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धर्म/ज्योतिष

गीता में बताई कृष्ण की परवरिश की सीख: ये 5 जीवन-मंत्र बनाएंगे बच्चे को सफल

पेरेंट्स के लिए बच्चों की परवरिश उनकी लाइफ की सबसे अहम जिम्मेदारियों से एक है। हर पेरेंट्स की चाहत होती है कि उनका बच्चा अच्छा इंसान बने, सच्चाई और अच्छाई के रास्ते पर चले। लेकिन बच्चों को कुछ सिखाने के लिए उन्हें सिर्फ शब्दों में बोल देना ही जरूरी नहीं है, बल्कि आपकी तरफ से एक्शन भी जरूरी है। आसान शब्दों में कहें तो बच्चा अक्सर वही करता है, जो आपको करते हुए देखता है। आपका हर कदम, बच्चों के जीवन पर गहरा असर डालता है। भगवद गीता, जो जीवन का अद्भुत मार्गदर्शन देती है, माता-पिता को भी ऐसे अनमोल विचार देती है, जिनसे वे अपने बच्चों के चरित्र और सोच को पॉजिटिव दिशा दे सकते हैं। आइए, गीता के माध्यम से पॉजिटिव पैरेंटिंग के बारे में जाने।

रोल मॉडल बनें, तभी बच्चा सीखेगा

गीता के एक श्लोक में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि सच्चा ज्ञान उन्हीं से मिलता है, जिन्होंने जीवन के उद्देश्य को समझा है। पेरेंटिंग के नजरिए से इस श्लोक का अर्थ समझें तो बच्चों के जीवन में एक अच्छा आदर्श होना बेहद जरूरी है। माता-पिता खुद ईमानदारी, दया और विनम्रता अपनाएं, ताकि बच्चे भी इन गुणों को सीखें। जब आप सही उदाहरण पेश करेंगे, तो बच्चा बिना कहे ही उसी रास्ते पर चलने लगेगा।

स्वभाव के अनुसार काम करने की शिक्षा

'कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः

लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि।'

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि हर व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार ही काम करता है और उसे दबाना बेकार है। बच्चों को भी उनके स्वाभाविक गुणों के साथ ही आगे बढ़ने देना चाहिए। माता-पिता का काम है कि वे बच्चे को हर परिस्थिति में ईमानदारी और सच्चाई से काम करना सिखाएं। जब बच्चा अपने गुणों को सही दिशा में इस्तेमाल करना सीखता है, तो उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

सही मार्गदर्शन का महत्व

गीता के एक श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि आत्मज्ञान की प्राप्ति सिर्फ अपने प्रयासों से नहीं, बल्कि एक अच्छे गुरु के मार्गदर्शन से होती है। ऐसे में बच्चों के लिए भी यह जरूरी है कि उनके जीवन में ऐसा गाइड हों जो उन्हें सही रास्ता दिखा सकें। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को धार्मिक और नैतिक सिद्धांतों का महत्व समझाएं, ताकि वे अपने जीवन में सही फैसला ले सकें।

मन को दोस्त बनाना सिखाएं

'उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥'

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन इंसान का सबसे अच्छा दोस्त भी हो सकता है और सबसे खतरनाक दुश्मन भी। बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि वे अपने विचारों और आदतों को अच्छा बनाएं। माता-पिता का व्यवहार इसमें अहम भूमिका निभाता है, क्योंकि बच्चा उन्हें देखकर ही सीखता है। अगर माता-पिता ईमानदार और संयमित हैं, तो बच्चा भी वैसे ही बनेगा।

मानवीय मूल्यों का विकास करें

भगवान कृष्ण ने निर्भयता, दया, क्षमा, सच्चाई, संयम और शांति जैसे गुणों को दिव्य संपत्ति बताया है। माता-पिता को चाहिए कि वे इन गुणों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। जब बच्चा अपने घर में इन गुणों को रोज देखता है, तो वे उसकी सोच और स्वभाव में गहराई से बस जाते हैं, जिससे उसका चरित्र भी मजबूत बनता है।

 

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