि में आबाद किया जा रहा है। राज्य सरकार अब कूनो को ‘ग्लोबल ब्रीडिंग सेंटर’ के रूप में विकसित करने की दिशा में कार्य कर रही है। साथ ही गांधी सागर अभयारण्य को चीतों का दूसरा और वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व, नौंरादेही को तीसरा बड़ा चीता लैंडस्केप बनाया जा रहा है। नौंरादेही में चीतों के पुनर्वास के लिये सॉफ्ट रिलीज बोमा के निर्माण से परियोजना के अगले चरण का शुभारंभ हो चुका है।

विलुप्त प्रजातियों की पुनर्स्थापना का अभियान

मुख्यमंत्री डॉ. यादव के कार्यकाल में चीतों के साथ ही कई दुर्लभ और विलुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण और पुनर्स्थापन पर विशेष ध्यान दिया गया है। कान्हा टाइगर रिजर्व में असम के काजीरंगा नेशनल पार्क से लाए गए जंगली भैंसों का पुनर्वास इस दिशा में ऐतिहासिक पहल माना जा रहा है। यह प्रयास केवल एक प्रजाति को पुनर्स्थापित करने तक सीमित नहीं, बल्कि विलुप्त हो रही जैव-विविधता और पारिस्थितकी तंत्र को पुनर्जीवित करने का अभियान है।

चंबल, कूनो और नर्मदा क्षेत्र में घड़ियाल, मगरमच्छ और कछुओं के संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। राष्ट्रीय चंबल सेंचुरी पहले से ही दुनिया में घड़ियालों की सबसे बड़ी शरणस्थली मानी जाती है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव द्वारा कूनो नदी में घड़ियाल और कछुओं को छोड़ना तथा ओंकारेश्वर क्षेत्र में नर्मदा नदी में मगरमच्छों का संवर्धन शुरू करना प्रदेश की जलीय जैव विविधता संरक्षण नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने अपने जन्मदिन पर वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व, नौंरादेही में संरक्षित प्रजाति के कछुओं को जल में विमुक्त कर प्रकृति और जैव विविधता के प्रति अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया। उनका मानना है कि वन्य और जलीय जीव पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

गिद्ध संरक्षण में प्रदेश कर रहा देश का नेतृत्व

मध्यप्रदेश गिद्ध संरक्षण में देश का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंचे गिद्धों की संख्या राज्य में अब 14 हजार से अधिक हो चुकी है, जो देश में सर्वाधिक है। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी और वन विहार नेशनल पार्क के सहयोग से भोपाल के केरवा क्षेत्र में घायल गिद्धों के लिए रेस्क्यू सेंटर संचालित किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव द्वारा वन विहार में उपचार के बाद 23 फरवरी 2026 को मुक्त किया गया एक गिद्ध पाकिस्तान और उज्बेकिस्तान तक की लंबी यात्रा पूरी कर चुका है, जिसे संरक्षण प्रयासों की सफलता का प्रतीक माना जा रहा है।

नए टाइगर रिजर्व और अभयारण्य से बढ़ा संरक्षण क्षेत्र

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने नेतृत्व में राज्य सरकार ने वन क्षेत्रों के विस्तार और जैव- विविधता संपन्न क्षेत्रों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। दिसंबर-2024 में रातापानी अभयारण्य को टाइगर रिजर्व के दर्जे के साथ वन एवं वन्य जीव संरक्षण को नया आयाम मिला। यह निर्णय वर्ष 2008 में अनुमति मिलने के बावजूद अब तक लंबित रहा था, इसलिए इसे ऐतिहासिक माना गया। इस टाइगर रिजर्व का नाम विश्व प्रसिद्ध पुरातत्वविद् पं. विष्णुदेव धर वाकणकर के नाम पर रखा गया।

