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विदेश

अमेरिका ने लिया बड़ा फैसला: रूस-ईरान के तेल पर छूट खत्म, अब कोई राहत नहीं मिलेगा

नई दिल्ली
 यूरोपीय संघ (EU) के व्यापार आयुक्त मारोस सेफकोविक ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि अमेरिका अब भविष्य में रूस पर लगे तेल प्रतिबंधों में कोई नई ढील नहीं देगा। यह बयान अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के साथ हुई उनकी उच्च स्तरीय बैठक के बाद आया है। रॉयटर्स के मुताबिक सेफकोविक ने बताया कि अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के साथ बातचीत में उन्हें यह समझाया गया कि यह राहत केवल कुछ गरीब और तेल आयात पर निर्भर देशों की मुश्किल स्थिति को देखते हुए दी गई थी। भारत पर इसका असर दिखाई दे सकता है।

प्रतिबंधों में राहत और उसका कारण
हाल ही में अमेरिकी ट्रेजरी विभाग द्वारा रूसी तेल पर प्रतिबंधों में दी गई ढील पर यूरोपीय संघ ने चिंता जताई थी। इस पर चर्चा के दौरान ये बातें सामने आईं:

    अमेरिका ने हाल ही में रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की लोडिंग और बिक्री के लिए जारी 'जनरल लाइसेंस' को 16 मई तक के लिए बढ़ा दिया है।

    अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के अनुसार, यह राहत होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने के कारण पैदा हुई किल्लत को देखते हुए दी गई थी।

    सेफकोविच ने बताया कि कई कम आय वाले देश तेल की कमी के कारण अत्यधिक कठिन स्थिति का सामना कर रहे हैं। इन देशों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह अल्पकालिक कदम उठाया गया था।

ईरान-इजरायल तनाव का असर
एशियाई अर्थव्यवस्थाएं विशेष रूप से तेल की कमी से जूझ रही हैं। 28 फरवरी से ईरान के खिलाफ शुरू हुए सैन्य अभियानों और अमेरिका-ईरान के बीच तनावपूर्ण संघर्ष विराम के कारण खाड़ी देशों से तेल की आपूर्ति बाधित हुई है।

मेरा स्पष्ट मानना है कि भविष्य में इस तरह की ढील दोबारा नहीं दी जाएगी। यह केवल उन देशों की मदद के लिए था जो वर्तमान वैश्विक संकट के कारण सबसे अधिक असुरक्षित हैं।

बेसेंट का यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजराइल युद्ध को लेकर दुनिया चिंतित है और होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार संकट में हैं। अमेरिका ने कच्चे तेल की कीमतें 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजारों को स्थिर करने के इरादे से मार्च में रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री के लिए छूट दी थी। इसके बाद बेसेंट ने 'व्हाइट हाउस' (अमेरिका के राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास एवं कार्यालय) में कहा था कि प्रतिबंधों से दी गई राहत की अवधि बढ़ाने की उनकी कोई योजना नहीं है लेकिन इसके दो ही दिन बाद वित्त मंत्रालय ने छूट की अवधि बढ़ा दी थी। 

वित्त मंत्री ने वैश्विक ऊर्जा बाजार पर अमेरिका-इजराइल युद्ध के असर और अन्य विषयों पर 'एसोसिएटेड प्रेस' से साक्षात्कार में अपने रुख में पहले आए बदलाव की वजह बताई। बेसेंट ने कहा कि पिछले सप्ताह विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की बैठकों के दौरान ''10 से अधिक बेहद कमजोर और गरीब देशों ने मुझसे आकर कहा, क्या आप मदद कर सकते हैं?' उन्होंने कहा, ''यह उन कमजोर और गरीब देशों के लिए था लेकिन मुझे नहीं लगता कि हम एक और बार अवधि का विस्तार करेंगे। मुझे लगता है कि समुद्र में मौजूद रूसी तेल का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल हो चुका है।'

मारोस सेफकोविच, यूरोपीय व्यापार आयुक्त

उर्वरक संकट पर भी हुई चर्चा
तेल के अलावा, सेफकोविच और बेसेंट ने उर्वरक (Fertilizer) आपूर्ति श्रृंखला में आ रही बाधाओं पर भी गहन चर्चा की:

    यूरोप और अफ्रीका: दोनों नेताओं ने अफ्रीका में उर्वरक की कमी को चिंताजनक स्थिति बताया।
    G20 से अपील: बेसेंट ने G20 देशों, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक से आग्रह किया है कि वे गरीब देशों को उर्वरक की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए समन्वित कार्रवाई करें।

भारत पर कितना बड़ा असर?
वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का 30% से 35% कच्चा तेल रूस से आयात कर रहा है। अमेरिका द्वारा दोबारा ढील न देने के संकेत भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित तरीकों से प्रभावित कर सकते हैं:

    भारत अपना लगभग आधा तेल खाड़ी देशों से मंगाता है, जो होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। अमेरिका-ईरान तनाव के कारण यह रास्ता असुरक्षित है।

    जब खाड़ी से सप्लाई बाधित हुई, तब भारत ने रूस से आयात बढ़ाकर (मार्च में रिकॉर्ड 20 लाख बैरल प्रतिदिन) अपनी कमी पूरी की। अब अगर रूसी तेल पर भी सख्ती बढ़ती है, तो भारत के पास विकल्पों की भारी कमी हो जाएगी।

    भारत अपनी कृषि के लिए रूस और अन्य क्षेत्रों से उर्वरक आयात पर निर्भर है। तेल के साथ-साथ उर्वरक आपूर्ति बाधित होने से भारत की खाद्य सुरक्षा और खेती की लागत पर बुरा असर पड़ सकता है।

    भारत को अब अन्य विकल्पों जैसे अफ्रीका, वेनेजुएला या सीधे अमेरिका से तेल आयात बढ़ाने पर विचार करना पड़ सकता है, जो रूस के मुकाबले काफी महंगा पड़ सकता है।

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