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मध्यप्रदेश

खूबचंद की मौत के बाद प्रदर्शन जारी, इंदौर में दूषित पानी से संकट, ICU में तीन मरीज और वेंटिलेटर पर एक

इंदौर 

भागीरथपुरा के खूबचंद पिता गन्नूदास की दूषित पानी से मंगलवार को मौत हो गई थी। बुधवार को उनके परिजनों ने अंत्येष्टी से पहले सड़क पर शव रखकर प्रदर्शन किया। खूबचंद की मौत के साथ ही भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों की संख्या 29 हो चुकी है। 

यह कहा जाता है कि द्यजल ही जीवन हैद्ग, लेकिन देश के सबसे साफ शहर माने जाने वाले इंदौर की एक बस्ती में पानी ही मौत की वजह बन गया है। दूषित पानी के कारण भागीरथपुरा में 30 दिन में 29 मौतें हो चुकी हैं। अभी भी तीन लोग जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। इस कांड को एक माह पूरा हो रहा है, लेकिन अभी भी पूरी बस्ती में साफ पानी नहीं मिल पाया है और न ही अफसर यह बता पाए कि दूषित पानी के कारण आखिर इतनी मौतें कैसे हो गईं? यह कांड सामने आने के बाद कई सरकारी जांचें हुईं और आयोग का गठन भी हो चुका है। मामला कोर्ट में है, लेकिन अब तक किसी भी जिम्मेदार के खिलाफ कोई आपराधिक केस दर्ज नहीं हुआ है।

29 दिसंबर को भागीरथपुरा बस्ती के 20 मरीज दो अलग-अलग निजी अस्पतालों में भर्ती हुए थे। उन्हें देखने क्षेत्रीय विधायक कैलाश विजयवर्गीय पहुंचे थे, जिसके बाद दूषित पानी से फैल रही बीमारी का खुलासा हुआ। 30 दिसंबर को अस्पताल में भर्ती एक व्यक्ति की पहली मौत हुई थी। इन मौतों के पीछे नगर निगम की भारी लापरवाही उजागर हुई है। बस्ती की पाइपलाइनें 30 साल से ज्यादा पुरानी और जर्जर हो चुकी हैं। भागीरथपुरा से जुड़ा नगर निगम का जोन शिकायतों के मामले में शहर में दूसरे स्थान पर है। पिछले दो माह में यहाँ सबसे ज्यादा गंदे पानी की शिकायतें मिली थीं, लेकिन अफसरों ने उन पर ध्यान नहीं दिया।

शौचालय के नीचे से गुजरती रही पाइपलाइन

हैरानी की बात यह है कि सालभर से लाइन बदलने के प्रस्ताव तैयार थे, लेकिन काम शुरू नहीं हुआ। गंदे पानी की शिकायतों को अफसरों ने गंभीरता से नहीं लिया। जिस नर्मदा लाइन से घरों में पानी जाता है, उसके ऊपर पुलिस चौकी का शौचालय बना दिया गया और मल-मूत्र का पानी नर्मदा लाइन में समाता रहा। जब मौतें होने लगीं, तब अफसरों ने शौचालय तोड़कर लीकेज खोजा। पूरी लाइन में 30 से ज्यादा लीकेज मिले, जिन्हें एक माह बाद भी पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सका है।

कोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम की पेश रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि जमीनी स्तर पर सुरक्षित पानी की आपूर्ति, इलाज और जांच संबंधी निर्देशों का पूरा पालन नहीं हुआ है। मौतों के आंकड़ों को लेकर भी गंभीर असहमति सामने आई। जहां सरकारी रिपोर्ट में 16 मौतों को जलजनित बीमारी से जोड़ा गया है, वहीं याचिकाकर्ताओं ने मृतकों की संख्या लगभग 30 बताई है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एकल सदस्यीय जांच आयोग बनाया है। आयोग जल प्रदूषण के कारणों, वास्तविक मौतों की संख्या, बीमारियों की प्रकृति, चिकित्सा व्यवस्था की पर्याप्तता, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही और पीड़ितों को मुआवजे पर रिपोर्ट देगा।

कोर्ट ने दैनिक जल गुणवत्ता जांच और नियमित स्वास्थ्य शिविर जारी रखने के निर्देश देते हुए चार सप्ताह में अंतरिम रिपोर्ट मांगी है। अगली सुनवाई 5 मार्च 2026 को होगी।

