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उत्तर प्रदेश

विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा का बड़ा दांव, मंत्रिमंडल में 60% ओबीसी व एससी समाज शामिल

 लखनऊ

 सत्ता की हैट-ट्रिक लगाने के लिए भाजपा ने योगी मंत्रिमंडल के बहुप्रतीक्षित विस्तार के जरिए जातीय से लेकर क्षेत्रीय समीकरणों के संतुलन का रणक्षेत्र सजा लिया है।

19वीं विधानसभा के लिए लगभग आठ माह बाद होने वाले चुनाव को लेकर सपा जिस पीडीए के अस्त्र को धार दे रही है, भाजपा ने विस्तार में पिछड़े और दलित समाज के प्रतिनिधियों को कहीं ज्यादा प्रतिनिधित्व देकर उसको कुंद करने का बड़ा दांव चला है।

सपा चुनाव के लिए जाट, गुर्जर, पाल, वाल्मीकि, पासी आदि जातियों में पैठ बढ़ाने में जुटी है। भाजपा ने सपा की इसी रणनीति को ध्वस्त करने का ताना-बाना मंत्रिमंडल के सहारे बुना है। ओबीसी समाज से तीन और मंत्री बनाने के साथ दो को प्रोन्नत किया गया है। दलित समाज से भी दो और मंत्री बनाए गए हैं।

मंत्रिमंडल विस्तार के बाद अब 60 प्रतिशत मंत्री ओबीसी और एससी समाज से
पूरब से पश्चिम तक को साधा गया है। रविवार के विस्तार के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित 60 मंत्रियों के मंत्रिमंडल में 60 प्रतिशत ओबीसी व दलित समाज का ही प्रतिनिधित्व हो गया है।

क्षत्रिय व वैश्व समाज की भागीदारी यथावत रखते हुए पार्टी ने सवर्ण समाज से एक मात्र मनोज पाण्डेय को कैबिनेट मंत्री बनाकर यूजीसी सहित अन्य मुद्दों को लेकर समाज में उपजी नाराजगी दूर करने का भी प्रयास किया गया है।

चुनाव से पहले मंत्रिमंडल विस्तार के कई मायने
चुनाव से आठ माह पहले किया गया विस्तार कई मायनों में अहम है। बनाए गए मंत्रियों को भले ही अन्य की तरह लंबा कार्यकाल नहीं मिलेगा लेकिन इस बहाने सत्ताधारी भाजपा, विरोधियों के साथ ही कार्यकर्ताओं को भी बड़ा संदेश देने की कोशिश की है। चूंकि प्रदेश की राजनीति आज भी जातीय संतुलन पर ही टिकी है, इसलिए दूसरे विस्तार में खासतौर से जातीय गणित का ही ध्यान रखा गया है।

चुनाव में ओबीसी जातियों की निर्णायक भूमिका होने के नाते विस्तार में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) में आने वाले लोध (कैलाश राजपूत), पाल (अजीत सिंह), विश्वकर्मा (हंसराज), गुर्जर (सोमेन्द्र तोमर) व जाट (भूपेन्द्र चौधरी) बिरादरी का मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व बढ़ाया गया है। इससे पहले भाजपा पिछड़े में कुर्मी समाज से आने वाले पंकज चौधरी को पार्टी की कमान सौंप चुकी है।

पिछड़े समाज को बनाया वोट बैंक
सूबे की सत्ता हासिल करने के लिए समाजवादी पार्टी से लेकर बहुजन समाज पार्टी की नजर पहले से ही राज्य के लगभग 44 प्रतिशत आबादी वाले पिछड़े समाज के वोट बैंक पर है। दोनों पार्टियों ने पिछड़े समाज से आने वाले नेताओं को ही प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सौंप रखी है।

अनुसूचित जाति से पहली बार वाल्मीकि (सुरेन्द्र दलेर) के साथ ही पासी(कृष्णा पासवान) बिरादरी को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया गया है। गौरतलब है कि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस संग सपा, पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फार्मूले के जरिए भाजपा को बड़ा झटका दे चुकी है।

विस्तार के बाद अधिकतम 60 मंत्रियों वाले योगी मंत्रिमंडल में पिछड़े समाज से उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य सहित सर्वाधिक 25 मंत्री हो गए हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति के 11, सवर्ण समाज से भी 22 (ब्राह्मण समाज के आठ, राजपूत के छह, वैश्य के चार, दो भूमिहार, एक-एक खत्री व कायस्थ समाज से) मंत्री अब हो गए हैं।

विस्तार के जरिए भाजपा ने जिस तरह से सवर्णों के साथ ही गैर यादव ओबीसी बिरादरी को साधने की कोशिश की है, उसको देखते हुए माना जा रहा है कि अगले विधानसभा चुनाव में भी सपा-बसपा के सामने इसमें सेंधमारी करने की ही बड़ी चुनौती होगी।

विदित हो कि लोकसभा चुनाव से पहले योगी मंत्रिमंडल के पहले विस्तार में सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए पिछड़े, दलित, अगड़े के साथ ही पूरब से पश्चिम को साधते हुए चार कैबिनेट मंत्री बनाए गए थे।

यथावत ही रही सहयोगी दलों की हिस्सेदारी
योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए भले ही काफी समय से एनडीए के सहयोगी दल बयानबाजी के साथ दिल्ली तक की दौड़ लगा रहे थे लेकिन दूसरे विस्तार में किसी को भी मौका नहीं मिला।

इसके बाद भी सहयोगी दलों के नेता पूरी तरह से शांत हैं। माना जा रहा है कि बिहार के बाद बंगाल, असम एवं पुडुचेरी विधान सभा चुनाव में भी मिली बड़ी जीत के बाद सहयोगी दल, भाजपा पर अब दबाव बनाने से बच रहे हैं।

सहयोगी दलों को लग रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जिस तरह का माहौल भाजपा के पक्ष में बना हुआ है उसका असर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी रहने वाला है। ऐसे में किसी तरह का दबाव बनाने से सत्ताधारी भाजपा में उनकी स्थिति बिगड़ सकती है। सपा सहित विरोधियों के साथ खड़े होने से फिलहाल फायदा मिलने का आसार नहीं है।

2017 में अपना दल और सुभासपा से हुआ था अलायंस
गौरतलब है कि भाजपा वर्ष 2017 के विधान सभा चुनाव में अपना दल ( सोनेलाल) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी(सुभासपा) के साथ गठबंधन कर मैदान में उतरी थी। सरकार बनने पर सहयोगी दलों को मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी दी गई थी।

2019 के लोकसभा चुनाव में निषाद पार्टी का भी भाजपा से गठजोड़ हुआ लेकिन मंत्री पद से बर्खास्त कर दिए जाने पर सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने भाजपा से किनारा कर लिया। वर्ष 2022 के विधान सभा चुनाव में अपना दल (सोनेलाल) और निषाद पार्टी तो भाजपा के साथ रहीं लेकिन सुभासपा ने सपा के साथ चुनाव लड़ा था।

छह विधायक भी जीते लेकिन सपा से अनबन के बाद राजभर ने फिर भाजपा से हाथ मिला लिया। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के पूर्व रालोद भी सपा से नाता तोड़कर भाजपा के साथ आ गई। भाजपा के साथ खड़े दलों का एक-एक विधायक वर्तमान में योगी आदित्यनाथ की सरकार में मंत्री है।

 

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