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छत्तीसगड़

स्कूली बच्चों से ट्रांसफार्मर लगवाने का मामला: हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग को लगाई कड़ी फटकार

 

बिलासपुर

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आज RTE (शिक्षा के अधिकार) मामले में शिक्षा विभाग के ज्वाइंट सेक्रेटरी द्वारा प्रस्तुत शपथपत्र पर असंतुष्टि जताई है. प्रदेशभर में कई मान्यता प्राप्त स्कूल के संचालन समेत छात्रों की सुरक्षा को लेकर हाईकोर्ट ने गंभीर नाराजगी जताई है. सुनवाई के दौरान जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीड़ी गुरु की डबल बेंच ने स्कूली बच्चों से जनरेटर लगवाने, कक्षा के दौरान प्लास्टर गिरने समेत स्कूली बच्चों की सुरक्षा और स्कूल में सुविधाओं को लेकर भी जमकर फटकार लगाई है.

जानिए क्या है मामला?
दरअसल, प्रदेश के कई निजी स्कूल बिना किसी मान्यता के नर्सरी से लेकर कक्षा 8 वीं तक की पढ़ाई करा रहे हैं. इस मामले को लेकर विकास तिवारी ने जनहित याचिका लगाई है. याचिका उन स्कूलों के खिलाफ दायर की गई थी, जिन्होंने आरटीई कानून के तहत गरीब बच्चों को प्रवेश नहीं दिया, जबकि नियमानुसार वे इसके लिए बाध्य थे. आरोप यह है कि ये स्कूल बिना मान्यता के चल रहे हैं और सरकारी सब्सिडी लेकर भी नियमों की अनदेखी करते हुए मनमानी फीस वसूल कर रहे हैं.

दुर्घटना होगी तो जिम्मेदार कौन होगा? : हाईकोर्ट
शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव को अगली सुनवाई में स्वयं के शपथपत्र में बताने कहा कि प्रदेशभर में बिना मान्यता प्राप्त संचालित नर्सरी स्कूलों पर क्या एक्शन लिया गया है. कोर्ट ने सरकार से पूछा, कि छोटे-छोटे कमरों में बिना मान्यता के स्कूल चल रहे हैं, कोई बड़ी दुर्घटना होगी तो जिम्मेदार कौन होगा? मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीड़ी गुरु की डबल बेंच में हुई. इस मामले की अगली सुनवाई 17 सितम्बर को होगी.

मामले में पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि करोड़पति लोग पान दुकान की तरह गली-गली में बिना मान्यता प्राप्त स्कूल चला रहे हैं. कोर्ट ने इस मामले में जवाब मांगा था. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग से इस गंभीर लापरवाही पर जवाब मांगा और पूछा है कि आखिर ऐसे स्कूल संचालकों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

17 सितंबर तक देना होगा स्पष्टिकरण
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार और शिक्षा सचिव को निर्देशित किया कि वे 17 सितंबर तक शपथपत्र के माध्यम से स्पष्ट करें कि इस पूरे मामले में अब तक क्या कदम उठाए गए हैं. कोर्ट ने यह भी कहा है कि शिक्षा के अधिकार के तहत 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देना हर राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है.

प्रदेश भर के स्कूलों की दुर्दशा को लेकर सुनवाई में एक शासकीय स्कूल की मरम्मत में हुई गड़बड़ी की बात भी सामने आई. इसी तरह मुंगेली जिले के एक स्कूल में छत का प्लास्टर गिरने की खबर सामने आई, जिसपर कोर्ट ने डीईओ मुंगेली को आड़े हाथों लिया. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा, कि मुंगेली डीईओ क्या करते रहते हैं? क्या यह सब भी सिर्फ कोर्ट ही देखे? यह हमारा काम नहीं है.

ट्रांसफर लगवाने में स्कूली छात्रों से ली गई मदद
मामले की सुनवाई के दौरान तखतपुर के चना डोंगरी स्कूल का जिक्र किया गया, जहां पर बच्चे ट्रांसफार्मर उतारने, लगाने में विद्युत कर्मियों की मदद कर रहे थे. इस पर भी चीफ जस्टिस ने सवाल किया. इन सब मुद्दों पर स्कूल शिक्षा सचिव से नए शपथपत्र पर जवाब मांगा गया है.

इसी तरह एडवोकेट टी.के. झा ने भी सक्ती जिले के तमाम सरकारी स्कूलों को लेकर हस्तक्षेप याचिका दायर की है. इसके अनुसार जिले के 180 स्कूलों में शौचालय ही नहीं है. करीब 50 में पीने का पानी उपलब्ध नहीं है. कई स्कूलों में भवन नहीं हैं और 150 स्कूलों में अहाता (प्ले-ग्राउंड) नहीं है, बच्चे सड़क पर खेलते हैं, जो खतरनाक है.

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