आयोग को व्यापक अधिकार आयोग को सिविल कोर्ट के समान अधिकार दिए गए हैं। वह अधिकारियों व गवाहों को तलब कर सकेगा, दस्तावेज मंगा सकेगा, जल गुणवत्ता परीक्षण करा सकेगा और स्थल निरीक्षण कर सकेगा। राज्य सरकार आयोग को आवश्यक स्टाफ, कार्यालय और संसाधन उपलब्ध कराएगी।

रिपोर्ट में मौतों के कारण स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि भागीरथपुरा के 30 प्रतिशत हिस्से में वाटर सप्लाई शुरू कर दी गई है। यह हिस्सा साढ़े 9 किमी का है। हालांकि, जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की पीठ ने रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में यूज किए गए वर्बल अटॉप्सी शब्द पर भी आपत्ति जताई है।

कोर्ट ने पूछा है कि यह शब्द मेडिकल का है या आपके द्वारा ईजाद किया है। अदालत ने यह भी पाया कि रिपोर्ट में मौतों के कारण स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हैं और उसमें पर्याप्त तर्क एवं सहायक सामग्री का अभाव है।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि रिपोर्ट की विश्वसनीयता सिद्ध करने के लिए अधिक उपयुक्त, ठोस और प्रामाणिक दस्तावेज प्रस्तुत करें। इसके अलावा अंतरिम राहत के स्वरूप पर भी चिंता व्यक्त की।

सवाल उठाया है कि समिति अपने सुझावों का प्रभावी और निष्पक्ष क्रियान्वयन किस प्रकार सुनिश्चित करेगी। क्षेत्र में लगातार हो रही मौतें और उनके कारणों की अनिश्चितता अत्यंत चिंताजनक है।

रिपोर्ट को बताया ‘आई-वॉश’ सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने रिपोर्ट को अस्पष्ट बताते हुए उसे मात्र एक 'आई-वॉश' करार दिया है। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला ने नगर निगम को निर्देशित किया कि वरिष्ठ अधिवक्ता के सुझाए गए परीक्षणों पर गंभीरता से विचार किया जाए। कोर्ट की सभी चिंताओं का स्पष्ट एवं ठोस उत्तर प्रस्तुत करें।

इसके अलावा, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने न्यायालय परिसर में स्वच्छता और जल की स्थिति का भी संज्ञान लिया और संबंधित अधिकारियों को स्वच्छ एवं सुरक्षित जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

सिर्फ 8 पैरामीटर्स पर पानी की कैसी टेस्टिंग निगम की ओर से तर्क दिया कि पानी की टेस्टिंग की गई है। याचिकाकर्ता ने कहा कि सिर्फ 8 मानकों पर पानी की टेस्टिंग की गई जबकि 2018 में मप्र प्रदूषण मंडल ने भागीरथपुरा समेत इंदौर के पानी की 34 मानकों पर टेस्टिंग की थी। इस पानी को फिकल कंटामिनेटेड पाया था।

ऐसे में जब भागीरथपुरा में 28 मौतें हो चुकी हैं तो निगम सिर्फ 8 मानकों पर टेस्टिंग कैसे कर रही है। निगम ने यह भी नहीं बताया कि टेस्टिंग का तरीका क्या था। मामले में याचिकाकर्ता की ओर से विश्वस्तरीय तीन पैरामीटर्स पर पानी की टेस्टिंग के तीन तरीके बताए गए।

मदद रेडक्रॉस से, शासन की ओर से कुछ भी नहीं याचिकाकर्ता की ओर से बताया कि मुआवजे को लेकर भी झूठी जानकारी दी जा रही है। अभी मृतकों को जो 2-2 लाख रुपए की राशि दी गई है वह रेड क्रॉस सोसायटी की ओर से दी जा रही है। शासन की ओर से तो कोई मुआवजा नहीं मिला।

शासन अन्य हादसों में मृत व्यक्ति के परिजन को 4-4 लाख रुपए देती है लेकिन जिनकी दूषित पानी से मौत हुई हैं उनकी जिंदगी की कीमत नहीं लगाई। इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए। सुनवाई के बाद कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रखा है।

'लगातार शिकायतें चिंताजनक'

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि भागीरथपुरा से लगातार आ रही दूषित पानी की शिकायतें अत्यंत चिंताजनक और अलार्मिंग हैं। साथ ही यह भी संज्ञान लिया गया कि महू सहित अन्य क्षेत्रों से भी गंदे पानी की शिकायतें सामने आ रही हैं। पीठ ने दो टूक कहा कि नागरिकों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना शासन की मूल जिम्मेदारी है और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार्य नहीं है। हाईकोर्ट ने शासन द्वारा पेश की गई रिपोर्ट पर असंतोष जताते हुए उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।

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