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देश

यूरिया खाद पर किचकिच खत्म, 100 लाख टन के गैप को भरने के लिए नई पॉलिसी लांच

नई दिल्ली
 भारत सरकार देश में खेती के लिए सबसे जरूरी यूरिया (Urea) खाद की कमी को दूर करने के लिए एक बड़ा कदम उठाने जा रही है. सरकार ने एक नई निवेश नीति तैयार की है, जिसके लिए एक कैबिनेट नोट भी बना लिया गया है. इस नई नीति का मुख्य मकसद देश में यूरिया के नए कारखाने लगाने के लिए कंपनियों को प्रोत्साहित करना है, ताकि विदेशों से खाद न मंगानी पड़े. फिलहाल भारत में यूरिया की जितनी जरूरत है और जितनी पैदावार हो रही है, उसके बीच करीब 100 लाख मीट्रिक टन का बड़ा अंतर है. इसी अंतर को भरने के लिए सरकार अब नई सुविधाओं और नियमों का ऐलान करने वाली है. मनीकंट्रोल की रिपोर्ट में यह बात कही गई है। 

भारत में हर साल लगभग 380 से 400 लाख मीट्रिक टन यूरिया की जरूरत होती है, लेकिन देश में मौजूद कारखाने केवल 300 लाख मीट्रिक टन ही बना पाते हैं. इसका मतलब है कि हमें अपनी कुल जरूरत का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा दूसरे देशों से खरीदना पड़ता है. रिपोर्ट में एक सरकारी अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि यूरिया की कीमतों पर सरकार का नियंत्रण होता है, इसलिए नई कंपनियां तब तक पैसा लगाने से डरती हैं जब तक उन्हें यह पता न हो कि उन्हें सरकार से कितनी सब्सिडी (Subsidy) मिलेगी. नई नीति में अगले 8 सालों के लिए सब्सिडी की न्यूनतम और अधिकतम सीमा तय की जाएगी, जिससे निवेशकों को भविष्य का अंदाजा मिल सके और वे बेझिझक नए प्लांट लगा सकें। 

पुरानी नीति का असर
इससे पहले साल 2012 में नई निवेश नीति (New Investment Policy – 2012) आई थी. उस नीति की वजह से देश में छह नए यूरिया कारखाने लगे थे, जिनमें गोरखपुर (Gorakhpur), सिंदरी (Sindri), बरौनी (Barauni), रामागुंडम (Ramagundam), पानागढ़ (Panagarh) और गड़ेपान (Gadepan) शामिल हैं. इन कारखानों से यूरिया की पैदावार काफी बढ़ी थी, लेकिन अब उस पुरानी नीति का समय खत्म हो गया है और मांग लगातार बढ़ती जा रही है। 

नई नीति के तहत सरकार कंपनियों को कारखाना लगाने के लिए सीधे पैसे नहीं देगी, बल्कि एक ऐसा ढांचा तैयार करेगी जिससे कंपनियों को मुनाफा मिल सके. कंपनियों को आमतौर पर नीति लागू होने के चार साल के भीतर कारखाना चालू करना होगा. वर्तमान में किसानों को यूरिया का एक बैग (45 किलो) लगभग 266 रुपये में मिलता है, जबकि इसे बनाने का खर्च 1,200 से 1,700 रुपये तक आता है. इस बीच का जो भी बड़ा अंतर है, वह सरकार सब्सिडी के तौर पर चुकाती है। 

गैस की उपलब्धता जरूरी
यूरिया बनाने के लिए गैस की जरूरत होती है, जो काफी महंगी और सीमित है. अधिकारियों का कहना है कि भले ही हम देश में बहुत सारे कारखाने लगा लें, लेकिन अगर उनके पास पर्याप्त गैस नहीं होगी, तो फिर से दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ेगा. इसके अलावा, वैश्विक बाजार में खाद की कीमतें लगातार ऊपर-नीचे हो रही हैं, जिससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है। 

बजट में सब्सिडी के लिए करीब 1.7 लाख करोड़ रुपये रखे गए थे, लेकिन अनुमान है कि यह खर्च बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है. यूरिया के अलावा अन्य खादों जैसे एनपीके (NPK – Nitrogen, Phosphorus, Potassium) के नियम थोड़े अलग हैं, वहां सरकार एक तय मदद देती है और कंपनियां बाजार के हिसाब से दाम तय करती हैं, लेकिन यूरिया में पूरी जिम्मेदारी सरकार की होती है. नई नीति आने से उम्मीद है कि आने वाले सालों में भारत यूरिया के मामले में आत्मनिर्भर बन पाएगा। 

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