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धर्म/ज्योतिष

गौतम बुद्ध के संन्यास के बाद यशोधरा का जीवन, सादगी और धैर्य की मिसाल

 बुद्ध पूर्णिमा का पर्व आज मनाया जा रहा है. इस दिन भगवान गौतम बुद्ध की पूरे विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है. कहते हैं कि गौतम बुद्ध ने गृहस्थ जीवन छोड़कर संन्यास ले लिया था. तो आइए जानते हैं कि गौतम बुद्ध के गृहस्थ जीवन छोड़ने के बाद उनकी पत्नी यशोधरा का जीवन कैसा हो गया था. जानते हैं पूरी कथा.

कथा के मुताबिक, कोलिय वंश के राजा सुप्पाबुद्ध और रानी पामिता की पुत्री यशोधरा अपनी सुंदरता और दयालु स्वभाव के लिए जानी जाती थीं. उसी समय दूसरी ओर, शाक्य वंश के राजा शुद्धोधन और महारानी मायादेवी के घर लुंबिनी वन में एक पुत्र का जन्म हुआ था, जिसका नाम सिद्धार्थ रखा गया. यही सिद्धार्थ आगे चलकर ज्ञान प्राप्त कर महात्मा बुद्ध के रूप में प्रसिद्ध हुए.

कैसे हुआ था यशोधरा-सिद्धार्थ का विवाह?
कहते हैं कि जब महारानी मायादेवी सिद्धार्थ को गर्भ में धारण किए हुए थीं, तब उन्होंने एक अद्भुत सपना देखा था- एक सफेद हाथी, जिसके छह दांत थे, उनके गर्भ में प्रवेश करता हुआ दिखाई दिया था. उस समय शाक्य और कोलिय वंश के समान स्तर का कोई अन्य राजघराना नहीं था, इसलिए इन दोनों वंशों के बीच ही रिश्ते तय होते थे. इसी परंपरा के चलते आगे चलकर यशोधरा का विवाह सिद्धार्थ से हुआ, जो उनके रिश्ते में भी थे. उस समय दोनों की उम्र लगभग 16 वर्ष बताई जाती है.

विवाह के बाद यशोधरा ने एक आदर्श पत्नी की तरह सिद्धार्थ का पूरा साथ निभाया. वह उनके काम और मन की स्थिति को अच्छे से समझती थीं. जब भी सिद्धार्थ जीवन के सच और लोगों के दुख-दर्द को जानने के लिए बाहर जाते, तो यशोधरा उनका सहयोग करती थीं. दोनों अक्सर समाज और लोगों की परेशानियों को लेकर बातचीत भी करते थे, जिससे उनके बीच गहरा समझ और जुड़ाव बना रहता था.

सिद्धार्थ का संन्यास और यशोधरा की समझ
धीरे धीरे समय के साथ यशोधरा को यह एहसास होने लगा था कि सिद्धार्थ का मन सांसारिक जीवन में पूरी तरह नहीं लग रहा है. उन्हें कई बार संकेत मिल चुके थे कि सिद्धार्थ एक दिन राजसी सुखों को छोड़कर आध्यात्मिक मार्ग चुन सकते हैं. यहां तक कि उनके पिता ने भी इस बात को लेकर पहले ही आगाह कर दिया था. सिद्धार्थ के मन में जीवन के दुख, बीमारी, बुढ़ापा और मृत्यु- को लेकर गहरी चिंता थी, जो उन्हें भीतर से बेचैन करती रहती थी.

राहुल का जन्म और बड़ा फैसला
विवाह के करीब 13 साल बाद यशोधरा ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम राहुल रखा गया. लेकिन इस समय तक सिद्धार्थ अपने जीवन का सबसे बड़ा निर्णय ले चुके थे. उन्हें लगा कि परिवार का यह बंधन उनकी आत्मज्ञान की खोज में रुकावट बन सकता है. इसलिए उन्होंने एक दिन सब कुछ छोड़कर सत्य की तलाश में निकलने का रास्ता चुन लिया.

यशोधरा का धैर्य और त्याग
जब यशोधरा को यह पता चला कि सिद्धार्थ घर छोड़ चुके हैं, तो वह स्वाभाविक रूप से दुखी हुईं. लेकिन उन्होंने इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया था. उन्होंने खुद को मजबूत बनाया और दूसरों की सहानुभूति के बजाय अपने आत्मबल पर भरोसा किया. उनका मानना था कि जीवन में बड़े लक्ष्य पाने के लिए कुछ त्याग करना जरूरी होता है.

पति के जाने के बाद यशोधरा ने भी शाही जीवन से दूरी बना ली थी. उन्होंने महंगे कपड़े और आभूषण छोड़ दिए और बेहद साधारण जीवन जीना शुरू कर दिया था. वह महल की बजाय एक साधारण स्थान पर रहने लगीं, जमीन पर सोतीं और दिन में सिर्फ एक बार भोजन करती थीं. अपने बेटे राहुल को भी वह सादगी, संयम और उनके पिता के आदर्शों के बारे में सिखाती रहती थीं.

गौतम बुद्ध की वापसी
कई सालों बाद जब सिद्धार्थ ज्ञान प्राप्त कर गौतम बुद्ध बन चुके थे, तब वे अपने पिता के कहने पर वापस लौटे. उनके साथ कई साधु भी आए थे. उनके साधारण रूप और भिक्षा पात्र को देखकर परिवार के लोग हैरान रह गए. जब बुद्ध लौटे, तो यशोधरा उनसे मिलने के लिए महल के द्वार पर नहीं गईं, बल्कि अपने स्थान पर ही उनका इंतजार किया. वह जानती थीं कि अब सिद्धार्थ सब कुछ समझ चुके होंगे. जब बुद्ध स्वयं उनके पास पहुंचे, तो यह देखकर सभी चकित रह गए. यशोधरा ने उनका सम्मान किया और शांति के साथ उनसे मुलाकात की. इसके बाद यशोधरा अपने पुत्र राहुल को लेकर बुद्ध के पास गईं. धीरे-धीरे उन्होंने भी उसी मार्ग को अपनाने का निर्णय लिया, जिस पर सिद्धार्थ चले थे. अंततः यशोधरा ने भी भिक्षुणी का जीवन अपनाया और आत्मज्ञान की दिशा में आगे बढ़ गई थीं.

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