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उत्तर प्रदेश

माघ मेले के आयोजन के इतिहास में पहली बार जारी हुआ माघ मेले का प्रतीक चिन्ह, सीएम के स्तर पर किया गया जारी

मेला क्षेत्र के अंदर और मिलेगी माघ मेला के प्रतीक चिन्ह की जगह, नव्य स्वरूप में दिखेगा माघ मेला

प्रयागराज
प्रयागराज महाकुंभ-2025 के दिव्य और भव्य  आयोजन के बाद अब उत्तर प्रदेश की योगी सरकार अब  माघ मेला-2026 को भी अभूतपूर्व  स्वरूप देने की तैयारी में है । इसी क्रम  में माघ मेले के दर्शन तत्व को उद्घाटित करता माघ मेले का प्रतीक चिन्ह जारी हुआ है। मुख्यमंत्री के स्तर से माघ मेले का यह लोगो जारी किया गया है। 

माघ के माहात्म्य और ज्योतिषीय तत्वों का संयोजन
जारी किए गए लोगो में माघ मास में संगम किनारे जप,तप साधना और कल्पवास की महत्ता के साथ इस अवधि नक्षत्रों की अवस्थिति के आधार पर सप्त ऊर्जा चक्रों को स्थान दिया गया है। लोगो में अक्षय पुण्य का संचय साक्षी अक्षयवट, सूर्य देव और चंद्र देव की 27 नक्षत्रों के साथ की ब्रह्मांडीय यात्रा,  श्री लेटे हुए हनुमान जी का दर्शन बोध कराता बड़े हनुमान जी का मंदिर, सनातन के विस्तार की प्रतीक सनातन पताका और संगम पर साइबेरियन पक्षियों की कलरव को ध्वनित करने वाला पर्यावरण बोध सभी का इसमें समावेश है।  लोगो पर श्लोक "माघे निमज्जनं यत्र पापं परिहरेत् तत:" माघ के महीने में स्नान करने से सभी पाप मुक्ति का शंखनाद कर रहा है। 

अनुष्ठान और आध्यात्मिक साधना का योग
यह लोगो मेला प्राधिकरण द्वारा आबद्ध किए गए डिजाइन कंसल्टेंट अजय सक्सेना एवं प्रागल्भ अजय द्वारा डिजाइन किया गया जिसे मुख्यमंत्री के स्तर पर जारी किया गया है। जारी लोगो का दर्शन माघ महीने के सूर्य और चंद्र की स्थिति को भी उद्घाटित करता है। ज्योतिषाचार्य आचार्य हरि कृष्ण शुक्ला बताते हैं कि सूर्य एवं चंद्रमा की 14 कलाओं की उपस्थिति ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य, चंद्रमा एवं नक्षत्रों की स्थितियों को प्रतिबिंबित करता है जो प्रयागराज में माघ मेले का कारक बनता है।  भारतीय ज्योतिषीय गणना के अनुसार चंद्रमा 27 नक्षत्रों की परिक्रमा लगभग 27.3 दिनों में पूर्ण करता है। माघ मेला इन्हीं नक्षत्रीय गतियों के अत्यंत सूक्ष्म गणित पर आधारित है। जब सूर्य मकर राशि में होता है और पूर्णिमा के दिन चंद्रमा माघी या अश्लेषा-पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्रों के समीप होता है, तब माघ मास बनता है और उसी काल में माघ मेला आयोजित होता है। इसी तरह चंद्रमा की 14 कलाओं का संबंध मानव जीवन, मनोवैज्ञानिक ऊर्जा और आध्यात्मिक साधना से माना गया है। माघ मेला चंद्र-ऊर्जा की इन कलाओं के सक्रिय होने का विशेष काल भी है। अमावस्या से पूर्णिमा की ओर चंद्रमा की वृद्धि (शुक्ल पक्ष) साधना की उन्नति के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। माघ स्नान की तिथियाँ चंद्र कलाओं के अत्यंत सूक्ष्म संतुलन पर चुनी जाती हैं। माघ महीने की ऊर्जा (शक्ति) अनुशासन, भक्ति और गहन आध्यात्मिक कार्यों से जुड़ी होती है क्योंकि यह महीना पवित्र नदियों में स्नान, दान, तपस्या और कल्पवास जैसे कार्यों के लिए विशेष माना जाता है। इस माह में किए गए कार्य व्यक्ति को निरोगी बनाते हैं और उसे दिव्य ऊर्जा से भर देते हैं।

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