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देश

विनीत तिवारी की फ़लस्तीन यात्रा, कहा— इंसानियत के नाम पर हमेशा फ़लस्तीन के साथ खड़ा रहना चाहिए

फ़लस्तीन यात्रा से लौटे विनीत तिवारी *

फ़लस्तीन के साथ खड़ा होना इंसानियत का तकाज़ा

_” अपने देश में बाँध विस्थापितों के नर्मदा बचाओ आंदोलन में या आदिवासी संगठनों के आंदोलनों में राज्य की हिंसा की वारदातों में, या सांप्रदायिक हिंसा पीड़ित इलाक़ों में स्वतंत्र जाँच दल के सदस्य की हैसियत से जाने पर अनेक बार पुलिस तथा सांप्रदायिक-फ़ासीवादी विचार वाले लोगों से आमना-सामना भी हुआ और झड़प भी, लेकिन फ़लस्तीन यात्रा मेरे लिए मानसिक तौर पर ज़्यादा चुनौतीपूर्ण थी। कभी डर का ऐसा अहसास नहीं हुआ था जैसा फ़लस्तीन जाते वक़्त हुआ। एक दूसरे देश में जहाँ इज़रायल ने हथियारों की ताक़त के दम पर इंसाफ़ को क़ैद किया हुआ है, जहाँ इतने बड़े-बड़े सीसीटीवी कैमरे लगे हैं कि लगता है, वे आपको कपड़ों में भी बिना कपड़ों के देख रहे हों, जहाँ चप्पे-चप्पे पर हथियारबंद फौजी होना आम बात है, और जहाँ इज़रायल ने 75 वर्षों से नस्लीय हिंसा फैला रखी है, वहाँ फ़लस्तीनियों के हाल जानना, उनसे मिलना कभी भी आशंकाओं से खाली नहीं होता था। लेकिन एक निश्चय था कि फ़लस्तीन के इंसाफ़ के संघर्ष को जानना और उसे जितना ज़्यादा हो सके, उतने लोगों तक पहुँचाना भी ज़रूरी है, इसीलिए मैं डर और ख़तरे के बावजूद वहाँ गया।

– विनीत तिवारी

(फ़लस्तीन से लौटकर)_

फ़लिस्तीनियों को मानव अधिकारों से वंचित रखकर दुनिया भर से मौकापरस्त यहूदियों और अन्य धर्मों के लोगों को फ़लस्तीन की ज़मीन पर बसाया गया है। इज़रायल में अमेरिकी समर्थन से ये लोग ऐश का जीवन जी रहे हैं। शेष आबादी, फ़लस्तीन के मूल निवासी, ईसाई और मुसलमान दोनों ही प्रताड़ित और अपमानित जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं।

यह जानकारी प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने दी। वे हाल ही में फ़लस्तीन के हालात को क़रीब से जानने के लिए फ़लस्तीन गए थे। वहाँ उन्होंने दस दिनों तक वेस्ट बैंक के अनेक शहरों और गाँवों में जाकर मौजूदा हालात का जायज़ा लिया।

प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई द्वारा अभिनव कला समाज में अनुभव साझा करने हेतु 24 नवंबर को आयोजित एक सभा में नगर के प्रबुद्धजनों को संबोधित करते हुए विनीत तिवारी ने बताया कि इज़रायल में फ़लिस्तीनियों को बेहद सीमित आज़ादी मिली हुई है। उन्हें बेथलहम से दस किलोमीटर दूर जेरुसलम जाने के लिए भी तमाम चेकपोस्टों से होकर गुजरना पड़ता है। कदम-कदम पर उन्हें जाँच चौकियों पर इज़रायली सैनिकों के अपमानजनक व्यवहार और उनकी मनमानियों से जूझना पड़ता है। अधिकांश इज़रायली लोग फ़लिस्तीनियों के साथ घोर अपमानजनक भेदभावभरा नस्लभेदी व्यवहार करते हैं। इज़रायली सरकार ने फ़लस्तीनियों के लिए अलग सड़कें बना रखी हैं, उनकी गाड़ियों की नंबर प्लेटें भी अलग होती हैं। एक ही शहर में एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले तक जाने के लिए भी पाबंदियाँ हैं। जगह-जगह आठ मीटर ऊँची दीवारें खड़ी की हुई हैं, जिन पर पूरा वक़्त निगरानी रहती है। फ़लस्तीनी लोग उन सड़कों पर नहीं जा सकते जो इज़रायली लोगों के लिए बनायी गईं हैं। लेकिन इज़रायली लोगों को कुछ भी करने के विशेषाधिकार दिए हुए हैं। यहाँ तक कि फ़लस्तीनी लोगों की हत्या करने पर भी वे छोड़ दिये गए हैं।