शिवपुरी स्थित माधव टाइगर रिजर्व को मार्च-2025 में प्रदेश का 9वां टाइगर रिजर्व घोषित किया गया। यहां मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए 13 किलोमीटर लंबी सुरक्षा दीवार भी बनाई गई है। सागर जिले के 258.64 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अप्रैल 2025 में ‘डॉ. भीमराव अंबेडकर वन्यजीव अभयारण्य’ घोषित किया गया। साथ ही ओंकारेश्वर और जहानगढ़ को नए वन्य जीव अभयारण्य के रूप में विकसित करने की स्वीकृति प्रदान की गई। ताप्ती क्षेत्र को अगस्त 2025 में मध्यप्रदेश का पहला कंजर्वेशन रिजर्व घोषित किया गया, यहाँ टाइगर, तेंदुआ, बायसन और जंगली कुत्तों जैसी दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं।

हाथी संरक्षण के लिये उठाये गये महत्वपूर्ण कदम

राज्य सरकार ने हाथियों के संरक्षण और मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए 47 करोड़ रुपये से अधिक की व्यापक योजना को मंजूरी दी है। राज्य स्तरीय ‘हाथी टास्क फोर्स’ का गठन, ‘हाथी मित्र’ योजना, रेडियो टैगिंग और सोलर फेंसिंग जैसे कदम इस दिशा में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। मानव-हाथी संघर्ष में जनहानि होने पर मुआवजा राशि को 8 लाख से बढ़ाकर 25 लाख रुपये करना सरकार की संवेदनशीलता को दर्शाता है। साथ ही कर्नाटक, केरल और असम जैसे राज्यों की श्रेष्ठ कार्य प्रणालियों को अपनाकर अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।

टाइगर कॉरिडोर और वाइल्ड लाइफ फ्रेंडली इंफ्रास्ट्रक्चर

वन्य जीव संरक्षण में अब केवल रिजर्व बनाना पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि उनके बीच सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। मध्यप्रदेश में कान्हा, बांधवगढ़, पन्ना और पेंच को जोड़ने वाली 5,500 करोड़ रुपये से अधिक की मेगा टाइगर कॉरिडोर परियोजना पर कार्य किया जा रहा है।

एनएच-46 के इटारसी-बैतूल सेक्शन में अंडर-पास और ओवर-पास बनाए जा रहे हैं। इससे वन्य जीव सुरक्षित रूप से आवागमन कर सकें। वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व से गुजरने वाले हाईवे पर ‘टेबल टॉप मार्किंग’ जैसे रेड ब्लॉक बनाकर वाहनों की गति नियंत्रित की जा रही है। रातापानी टाइगर रिजर्व में 12 किलोमीटर लंबा साउंडप्रूफ कॉरिडोर तैयार किया गया है। इसमें वन्य जीवों के लिए 7 अंडरपास बनाए गए हैं। यह मॉडल आधुनिक विकास और वन्य जीव संरक्षण के बीच संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण माना जा रहा है।

समुदाय आधारित और जलवायु अनुकूल वन प्रबंधन

मुख्यमंत्री डॉ. यादव के प्रयास केवल वन संरक्षण तक सीमित नहीं है उनका फोकस वन आश्रित समुदायों को वन संरक्षण की प्रक्रिया का साझेदार बनाने पर भी है। सरकार की नीति है कि जब स्थानीय समुदायों को वनों से प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा, तब वे सबसे प्रभावी संरक्षक बनेंगे। इसी दृष्टि से ‘विजन@2047 – री-इमेजिनिंग फॉरेस्ट रिसोर्सेस फॉर द क्लाइमेट रेसिलियंट फ्यूचर’ दस्तावेज जारी किया गया। राज्य में डिजिटल प्रौद्योगिकी, पारदर्शिता, जवाबदेही और वैज्ञानिक रणनीति के माध्यम से वन प्रबंधन को आधुनिक स्वरूप दिया जा रहा है।

संरक्षण से रोजगार एवं पर्यटन को नई गति

वन्य जीव संरक्षण की इन पहलों का सकारात्मक प्रभाव स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे रहा है। चीता परियोजना, टाइगर रिजर्व विस्तार और इको-टूरिज्म गतिविधियों से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। सफारी पर्यटन, प्रकृति शिक्षा और स्थानीय व्यवसायों को नई गति मिली है।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश ने यह साबित किया है कि संरक्षण और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं। यही समन्वित दृष्टिकोण आज मध्यप्रदेश को देश में वन्यजीव संरक्षण के अग्रणी मॉडल के रूप में स्थापित कर रहा है।

 

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