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छत्तीसगड़

न्यायपालिका को अदृश्य दुश्मनों से खतरा, इंटरपोल से सहयोग की अपील

रायपुर
अदालतों को मिल रहे लगातार धमकी भरे ई-मेल ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। अदालत परिसरों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है, लेकिन जांच एजेंसियों के हाथ अब तक खाली होने से उनके साइबर सुरक्षा तंत्र और तकनीकी क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

इसे देखते हुए अब इन अदृश्य दुश्मनों का सुराग लगाने के लिए ही इंटरपोल से मदद ली जा रही है। राज्य साइबर सेल की ओर से इस संबंध में अब पहल की गई है।

जिला अदालतों को बम से उड़ाने की धमकी भरे ई-मेल
देश के विभिन्न राज्यों की अदालतों के साथ ही बिलासपुर हाई कोर्ट, रायपुर, दुर्ग और कोरबा जैसी जिला अदालतों को बम से उड़ाने की धमकी भरे ई-मेल भेजे गए थे। एक महीने से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी स्थिति यह है कि जांच एजेंसियों के पास ठोस सुराग के नाम पर कुछ भी नहीं है।

अत्याधुनिक डिजिटल हथियारों का उपयोग किया
राज्य पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत मामले तो दर्ज किए हैं, लेकिन एनआइए से लेकर साइबर सेल तक की सक्रियता के बावजूद नतीजा सिफर (शून्य) है। जांच में यह बात सामने आई है कि ई-मेल भेजने वाले ने अपनी पहचान छिपाने के लिए वीपीएन (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क) और टोर (ओपन-सोर्स साफ्टवेयर) ब्राउजर जैसे अत्याधुनिक डिजिटल हथियारों का उपयोग किया है।

विदेशी सर्वर पर स्थित कंपनियों से डेटा प्राप्त करने में होने वाली महीनों की देरी और इंटरपोल की लंबी कागजी प्रक्रिया ने जांच की रफ्तार को पूरी तरह कुंद कर दिया है।

संसाधनों का अभाव बनी चुनौती
पुलिस मुख्यालय के अधिकारी यह स्वीकार करते हैं कि हमारे पास फिलहाल ऐसी कोई स्पेशल रिस्पांस टीम नहीं है, जो अंतरराष्ट्रीय सर्वर के पीछे छिपे अपराधियों को 24 घंटे के भीतर बेनकाब कर सके। अदालतों के बाहर सघन चेकिंग, बैग स्कैनिंग और अतिरिक्त सुरक्षा घेरे के कारण लोग और वकील परेशान हैं।

सिर्फ शरारत मान लेना बड़ी चूक
अब तक कोई अप्रिय घटना नहीं होने के कारण जांच एजेंसियां इसे सिर्फ डराने वाली शरारत के रूप में देख रही हैं। लेकिन विदेशी धरती से बैठकर देश की संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती देना किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है। मामले की तह तक जाना राज्य की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।

विशेषज्ञों की कमी पर हाई कोर्ट जता चुका है नाराजगी
बिलासपुर हाई कोर्ट ने पिछले दिनों साइबर एक्सपर्ट्स की नियुक्तियां न होने पर नाराजगी जताई थी। गृह विभाग की ओर से जवाब दिया गया कि भर्ती प्रक्रिया जारी है, लेकिन बम की इन धमकियों ने यह साफ कर दिया है कि डिजिटल सुरक्षा के क्षेत्र में हम कितने पीछे हैं।

जब तक राज्य में उच्चस्तरीय साइबर विशेषज्ञ और त्वरित डेटा रिकवरी तंत्र नहीं होगा, तब तक अदृश्य अपराधी इसी तरह हमारी व्यवस्था को चुनौती देते रहेंगे।

भविष्य में ऐसी धमकियां और गंभीर रूप ले सकती हैं
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएं केवल सुरक्षा एजेंसियों की तकनीकी क्षमता ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साइबर सहयोग की आवश्यकता को भी रेखांकित करती हैं। यदि समय रहते अत्याधुनिक उपकरण, प्रशिक्षित विशेषज्ञ और त्वरित डेटा एक्सेस व्यवस्था विकसित नहीं की गई, तो भविष्य में ऐसी धमकियां और गंभीर रूप ले सकती हैं।

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