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मध्यप्रदेश

हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेश, नैतिकता पर नहीं बल्कि कानून पर होगा फैसला

जबलपुर

 हाईकोर्ट में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (हेबियस कॉर्पस) के एक मामले में हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई करते हुए अपने आदेश में कहा कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि वयस्क युवती को शादीशुदा व्यक्ति के साथ स्वेच्छा से रहने से रोका जा सके. नैतिकता के संबंध में न्यायालय कोई निर्णय नहीं दे सकता है. वयस्क होने के कारण युवती को यह अधिकार है कि उसे किसके साथ रहना है और इस संबंध में वह स्वयं निर्णय ले सकती है.

बेटी के घर छोड़ने पर दायर की थी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका

नरसिंहपुर निवासी पिता की तरफ से हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी. जिसमें कहा गया था कि उसकी बेटी को अनावेदकों ने बंदी बना रखा है. याचिका की सुनवाई के दौरान नरसिंहपुर पुलिस ने युवती को कोर्ट में पेश किया. पेशी के दौरान युवती ने युगलपीठ को बताया कि वह वयस्क है और वह उसी व्यक्ति के साथ रहना चाहती है. इसके कारण उसने स्वेच्छा से माता-पिता का घर छोड़कर उस व्यक्ति के साथ रहने चली गई थी.

शादीशुदा व्यक्ति के साथ रह रही युवती

याचिकाकर्ता की तरफ से हाईकोर्ट में तर्क दिया गया कि जिस व्यक्ति के साथ युवती रह रही है वह शादीशुदा है. इसलिए युवती को माता-पिता के साथ रहना चाहिए. इस संबंध में पुलिस ने कोर्ट को बताया कि जिस व्यक्ति के साथ युवती रहना चाहती है वह अपनी पहली पत्नी को छोड़ चुका है और तलाक लेने का प्रस्ताव रखा है.

'वयस्क युवती को निर्णय लेने का है अधिकार'

हाईकोर्ट जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि "वयस्क होने के कारण उसे यह अधिकार है कि वह निर्णय ले सकती है कि किस व्यक्ति के साथ उसे रहना है. उसके लिए क्या सही है और क्या गलत. वह यह खुद देख सकती है. ऐसा कोई कानून नहीं है कि उसे विवाहित व्यक्ति के साथ रहने से रोका जा सके. लेकिन यदि वह शादीशुदा व्यक्ति से विवाह करती तो यह अपराध की श्रेणी में आता है. ऐसी स्थिति में शादीशुदा व्यक्ति की पत्नी दूसरी शादी के संबंध में प्रकरण दर्ज करवा सकती है."

हाईकोर्ट ने डीएसपी को दिए निर्देश

युगलपीठ ने कहा कि युवती ने अपने माता-पिता के साथ रहने से इंकार कर दिया है. ऐसे में युगलपीठ ने डीएसपी गोटेगांव को निर्देशित किया कि वह कॉर्पस से इस संबंध में अंडरटेकिंग ले कि वह अपनी मर्जी से उस व्यक्ति के साथ रहना चाहती है. पुलिस संबंधित व्यक्ति से भी कॉर्पस को अपने साथ रखने के संबंध में अंटरटेकिंग ले. युगलपीठ ने अपने आदेश के साथ याचिका का निराकरण कर दिया.

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