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देश

खामेनेई की मौत पर ईरान में जश्न, लेकिन भारत में क्यों छाया मातम?

नई दिल्ली

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मिसाइल हमले में हत्या की खबर सामने आने के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर पहुंच गया है और पूरे इलाके में हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं. अमेरिका और इजरायल की तरफ से किए गए इस हमले के बाद जहां एक तरफ कई देशों में विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं और शिया मुस्लिम समुदाय के बीच गहरा शोक छा गया है. वहीं दूसरी तरफ ईरान और दुनिया के कुछ हिस्सों में लोगों ने इसे ‘फ्री ईरान' की दिशा में पहला कदम बताते हुए जश्न भी मनाया है. इसी बीच भारतीय सिनेमा में काम कर रहीं ईरानी एक्ट्रेस एलनाज नोरौजी का सोशल मीडिया रिएक्शन सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रहा है.

ईरान से आई दो तस्वीरों ने पहले विरोध की आग दिखाई थी, अब वही तस्वीरें जश्न की कहानी बन गई हैं. कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक तस्वीर में एक युवती देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की तस्वीर जलाकर उसी आग से सिगरेट सुलगाती नजर आई थी. यह दृश्य ईरान में महिलाओं के गुस्से और सत्ता के खिलाफ खुली चुनौती का प्रतीक बना. अब खामेनेई की मौत की खबर सामने आने के बाद उसी तरह की महिलाएं ‘चीयर्स’ करती और जश्न मनाती दिखाई दे रही हैं. इन तस्वीरों ने दुनिया भर में बहस छेड़ दी है कि क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया है या फिर दशकों से सख्त सामाजिक और धार्मिक पाबंदियों में जी रही ईरानी महिलाओं की आजादी की शुरुआत?

ईरान में महिलाओं का संघर्ष क्यों बना वैश्विक मुद्दा?

    पिछले कुछ सालों में ईरान में महिलाओं के अधिकार सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनकर उभरे हैं. ड्रेस कोड, सार्वजनिक जीवन में पाबंदियां और मोरल पुलिसिंग के खिलाफ लगातार आंदोलन होते रहे हैं. कई बार इन आंदोलनों को सख्ती से दबाया गया, लेकिन विरोध की आवाज पूरी तरह खत्म नहीं हुई. महसा अमिनी की मौत के बाद आंदोलन और तेज हो गया.
    खामेनेई की मौत के बाद सत्ता संरचना में संभावित बदलाव महिलाओं के आंदोलन को नई दिशा दे सकता है. हालांकि यह भी सच है कि ईरान की राजनीतिक व्यवस्था सिर्फ एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है, इसलिए तुरंत बड़े बदलाव की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी.

खामेनेई की मौत पर भारत में मातम क्यों 

तेहरान में अमेरिका और इजरायल ने जिस तरह से ताबड़तोड़ हमले किए और इसमें ईरान के सुप्रीम लीडर 86 वर्षीय अयातुल्ला अली खामेनेई ने जान गंवाई, उसे लेकर हंगामा मचा हुआ है। खामेनेई की मौत को लेकर भारत के मुस्लिम समुदाय में कुछ वर्गों के बीच खास प्रतिक्रिया नजर आई। लखनऊ, हैदराबाद, मुंबई और अलीगढ़ में शोक सभाओं, अंतिम संस्कार की प्रार्थना और ऑनलाइन संदेशों से संकेत मिलता है कि यह एक रेयर मूमेंट है। ऐसा पहली बार है जब शिया और सुन्नी, धार्मिक मतभेदों के लंबे इतिहास के बाद भी एक नेता के निधन पर साथ में शोक जताते नजर आए।

खामेनेई 1989 से कर रहे थे ईरान का नेतृत्व

  •     खामेनेई, जिन्होंने अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी की मृत्यु के बाद 1989 से ईरान का नेतृत्व किया।
  •     वो एक शिया धर्मगुरु थे और सुन्नियों के लिए कोई धार्मिक प्राधिकारी नहीं थे।
  •     उनकी मृत्यु पर प्रतिक्रियाएं सांप्रदायिक सीमाओं को पार कर गईं।
  •     कई सुन्नियों के लिए, यह भावना ईरान से कम और फिलिस्तीन से अधिक जुड़ी है।
  •     ये एक ऐसा मुद्दा है जो दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक विभाजनों को भी पार कर जाता है।

खामेनेई पर क्यों आए शिया सुन्नी साथ?
जमात-ए-इस्लामी हिंद के प्रमुख सैयद सदातुल्लाह हुसैनी ने कहा कि खामेनेई का जीवन धार्मिक अधिकार के साथ-साथ राजनीतिक दृढ़ विश्वास को भी दर्शाता था। एक बयान में कहा गया कि रमजान के पवित्र महीने में खामेनेई की शहादत ने मुस्लिम जगत के लाखों लोगों को गहरा शोक पहुंचाया है। कुछ सुन्नी मौलवियों में शोक के साथ-साथ उन मुस्लिम सरकारों की आलोचना भी शामिल थी जिन्हें चुप्पी साधे हुए देखा गया। 

सुन्नियों की इस प्रतिक्रिया पर क्या कह रहे जानकार
विद्वान बशारत अली ने कहा कि शिया राजनीतिक कल्पना में, शहादत एकता और राजनीतिक शक्ति का स्रोत बन जाती है। भारत में कई शियाओं के लिए, ईरान का धार्मिक महत्व है क्योंकि यह दुनिया का सबसे बड़ा शिया-बहुसंख्यक देश है। ये कोम और मशहद जैसे धार्मिक केंद्रों का घर है। सुन्नियों के लिए प्रतिक्रिया काफी हद तक राजनीतिक रही है, जो फिलिस्तीन और इजरायल के विरोध के इर्द-गिर्द केंद्रित है।

 

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