वेस्ट बैंक और गाज़ा के हालात में फ़र्क़ के बारे में उन्होंने कहा कि जो गाज़ा में इज़रायल ने एक झटके में कर दिया, वेस्ट बैंक में वे उसे धीरे-धीरे रोज़-रोज़ कर रहे हैं। फ़लस्तीन के किसानों की सैकड़ों एकड़ में खड़ी जैतून की फ़सल लूट लेना, उनकी ज़मीनों पर क़ब्ज़ा कर लेना, उनके मवेशी लूट लेना इज़रायली लोगों के लिए और इज़रायली फौजियों के लिए आम है। वहाँ के घुमंतू आदिवासी बेदुइन लोग इन इज़रायली घुसपैठियों के ज़ुल्म का रोज़ निशाना बनते हैं। इज़रायल दूसरे देशों से मौकापरस्त लाखों लोगों को ऐशो-आराम की ज़िंदगी का लालच देकर फ़लस्तीन की ज़मीन पर बसा रहा है ताकि फ़लस्तीनी लोग लगातार सिकुड़ते जाएँ।

बेशक वेस्ट बैंक के हालात गाज़ा से बहुत बेहतर हैं। गाज़ा में अब तक क़रीब एक लाख फ़लस्तीनी लोग मार दिए गए हैं। हज़ारों लाशें मलबे के नीचे अभी भी दबी हुई हैं। नब्बे फ़ीसदी इमारतें इज़रायली बमों से ज़मींदोज़ हो चुकी हैं। अस्पताल भी बमों के निशाने बने हैं और डॉक्टर भी। स्कूल-कॉलेज तो भूल जाइए, तीन साल से युद्ध के चलते ज़रूरी दवाओं, सैनिटरी पैड्स, पीने के पानी और खाने के भी लाले पड़े हुए हैं। गाज़ा में जो लोग रहते हैं, वे भी वेस्ट बैंक के लोगों के ही रिश्तेदार हैं। अपने ही देश के लोगों और रिश्तेदारों की यह हालत उनके लिए भी बहुत तक़लीफ़देह है लेकिन वे मजबूर महसूस करते हैं। वेस्ट बैंक में हज़ारों एकड़ ज़मीन इज़रायली क़ब्ज़े में ली जा रही है जहाँ बाहर से लाकर लाखों लोगों को स्थानीय फ़लस्तीनी लोगों के अधिकार छीनकर बसाया जा रहा है। पेयजल वितरण में भी फ़लस्तीनियों के साथ पक्षपात होता है। सार्वजनिक स्थलों पर फ़लिस्तीनियों से सावधान रहने की चेतावनी के बोर्ड लगे हैं।

उन्होंने पैलस्टीन एडमिनिस्ट्रेशन (पीए) और हमास के फ़र्क़ के बारे में भी बताया और एकता के सूत्रों के बारे में भी। उन्होंने बताया कि वे जेनिन रिफ्यूजी कैम्प के पीड़ितों से भी मिले जिनके हज़ारों घरों को जनवरी में एक रात में ही मलबे के ढेर में बदल दिया गया। उन्होंने जबाबदेह, नाबलुस, आर्मीनिया, जेरिको, जॉर्डन वैली, जेरुसलम और सबस्तिया आदि जगहों के अपने अनुभव बताये। एक महत्त्वपूर्ण बात उन्होंने यह भी बतायी कि सभी इज़रायली नागरिक इज़रायली सरकार के इस नस्लभेदी अमानवीय रवैये के समर्थक नहीं हैं। अनेक इज़रायली नागरिक फ़लस्तीनी नागरिकों के हक़ के लिए अपनी सरकार से लड़ भी रहे हैं। उन्हीं में रूसी मूल का युवा इज़रायली नागरिक आंद्रे और इज़रायली कम्युनिस्ट पार्टी की सांसद आईदा टॉमस सुलेमान, कैरोस फ़ॉर पैलस्टीन के रिफ़त कसीस जैसे लोग भी हैं जिनसे विनीत की मुलाक़ात हुई। वे बेतेलहेम विश्वविद्यालय के फ़लस्तीनी विद्यार्थियों से भी मिले जहाँ ग़सान कनाफ़ानी और मेहमूद दरवेश के चित्र और शब्द अंकित थे।

