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धर्म/ज्योतिष

भावनाएं हैं स्वास्थ्य की बैरोमीटर

स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है, वाली कहावत काफी पुरानी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी इस पर काफी बल देते हैं। यह एक जानी-मानी बात है कि यदि दिमाग में कोई परेशानी हो तो थोड़े समय बाद इसका प्रभाव हमारे शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है और हम जल्दी जल्दी बीमार होने लगते हैं। शरीर में होने वाली पीड़ा, मांसपेशियों का दर्द आदि बढ़ जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि हम जैसा सोचते हैं हमारा शरीर उसी के अनुकूल बनता है। हम जैसा महसूस करते हैं, जैसे काम करते हैं हमारा शरीर भी उसी ढांचे के अनुरूप बन जाता है। इसे ही प्रायः माइंड और बॉडी कनेक्शन कहा जाता है। जब हम तनाव में होते हैं, परेशानियों से घिरते हैं या बेचैन होते हैं तो हमारा शरीर इसका संकेत हमें देना शुरू कर देता है कि शरीर के साथ असामान्य स्थिति है। हममें से कई लोग अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने में सफल हो जाते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग तनाव के क्षणों में, विपरीत स्थितियों मे ओवर रिएक्ट करने लगते हैं। वह किसी भी बात को दिल से लगा लेते हैं। उन्हें जब लगता है कि वह कुछ भी कर पाने में सक्षम नहीं हैं तो वह तुरंत रोने लगते हैं, गुस्सा हो जाते हैं, उदासी उन्हें घेर लेती है और चिड़चिड़े हो जाते हैं। इस तरह के लोग परेशान होने के लिए बहाना ढूंढ़ते हैं। उनका यह चिढ़चिढ़ापन, अवसाद में रहने की प्रवृत्ति उनके शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालती है।

इसका असर उनके दिल-दिमाग पर ही नहीं शरीर पर भी दिखने लगता है। दरअसल, होता यह है कि जब आप तनाव में होते हैं या परेशान होते हैं उस समय अपने स्वास्थ्य के प्रति हम लापरवाह हो जाते हैं। तनाव के समय घूमने जाना, एक्सरसाइज करना, संतुलित भोजन लेना और डॉक्टर के निर्देेश के अनुसार दवाइयां खाना इन सब चीजों का रुटीन बिगड़ जाता है।

सवाल है इन स्थितियों से बचाव के लिए क्या करें? इसके लिए चिकित्सक एबीसी का फार्मूला अपनाने की सलाह देते हैं। ए का अभिप्राय है, अवेयरनेस यानी कोई भी समस्या जब पैदा होती है तो उसके प्रति हमें पूरी तरह से सजग-सचेत होना चाहिए। इसमें किसी की प्रेरणा हमारे लिए सहायक सिद्ध हो सकती है या हम अपना स्वयं का नजरिया सकारात्मक बनाएं जिससे हम समस्या को अपने पास फटकने से पहले ही उसे दूर भगा दें। बी यानी बैलेंसिंग यानी सही और गलत के बीच संतुलन कायम रखने की क्षमता का अपने भीतर पैदा करना। सी का अभिप्राय है कंट्रोल यानी विपरीत स्थितियों पर प्रतिक्रिया को नियंत्रण में रखना।

इन तमाम चीजों के अलावा हम पर हमारी भावनाएं हावी होकर हमारे स्वास्थ्य पर बुरा असर न डालें, इसके लिए जरूरी है कि हम संतुलित भोजन लें, समय पर भोजन करें और पर्याप्त नींद लें। किसी भी तरह का नशा न करें। अपनी समस्या को लेकर अपने आपको परेशानी में न रखें। नियमित शारीरिक व्यायाम करें। योगासन करें, मेडिटेशन करें। कुल मिलाकर शरीर को आराम पहुंचाने वाली गतिविधियां करें। जब कभी भावनात्मक दबाव में आएं और भावनाएं दिल-दिमाग पर इस कदर हावी होने लगें कि उनका आपके काम और रिश्तों पर नकारात्मक असर पडने लगे तो ऐसी स्थिति में किसी प्रोफेशनल की मदद लें। ज्यादा संवेदनशील होना किसी तरह की बीमारी नहीं है। यह अकसर कई लोगों के साथ होता है। एक खास अवसर पर ऐसा होना स्वाभाविक है।

काउंसलर किसी भी स्थिति से निपटने में हमारी मदद करते हैं। इसलिए उनसे मदद लेने में हमें कोई संकोच नहीं करना चाहिए। वह अति संवेदनशील लोगों को अपनी समस्याओं को लेकर ज्यादा परेशान न होने और उनसे निपटने के बेहतर उपाय सुझा सकते हैं। इन तमाम बातों के अलावा आप हर चीज के विषय में एक डायरी बनाएं, जिसमें कहां पर आप किस स्थिति में ओवररिएक्ट करते हैं उसमें नोट करें। इससे आपको अपनी समस्याओं के प्रति जागरूक होने में सहायता मिलेगी। याद रखें मानसिक समस्याएं धीरे-धीरे हमारे शरीर पर गलत असर डालती हैं और इसकी वजह से हमें कब्ज, डायरिया, कमर दर्द, भूख न लगना, मुंह सूखना, ज्यादा थकान लगना, हाई ब्लडप्रेशर से दर्द, अनिद्रा, गहरी सांस आना, गर्दन में दर्द, पसीना आना, पेट खराब होना, वजन बढना या कम होना जैसी तमाम समस्याएं आ सकती हैं इसलिए समय है सचेत हो जाइए। अपनी समस्याओं का असर अपने शरीर पर न पडने दें।

 

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