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राजनीति

हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में मध्य प्रदेश BJP में गुटबाजी खत्म होगी?

भोपाल 

 

मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष पद पर हेमंत खंडेलवाल की ताजपोशी हो गई। कई दिग्गजों को दरकिनार करते हुए खंडेलवाल को कुर्सी दी गई है। वे आरएसएस की पसंद हैं। उन्हें कुर्सी थमाने वाले वीडी शर्मा आने वाले प्रदेशाध्यक्ष के लिए विरासत में कई कठिनाइयां छोड़ गए हैं। उधर, मुख्यमंत्री मोहन यादव भी डेढ़ बरस से कुछ ज्यादा समय के बाद भी कम्फर्ट नहीं हो सके हैं। दिग्गजों को साध नहीं पाये हैं।

दरअसल, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष पद के अनेक दिग्गज दावेदारों को दरकिनार करते हुए, हेमंत खंडेलवाल को यह कुर्सी सौंपें जाने की एक बड़ी वजह मुख्यमंत्री मोहन यादव को कम्फर्ट जोन देना भी माना जा रहा है। लेकिन खंडेलवाल पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के अध्यक्ष रहे, मध्य प्रदेश विधानसभा के मौजूदा स्पीकर नरेन्द्र सिंह तोमर के अहसान भी कम नहीं हैं।

कुर्सी संभालने के ठीक बाद, खंडेलवाल, चुनाव अधिकारी और केन्द्र सरकार में मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान, मुख्यमंत्री मोहन यादव और अन्य दिग्गजों की उपस्थिति में अपने पहले भाषण में शिवराज सिंह चौहान की तारीफ करते नजर आये थे। उन्होंने यह भी कहा था, ‘दायें-बायें, चलने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।’

हेमंत खंडेलवाल के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। मोहन यादव सरकार में मंत्रिमंडल का विस्तार इसी माह संभावित बताया जा रहा है। इसके अलावा राजनैतिक नियुक्तियां भी होना हैं। मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद से राजनैतिक नियुक्तियों का मसला पेडिंग है।

एक संभावना यह भी जतलाई जा रही है, विस्तार के वक्त कैबिनेट की कमजोर कड़ियों को बाहर किया जायेगा। एक मंत्री सहित चार-पांच मंत्रियों स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री एवं राज्यमंत्रियों की छुट्टी की जायेगी।

वर्तमान में मुख्यमंत्री सहित काबीना में सदस्यों की संख्या 31 है। इनमें, अनुसूचित जाति वर्ग से आने वाले जगदीश देवड़ा और ब्राम्हण वर्ण के राजेन्द्र शुक्ल उपमुख्यमंत्री है। कुल 18 मंत्री हैं, स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्रियों की संख्या 6 है और 4 राज्यमंत्री हैं।

मोहन यादव मंत्रिमंडल पर निगाह दौड़ाई जाये तो जातीय एवं क्षेत्रीय संतुलन का जबरदस्त अभाव है। मध्य प्रदेश में कुल 55 जिले हैं। इन 55 जिलों में 30 ऐसे हैं, जहां से एक भी मंत्री नहीं है। ऐसे में हेमंत खंडेलवाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी टीम बनाने के साथ-साथ मंत्रिमंडल विस्तार, राजनैतिक नियुक्तियों, दिग्गज और असंतुष्टों को साधने की होगी।

ये बात अलग है कि मंत्रिमंडल विस्तार और राजनैतिक नियुक्तियां तो छोड़िए, मोदी-शाह के दौर में कई मौकों पर बाबूओं की नियुक्तियों की लिस्ट को भी दिल्ली अमित शाह से ओके कराये जाने के बाद जारी किया जाता है। अच्छा हो या बुरा, दोनों ही सूरतों में मप्र नेतृत्व पर टकटकी सबकी लगी होती है। प्रतिक्रियाएं भी इसी मान से आती हैं। दिल्ली सब करेगा, लेकिन बात और आंच प्रदेश के अध्यक्ष पर भी तो आएगी, तय है। ऐसे में बुरा होने पर सबसे ज्यादा ठीकरा नए अध्यक्ष खंडेलवाल पर ही फूटेगा या फोड़ा जाएगा।

