<?php /** * The template for displaying the header * */ defined( 'ABSPATH' ) || exit; // Exit if accessed directly ?><!DOCTYPE html> <html <?php language_attributes(); ?>> <head> <meta charset="<?php bloginfo( 'charset' ); ?>" /> <link rel="profile" href="http://gmpg.org/xfn/11" /> <?php wp_head(); ?> </head> <body id="tie-body" <?php body_class(); ?>> <?php wp_body_open(); ?> <div class="background-overlay"> <div id="tie-container" class="site tie-container"> <?php do_action( 'TieLabs/before_wrapper' ); ?> <div id="tie-wrapper"> <?php TIELABS_HELPER::get_template_part( 'templates/header/load' ); do_action( 'TieLabs/before_main_content' );
छत्तीसगड़

आत्मनिर्भर भारत की मिसाल: सबई घास से रस्सी निर्माण

रायपुर.

वनधन विकास केंद्र केड़ना की प्रेरक पहल

ग्रामीण अंचलों में आजीविका के सीमित साधनों के बीच जब स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक दृष्टिकोण से जोड़ा जाता है, तब सफलता की नई इबारत लिखी जाती है। ऐसी ही एक प्रेरक कहानी है धर्मजयगढ़ वनमंडल अंतर्गत वनधन विकास केंद्र केड़ना की, जहाँ सबई घास से रस्सी निर्माण ने ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आर्थिक और सामाजिक बदलाव लाया है।

वन विभाग की अधिकारियों ने आज यहाँ बताया कि सबई घास रायगढ़ जिले के वन क्षेत्रोंकृजमझोर, केड़ना, सोलमुड़ा, सोरझुड़ा, अन्नोला एवं पेलमाकृमें प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। पारंपरिक रूप से ग्रामीण महिलाएं इससे हाथ से रस्सी बनाकर घरेलू उपयोग या स्थानीय बाजारों में सीमित स्तर पर बिक्री करती थीं। हालांकि, बाजार तक सीधी पहुंच और उचित मूल्य न मिलने के कारण यह कार्य बड़े पैमाने पर आय का साधन नहीं बन पा रहा था।

इसी कड़ी में राज्य सरकार की वनधन योजना के अंतर्गत वनधन विकास केंद्र केड़ना की स्थापना कर महिलाओं को स्व-सहायता समूहों के माध्यम से संगठित किया गया। उन्हें सबई घास से रस्सी निर्माण के लिए हाथों एवं विद्युत चालित मशीनें उपलब्ध कराई गईं। स्तर ही व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया गया। इससे महिलाओं की उत्पादन क्षमता बढ़ी और गुणवत्ता में भी सुधार हुआ।

दरअसल सबई घास से निर्मित रस्सी का उपयोग बांस के बंडलों को बांधने में किया जाता है, जिसकी मांग वन विभाग एवं पेपर उद्योग में लगातार बनी रहती है। वन विभाग द्वारा सबई रस्सी को 45 रुपये प्रति किलो की दर से क्रय किया जाता है, जिससे महिलाओं को मजदूरी के रूप में नियमित आय प्राप्त हो रही है। वहीं तैयार रस्सी को विभिन्न वनमंडलों में 75 रुपये प्रति किलो की दर से विक्रय कर वनधन केंद्र को भी लाभ मिल रहा है।

अधिकारियों ने बताया कि पिछले वर्षों में वनधन केंद्र केड़ना से जुड़ी महिलाओं ने 30 से 40 क्विंटल रस्सी का निर्माण कर 1.5 से 2 लाख रुपये तक की आय अर्जित की।

वर्ष 2025-26 में 150 क्विंटल रस्सी निर्माण का लक्ष्य रखा गया है, जिससे लगभग 7 से 8 लाख रुपये की आय ग्रामीण महिलाओं को होने की संभावना है। मार्च 2026 तक कुल 11.25 लाख रुपये मूल्य की रस्सी निर्माण कर 7.50 लाख रुपये मजदूरी के रूप में ग्रामीणों को प्राप्त होने का अनुमान है।
यह परियोजना पूरी तरह ईको-फ्रेंडली है। सबई घास का विनाश रहित दोहन किया जाता है, जिससे वन संरक्षण और पर्यावरण संतुलन बना रहता है। भविष्य में भू-क्षरण प्रभावित क्षेत्रों में सबई घास रोपण की योजना भी प्रस्तावित है, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ रोजगार के अवसर और बढ़ेंगे।

वनधन विकास केंद्र केड़ना की यह पहल इस बात का सशक्त उदाहरण है कि यदि स्थानीय संसाधनों का वैज्ञानिक और संगठित उपयोग किया जाए, तो ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकती हैं। सबई घास से रस्सी निर्माण ने न केवल रोजगार सृजन किया है, बल्कि महिलाओं में आत्मविश्वास, आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन की नई उम्मीद भी जगाई है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button