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उत्तर प्रदेश

देसी पशुओं को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की तैयारी, किसानों की आय बढ़ाने पर फोकस

लखनऊ

पहले चरण में अवधी भेड़ व जौनपुरी बकरी, दूसरे चरण में गायों की अलग-अलग प्रजातियों पर काम किया जाएगा। कृषि विश्वविद्यालय जेनेटिक परीक्षण करेंगे। देसी नस्लों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान देने का काम किया जाएगा।

उत्तर प्रदेश में देसी नस्ल के पशुओं की पहचान कर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की तैयारी शुरू हो गई है। इसके तहत इन नस्लों का जेनेटिक परीक्षण कराया जाएगा। पहले चरण में अवधी भेड़ और जौनपुरी बकरी पर काम शुरू किया गया है, जबकि दूसरे चरण में गायों की विभिन्न देसी प्रजातियों पर शोध और परीक्षण किया जाएगा।

सरकार की योजना है कि देसी नस्लों का संरक्षण करते हुए उन्हें समवर्ती (स्थानीय अनुकूल) नस्लों के साथ गर्भाधान कराकर नई और अधिक उपयोगी नस्ल विकसित की जाए। इससे पशुपालकों को आर्थिक लाभ भी मिलेगा और स्थानीय जलवायु के अनुकूल मजबूत नस्लें भी तैयार होंगी।
 
प्रदेश में बड़ी संख्या में देसी नस्ल के पशु मौजूद हैं, लेकिन संरक्षण के अभाव में ये तेजी से खत्म हो रहे हैं। अधिक दूध उत्पादन की चाह में विदेशी नस्लों के सीमेन (वीर्य) का उपयोग किया गया, जिससे मिश्रित नस्लें तो तैयार हुईं, लेकिन वे प्रदेश की जलवायु और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिहाज से लंबे समय तक सफल नहीं रहीं। इससे पशुपालकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।

इसे देखते हुए अब सरकार ने देसी नस्ल सुधार की नई रणनीति बनाई है। भारत सरकार के सहयोग से कृषि विश्वविद्यालयों को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है। विश्वविद्यालय पहले देसी नस्लों का नेटवर्क तैयार करेंगे, फिर उनका जेनेटिक परीक्षण कर राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकरण और पहचान दिलाएंगे।

इसके बाद उनके गुणों, उपयोगिता और अगली पीढ़ी सुधार पर शोध किया जाएगा। नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय की टीम ने पहले चरण में जौनपुरी बकरी और अवधी भेड़ को चिह्नित कर इन पर काम शुरू कर दिया है।

जिलेवार हो रही देसी नस्लों की पहचान
जौनपुर जिले के जफराबाद और शाहगंज क्षेत्र की जौनपुरी बकरी को चिह्नित किया गया है। इसी तरह अयोध्या और बाराबंकी क्षेत्र में अवधी नस्ल की गाय की पहचान की गई है। भविष्य में बलिया, गाजीपुर और चंदौली की गंगातीरी गाय को भी इस अभियान में शामिल किया जाएगा। इसके अलावा बुंदेलखंड की केन नस्ल, लखीमपुर की खेरीगढ़ी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की साहीवाल सहित कई अन्य नस्लों पर भी काम होगा। इसके लिए जिलेवार देसी नस्लों की पहचान की जा रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बकरियों की नस्ल सुधार पर केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान भी कार्य कर रहा है।

नस्ल संरक्षण के साथ पशुपालकों को फायदा देने का प्रयास
नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के जेनेटिक विभाग के प्रो. जसवंत सिंह ने बताया कि देसी नस्लों को चिह्नित करने के लिए नेटवर्क परियोजना पर कार्य चल रहा है। इन नस्लों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया जाएगा और इनके जेनेटिक पहलुओं का गहन अध्ययन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि उदाहरण के तौर पर जौनपुरी बकरी के जेनेटिक तत्वों की पहचान कर यह देखा जाएगा कि उसमें इटावा-औरैया क्षेत्र की जमुनापारी नस्ल के साथ क्रॉस ब्रीडिंग का कितना लाभ मिलेगा। पूरी रणनीति का उद्देश्य यह है कि देसी नस्लें भी सुरक्षित रहें और पशुपालकों की आय भी बढ़े। इसके लिए संबंधित क्षेत्र की जलवायु, चारा, खानपान और उत्पादक क्षमता पर भी विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है।

देसी बकरी: जौनपुरी, जमुनापारी, बरबरी, बुंदेलखंडी आदि।
देसी भेड़- मुजफ्फरनगरी, जालोनी, भदौरी, अवधी आदि।
देसी गाय: गंगातीरी, केनकथा, खेरीगढ़, मेवती, पोनवार, हरियाणा, साहीवाल आदि।
देसी भैंस: भदवारी, तराई, यूपी मुर्रा आदि।

देसी नस्लों को बचाना जरूरी
गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता का कहना है कि प्रदेश सरकार नंद बाबा दुग्ध मिशन और मुख्यमंत्री प्रगतिशील पशुपालक प्रोत्साहन योजना के जरिए देसी नस्लों के संरक्षण और संवर्धन पर जोर दे रही है। सभी कृषि विश्वविद्यालयों, पशु शोध संस्थानों को भी इस दिशा में कार्य करने के लिए निर्देशित किया गया है। देसी नस्लों को बचाना जरूरी है। इस दिशा में हर स्तर पर कार्य हो रहा है।

 

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