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देश

देशभर की अदालतों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट नाराज, कहा– अब बनेगा आरोप तय करने का एक समान नियम

नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को देशभर की अदालतों में आपराधिक मामलों में आरोप तय करने में हो रही लंबी देरी पर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि यह देरी न्याय प्रणाली की दक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। कई बार आरोपी सालों तक जेल में बंद रहते हैं, लेकिन मुकदमा शुरू ही नहीं हो पाता। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि देशभर में कई ऐसे केस हैं, जिनमें चार्जशीट दाखिल हुए 3-4 साल हो गए, लेकिन मुकदमा शुरू ही नहीं हुआ। अदालत ने साफ संकेत दिया कि वह अब इस समस्या पर पूरे देश के लिए समान दिशानिर्देश जारी करने पर विचार कर रही है, ताकि इस प्रणालीगत देरी को समाप्त किया जा सके। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा को अमाइकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) नियुक्त किया है। साथ ही भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अटॉर्नी जनरल से भी इस विषय पर न्यायालय की सहायता करने को कहा गया है। अदालत ने बिहार राज्य के वकील को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया है।
पीठ एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपी करीब दो साल से जेल में था। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि चार्जशीट 2023 में दाखिल की गई थी, लेकिन अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं। इस पर जस्टिस अरविंद कुमार ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, "दीवानी मामलों में मुद्दे तय नहीं होते, आपराधिक मामलों में आरोप तय नहीं होते। आखिर कठिनाई क्या है? अगर यह स्थिति जारी रही, तो हम पूरे देश के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करेंगे।"
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 251(बी) में यह प्रावधान है कि सत्र न्यायालय के मामलों में पहली सुनवाई से 60 दिनों के भीतर आरोप तय किए जाने चाहिए, लेकिन अदालतों में इसका पालन नहीं हो रहा।

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