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बिज़नेस

US की राहत: फार्मा सेक्टर पर टैरिफ नहीं, बाजार में चमक सकते हैं फार्मा शेयर

वाशिंगटन

अमेरिका से गुरुवार को एक गुड न्यूज आई है. तमाम रिपोर्ट्स में ऐसा संकेत दिया जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप अपने फार्मा प्रोडक्ट्स पर 100% टैरिफ ऐलान से जेनेरिक दवाओं को दूर रख सकते हैं. US में बिकने वाली ज्यादातर दवाओं पर शुल्क लगाने के मुद्दे पर महीनों की बहस के बाद, ट्रंप प्रशासन ने कहा है कि वह विदेशी देशों से आने वाली जेनेरिक दवाओं पर शुल्क लगाने की योजना नहीं बना रहा है. बता दें ये भारत के लिए राहत भरी खबर है, क्योंकि देश से भारी मात्रा में ऐसे दवाओं का निर्यात अमेरिका को किया जाता है. इसके साथ ही इन रिपोर्ट्स के बाद फार्मा स्टॉक्स भी फोकस में हैं. 

जेनेरिक दवाओं रह सकती हैं टैरिफ से दूर!
वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक ताजा रिपोर्ट में ऐसे संकेत दिए हैं कि ट्रंप प्रशासन आने वाले हफ्तों में फार्मा टैरिफ को लेकर अपने रुख में बदलाव कर सकता है. इसमें कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ से अलग रख सकता है. बता दें कि ट्रंप द्वारा ब्रांडेड और पेटेंटेड विदेशी फार्मा प्रोडक्ट्स 100% टैरिफ लगाए जाने के ऐलान के बाद से ही जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ को लेकर काफी आशंकाएं और अटकलें चल रही हैं. रिपोर्ट के बाद शेयर बाजार में कारोबार के दौरान फार्मा स्टॉक्स में हरियाली भी देखने को मिल रही है. 

भारत को कहा जाता है ‘दुनिया की फार्मेसी’

आईक्यूवीआईए (IQVIA) नामक वैश्विक चिकित्सा डेटा एनालिटिक्स कंपनी के अनुसार, अमेरिका में फार्मेसियों में बेची जाने वाली कुल जेनेरिक दवाओं में से 47 प्रतिशत दवाएं भारत से आती हैं। अमेरिका के घरेलू निर्माता करीब 30 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं, जबकि बाकी हिस्सा अन्य देशों से आता है। जिसमें भारत की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी है। यही वजह है कि भारत को ‘दुनिया की फार्मेसी’ कहा जाता है।

वाइट हाउस का यू-टर्न

वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, यह कदम अमेरिकी वाणिज्य विभाग द्वारा चल रही दवाओं पर टैरिफ जांच के दायरे को सीमित करता है। अप्रैल में शुरू हुई इस जांच में पहले कहा गया था कि “जेनेरिक और नॉन-जेनेरिक दोनों प्रकार की तैयार दवाओं” के साथ-साथ दवा निर्माण में उपयोग होने वाले कच्चे माल (ड्रग इंग्रेडिएंट्स) को भी जांच के दायरे में रखा जाएगा।

लेकिन वाइट हाउस के भीतर इस पर भारी खींचतान देखने को मिली। ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (MAGA) गुट के कठोरपंथी सदस्य चाहते थे कि दवा निर्माण को वापस अमेरिका में लाया जाए और इसके लिए विदेशी दवाओं पर भारी टैरिफ लगाया जाए। उनका तर्क था कि यह “राष्ट्रीय सुरक्षा” से जुड़ा मामला है।

हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप की घरेलू नीति परिषद के कुछ सदस्य इस फैसले के खिलाफ थे। उन्होंने दलील दी कि यदि जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ लगाया गया, तो अमेरिका में दवाओं की कीमतें बढ़ेंगी और दवाओं की कमी भी हो सकती है। साथ ही, जेनेरिक दवाओं का उत्पादन भारत जैसे देशों में इतना सस्ता है कि भारी टैरिफ लगाने के बाद भी अमेरिकी उत्पादन आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं होगा।

ट्रंप की ‘टैरिफ पॉलिसी’ पर फिर सवाल

ट्रंप प्रशासन पहले भी अपने टैरिफ युद्धों के कारण आलोचनाओं में रहा है। चीन पर लगाए गए टैरिफ के बाद चीन ने अमेरिकी कृषि उत्पादों, खासकर सोयाबीन की खरीद बंद कर दी, जिससे अमेरिकी किसान बुरी तरह प्रभावित हुए। अब अमेरिकी सरकार को किसानों की मदद के लिए 16 अरब डॉलर की सब्सिडी देनी पड़ रही है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इन सब्सिडियों का असली बोझ अंततः अमेरिकी उपभोक्ता पर ही पड़ेगा।

एक किसान ने सोशल मीडिया पर नाराजगी जताते हुए लिखा, “सरकार हमसे पैसा वसूल रही है और वही पैसा हमें वापस दे रही है।” ऐसे में, ट्रंप प्रशासन ने शायद यह महसूस किया कि जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ लगाकर जनता को एक और “कड़वी दवा” नहीं दी जा सकती।

भारतीय दवाओं से अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली को मिली भारी बचत

अनुमानों के अनुसार, साल 2022 में भारतीय जेनेरिक दवाओं ने अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली को करीब 219 अरब डॉलर की बचत कराई। पिछले एक दशक में यह बचत 1.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई।

भारतीय कंपनियों की अहम भूमिका

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में सिप्ला, सन फार्मास्युटिकल्स और डॉ. रेड्डीज लैबोरेट्रीज जैसी भारतीय कंपनियों ने अमेरिका में कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लड प्रेशर, अवसाद, अल्सर और नर्वस सिस्टम डिसऑर्डर जैसी प्रमुख बीमारियों के इलाज के लिए दी जाने वाली दवाओं में आधे से अधिक प्रिस्क्रिप्शन सप्लाई किए। इनमें मेटफॉर्मिन (डायबिटीज), एटोरवास्टेटिन (कोलेस्ट्रॉल), लोसार्टन (ब्लड प्रेशर), और आम एंटीबायोटिक्स (एमॉक्सिसिलिन, सिप्रोफ्लोक्सासिन) जैसी दवाएं शामिल हैं, जो अमेरिकी मरीजों के इलाज में रोजाना उपयोग की जाती हैं।

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