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धर्म/ज्योतिष

माता-वध का कठिन आदेश: किस परिस्थिति में परशुराम ने उठाया था यह कदम और क्या थे तीन वरदान

जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु के दस अवतार हैं. इन अवतारों में से ही एक है भगवान परशुराम. भगवान परशुराम विष्णु जी के छठवें अवतार हैं. माना जाता है कि भगवान परशुराम आज भी धरती पर वास कर रहे हैं. परशुराम भगवान का नाम राम था, लेकिन जब भगवान शिव ने उनको एक दिव्य फरसा दिया तो उनका नाम परशुराम पड़ गया.

भगवान परशुराम के पिता का नाम महर्षि जमदग्नि और उनकी माता का नाम रेणुका था. श्री हरुि विष्णु ने माता रेणुका के गर्भ से शुक्र की आंशिक उर्जा से परशुराम के रूप में जन्म लिया था. उनका कुल ब्राह्मण था, लेकिन वो स्वभाव और कर्म से क्षत्रिय के रूप में जाने जाते हैं. परशुराम जी को बहुत बड़े पितृ भक्त के रूप में भी जाना जाता है. उन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी मां का सिर काट दिया था. फिर उन्होंने पिता से तीन वरदान मांगे थे. आइए इस कथा के बारे में विस्तार से जानते हैं.

पतिव्रता नारी थीं माता रेणुका

एक कथा के अनुसार, रेणुका माता का पतिव्रत धर्म बहुत ऊंचा था. रेणुका माता कभी भी पके हुए मिट्टी के घड़े में पानी नहीं लाती थीं, बल्कि वो अपने पतिव्रत धर्म से कच्ची मिट्टी के घड़े में ही मेंं पानी लाया करती थीं. घड़े से एक बूंद भी पानी नहीं गिरता था. एक दिन वो आश्रम से नदी में पानी लेने गईं. इस दौरान जल भरते समय उनकी नजर चित्रांगद नाम के एक गंधर्व पर पड़ी, जो अपनी अप्सराओं के साथ विलास में डुबा हुआ था.

ये सब देकखर माता रेणुका का मन एक छण के लिए मचल गया. फिर उसी समय उनका पतिव्रत धर्म नष्ट या कहें कि खंडित हो गया. इसके बाद जिस कच्ची मिट्टी के घड़े वो जल लेकर जाया करती थीं, उसमें पानी रुका ही नहीं. ये देखकर माता रोने लगीं और आश्रम वापस लौट आईं. इसके बाद महर्षि जमदग्नि आए और उन्होंने अपने तप के प्रभाव से सब कुछ जान लिया. महर्षि जमदग्नि सबकुछ जानकर बहुत क्रोधित हुए.

महर्षि जमदग्नि ने बेटों को दिया श्राप

महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पांच बेटे थे. उन्होंने सबको बुलाया. सबसे पहले उन्होंने अपने सबसे बड़े बेटे को आदेश दिया कि अपनी मां का सिर काट दो. बेटे ने कहा कि आपकी आज्ञा हो तो मैं अपने प्राण दे सकता हूं, लेकिन मां के प्राण नहीं ले सकता. फिर उन्होंने क्रोध में बेटे को विवेकहीन हो जाने का श्राप दे दिया. इसी तरह तीनों बेटों ने मना कर दिया और सभी को महर्षि जमदग्नि ने विवेकहीन हो जाने का श्राप दे दिया.

परशुराम जी ने काटा मां सिर और मांगे वरदान

अंत में उन्होंने परशुराम जी को बुलाया और बाकी सब की तरह उन्हें भी मां का सिर काट देने के लिए कहा. परशुराम जी ने बिना एक पल विचार किए पिता की आज्ञा का पालन करते हुए माता रेणुका का सिर काट दिया. ये देखकर महर्षि जमदग्नि बहुत प्रसन्न हुए और बेटे से वरदान मांगने के लिए कहा. तब परशुराम जी ने तीन वरदान मांगे. परशुराम जी ने पहले वरदान के रूप में माता रेणुका का जीवन मांगा. दूसरे वरदान के रूप में परशुराम ने ये मांगा की मां को कभी याद न रहे कि मैंने उनका सिर काट दिया था.

तीसरे और अंतिम वरादन के रूप में उन्होंने पिता से अपने भाइयों की चेतना मांगी. महर्षि जमदग्नि ने तीनों वरदान अपने पुत्र को दे दिए. एक कथा ये भी है कि माता रेणुका को सब कुछ याद था. उन्होंने एक दिन अपने पुत्र परशुराम को बुलाकर कहा था कि जिस तरह तुमने मुझे कष्ट दिया, उसी प्रकार एक दिन तुमको भी कष्ट होगा. कहा जाता है कि रामायण काल में माता रेणुका कैकेयी के रूप में आई थीं. उन्होंने विष्णु जी के एक अन्य अवतार भगवान राम के लिए वनवास मांगा था.

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