उन्होंने बताया कि फिलिस्तीन की समस्या प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश शासकों की देन है। उन्होंने फ़लस्तीन पर अपना क़ब्ज़ा हासिल करने के साथ ही दुनिया भर में फैले यहूदीवादी लोगों को फ़लस्तीन पर क़ब्ज़े के लिए उकसाना शुरू कर दिया था। बाद में 1948 में अँग्रेज़ों ने फ़लस्तीन से अपने हाथ झाड़कर यह देश यहूदियों को सौंप दिया। जब विवाद संयुक्त राष्ट्र संघ पहुंचा तो यहूदियों और फिलिस्तीनियों के मध्य भूमि का बँटवारा किया गया। उस बँटवारे में यहूदीवादी लोगों को इज़रायल बनाने के लिए फ़लस्तीन की 55 फ़ीसद से ज़्यादा ज़मीन दे दी गई जबकि उनकी आबादी 10 फ़ीसद से भी कम थी। इसके विरोध में फ़लस्तीन के लोगों और अन्य पड़ोसी अरब देशों ने युद्ध किया जिसमें इज़रायल को ब्रिटिश और अन्य पश्चिमी देशों की मदद से जीत हासिल हुई और उन्होंने फ़लस्तीन का 55 फ़ीसद से भी ज़्यादा हिस्सा क़ब्ज़ा कर लिया। तभी से इज़रायल को अमेरिका और योरप ने अपनी शह देना भी जारी रखा ताकि पश्चिम एशिया के देशों के बीच उनका राजनीतिक प्रभुत्व क़ायम रहे।

यासिर अराफ़ात और यित्ज़ाक़ रेबिन के प्रयासों से हुए ओस्लो समझौते के बावजूद यहूदीवादियों ने उसे कभी स्वीकार नहीं किया। वे हिंसा के ज़रिये फ़लस्तीनियों को अपने घर, खेत और संपत्ति छोड़ने के लिए मजबूर करते रहे। यहाँ तक कि किसी कट्टरवादी यहूदीवादी ने ही रेबिन के शांति प्रयासों से नाराज़ होकर उनकी हत्या कर दी, जैसे गांधी जी की हत्या की गई थी।

इजरायल की न्यायपालिका भी पक्षपाती है। सरकार बाहर से आये यहूदियों और ग़ैर फ़लस्तीनियों को हर तरह की सुविधा प्रदान करती है, लेकिन फ़लस्तीन के लोगों से अनेक गुना ज़्यादा टैक्स लेकर भी कोई सुविधा नहीं देती। फ़लस्तीनी इलाक़ों के प्राकृतिक संसाधन लूटे जा रहे हैं, बावजूद इसके वहाँ के नौजवानों में आज़ादी का जज़्बा क़ायम है। सारी दुनिया में फ़लस्तीन के हक़ में आंदोलन उठना बहुत ज़रूरी है और जैसे दक्षिण अफ्रीका को नस्लभेद से आज़ादी मिली, वैसे ही नस्लभेदी अमानवीय व्यवहार से फ़लस्तीन को भी आज़ादी मिलनी चाहिए। भारत ख़ुद अँग्रेज़ी दासता का शिकार रहा है। हमें पूरी शिद्दत से फ़लस्तीन के लिए आंदोलन करना चाहिए।

विनीत ने अपनी बातों के साथ फ़लस्तीन के तमाम फ़ोटो और वीडियो दिखाकर कहा कि मेरी इस यात्रा से मैं इज़रायल का पेचीदा षड्यंत्र और फ़लस्तीनी लोगों के हौसलों को कुछ समझ सका, साथ ही फ़लस्तीनी लोगों के सीने से लगकर उन्हें अपनी एकजुटता प्रकट कर सका। अगर फ़लस्तीन की सच्चाई लोगों तक पहुँचाने में और इंसाफ़ हासिल करने की उनकी लड़ाई में मेरी थोड़ी भी भूमिका हो सके तो यह यात्रा की कामयाबी होगी।

कार्यक्रम का संचालन सारिका श्रीवास्तव ने किया और आभार प्रदर्शन हरनाम सिंह ने किया।

– हरनाम सिंह

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