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मध्यप्रदेश

शुक्रवार को बसंत पंचमी: दिनभर पूजा की अनुमति के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका

इंदौर
 उत्तर प्रदेश के ज्ञानवापी की तरह ही मध्य प्रदेश के धार में मौजूद भोजशाल भी विवादों में है. वहीं बसंत पंचमी आते ही मध्य प्रदेश की 800 साल पुरानी भोजशाला की चर्चा शुरू हो जाती है, खासकर बसंत पंचमी अगर शुक्रवार को पड़े तो प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था का खास ख्याल रखना पड़ता है. इसकी वजह है कि भोजशाला को लेकर दो पक्षों के बीच स्वामित्व का विवाद चल रहा है, जो सुप्रीम कोर्ट में है. शुक्रवार को बसंत पंचमी होने पर सांप्रदायिक तनाव न बने इसे लेकर प्रशासन अलर्ट मोड पर रहता है. इस बार भी बसंत पंचमी 23 जनवरी यानि शुक्रवार को है, जिसे लेकर भारी संख्या में भोजशाला में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है.

कई सालों से इस स्थिति का सामना

इस साल फिर बसंत पंचमी शुक्रवार को है और इसी दिन जुमा भी पड़ रहा है. पूजा और नमाज के दौरान यहां किसी तरह का सप्रदायिक तनाव न हो, इसके लिए 20 जनवरी से ही धार शहर में बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया जाएगा. करीब ढाई हजार पुलिस अधिकारी, कर्मचारी यहां मोर्चा संभालेंगे. जो फुल सिक्योरिटी प्लान के तहत बसंत पंचमी के दिन किसी भी तरह के हालात बिगड़ने पर तत्काल कार्रवाई करेंगे. एक ही दिन पूजा और नमाज वाली ऐसी ही स्थिति यहां साल 2006, 2013 और 2016 में भी बनी थी.

उस दौरान पहले भी यहां तीनों मौके पर आगजनी पथराव और कर्फ्यू की स्थिति बन गई थी. हालांकि जिला प्रशासन द्वारा दोनों ही पक्षों को समझाकर इस आयोजन को शांतिपूर्ण रूप से संपन्न कराया था. इस बार फिर यहां हिंदू फ्रेंड फॉर जस्टिस नामक संगठन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई है कि बसंत पंचमी पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के आदेश के आधार पर दिनभर पूजा की अनुमति दी जाए. एडवोकेट विष्णु शंकर जैन के मुताबिक "सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई यचिका पर जल्द सुनवाई की मांग की गई है, क्योंकि बसंत पंचमी 23 जनवरी को है."

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया भी बेबस

भोजशाला को लेकर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने 7 अप्रैल 2003 को जो आदेश दिया था, उसमें हिंदू समाज को बसंत पंचमी पर भोजशाला में सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा करने की अनुमति दी थी, लेकिन बसंत पंचमी पर शुक्रवार होने की स्थिति में इस आदेश में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था. लिहाजा बसंत पंचमी पर जुम्मा होने के कारण यहां विवाद की स्थिति बनने की आशंका रहती है. इस स्थिति के चलते इस मामले से जुड़ी याचिका की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने भोजशाला के पुरातात्विक सर्वेक्षण के आदेश दिए थे.

इसके बाद यहां किए गए सर्वे की 2000 पेज वाली रिपोर्ट में आर्कियोलॉजिकल सर्वे में स्पष्ट किया गया है कि गौशाला परिसर से विभिन्न धातुओं के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जो दसवीं से 16वीं शताब्दी के बीच के हैं. इसके अलावा यहां 94 मूर्तियों के टुकड़े मिले जो मूर्तियां गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह और भैरव की है. वहीं पशु-पक्षियों की प्रतिकृतियों के अवशेष भी मिले हैं. हालांकि इसके स्वामित्व पर फैसला कोर्ट में ही लंबित है.

यह है गौशाला को लेकर पुराना विवाद

धार में पुरातात्विक इमारत को हिंदू समाज माता सरस्वती वाग्देवी का मंदिर मानकर यहां बसंत पंचमी पर पूजा अर्चना करता है. वही मुस्लिम समाज इसी स्थान को मौलाना कमाल अहमद की दरगाह मानता रहा है. 1935 में धार रियासत के दीवान ने भोजशाला में मुस्लिम समाज को शुक्रवार के दिन नमाज की अनुमति दी थी. इसके बाद से ही धार के गौशाला विवाद की शुरुआत हुई.

लिहाजा बसंत पंचमी के दिन जब भी शुक्रवार अथवा जुम्मे का दिन आता है, तो यहां एक ही दिन पूजा और नमाज होने की मजबूरी के चलते पूरा शहर सांप्रदायिक हिंसा की आशंका में पुलिस छावनी में तब्दील हो जाता है. इसके बाद यहां भोजशाला परिसर पूजा और नमाज के अलग-अलग समय के निर्धारण के बाद पूजा और फिर नमाज अता कराई जाती है.

यह है इस स्थान का महत्व और इतिहास

धार जिला प्रशासन के मुताबिक 11वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज ने भोजशाला का निर्माण कराया था, इस दौरान यहां माता सरस्वती वाग्देवी की प्रतिमा की स्थापना का भी उल्लेख बताया जाता है. परमार काल के बाद यह स्थान राजपूत शासकों की राजधानी और मालवा की राजधानी भी रहा. मुगल काल में अलाउद्दीन खिलजी ने 1305 में भोजशाला को ध्वस्त कर दिया.

इसी दौरान यहां अन्य मुगलकालीन शासकों ने परिसर में मस्जिद का निर्माण कराया. मुगल काल समाप्त होने के बाद 1875 में ब्रिटिश काल के दौरान ब्रिटिश मेजर किन केड यहां स्थापित वाग्देवी की मूर्ति को लेकर लंदन चले गए, जो आज भी लंदन के म्यूजियम में मौजूद है.

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