मध्य प्रदेश भाजपा अब पहले वाली भाजपा नहीं है। ये कबीलों में बंटी हुई है। मुख्यमंत्री बनने के बाद से मोहन यादव सीनियर्स को साधने में सफल नहीं हुए। वे अपना गुट भी अभी तक खड़ा नहीं कर पाये हैं। ऐसे में हेमंत खंडेलवाल के पास दिग्गजों को साधने के अलावा असंतुष्टों से निटपना बड़़ी चुनौती है। अनुशासनहीनता भी भाजपा के लिए राष्टीय स्तर का सिरदर्द बनी है। मध्य प्रदेश इससे अछूता नहीं है। विजय शाह का मामला सुप्रीम कोर्ट में पेडिंग है। विपरीत फैसला आया तो सबसे पहला ठीकरा हेमंत पर फूटेगा। लिखा जायेगा, उनके राज में मंत्री की काबीना से छुट्टी हुई, गिरफ्तारी हुई। हालांकि ऐसा कुछ होने की उम्मीद दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है।

मध्य प्रदेश भाजपा में अध्यक्ष पद के दावेदारों की सूची लंबी थी। अमित शाह की गुटबुक वाले बड़े नेता नरोत्तम मिश्रा इस पद के दावेदारों में सबसे ऊपरी पायदान पर थे। कई और नाम एवं चेहरे थे। हेमंत खंडेलवाल को इन सबको भी साधना है। चूंकि उन्हें मोहन यादव की मदद एवं रास्ता क्लीयर रखने की नीयत से मौका दिया गया है, लिहाजा उनकी जिम्मेदारी और भी बड़ी बन रही है।

डॉक्टर शैजवार मप्र विधानसभा में दिग्विजय सिंह के दौर में नेता विपक्ष रहे हैं। उमा भारती के कुर्सी छोड़ने के बाद मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार भी थे। मगर बाबूलाल गौर को सीएम बनाया गया था। शिवराज की ताजपोशी के वक्त जब उमा भारती अलग पार्टी बना बैठीं थीं तो शैजवार भी उनके साथ हो गए थे। इस घटनाक्रम के बाद उमा भारती की तरह भाजपा ने डॉक्टर शैजवार को भी घास नहीं डाली है।

ऐसे हालातों में हेमंत और मोहन की जोड़ी का शैजवार के यहां जाना और खबर जारी होने के निहितार्थ खोजे जा रहे हैं। पार्टी का एक धड़ा और संघ के कुछ नेता खुश नहीं हैं, ऐसी खबरें बाजार में चल रही हैं।

मप्र में कबीलों की बात को लेकर यह भी बता दें, यहां कैलाश विजयवर्गीय का अपना सबसे बड़ा गुट है। नरोत्तम की अपनी पैंचबंदी है। शिवराज सिंह चौहान, नरेन्द्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल, राकेश सिंह, गोपाल भार्गव और भूपेन्द्र सिंह की अपनी खेमेबंदी एवं लाइनें हैं।

चूंकि नए अध्यक्ष खंडलेवाल, शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र सिंह तोमर के कृपापात्र रहे हैं तो तमाम विरोधाभासों के बीच उन्हें इन दो नेताओं को तो सीधे-सीधे साधना एवं सुनना होगा। अध्यक्ष पद छोड़ने वाले वीडी शर्मा ने अपनी लाइन एवं लॉबी खड़ी की हुई है। हेमंत खंडलेवाल को मप्र भाजपा और भाजपा राज्य कार्यालय में वीडी शर्मा की छाया से मुक्ति की कवायद भी करना होगी। भले ही वे संघ की पसंद हैं। गुजरात (अमित शाह) को साधना भी उनके समक्ष, बांस पकड़े रस्सी पर करतब दिखाने वाली बालिका से कम चुनौती पेश आने वाली नहीं हैं।

कुल जमा, हेमंत खंडेलवाल की जब टीम बनेगी, बहुत कुछ साफ होगा। उनकी गाड़ी की दिशा और दशा के संकेत भी टीम के गठन से मिलेंगे।

सांसद, विधायक और प्रदेशाध्यक्ष 

हेमंत खंडेलवाल का चुनावी और पार्टी में अहम पदों पर रहने संबंधी सफर बहुत पुराना नहीं है। पिता की विरासत उनकी राजनीति का मुख्य आधार है। हेमंत खंडेलवाल,  अविभाजित मध्य प्रदेश से लेकर विभाजित मध्य प्रदेश तक भाजपा के आधार स्तंभों में एक रहे विजय खंडेलवाल के पुत्र हैं। विजय खंडेलवाल पुराने संघी थे। जब जनसंघ, जनता पार्टी और फिर भाजपा को कोई पूछा नहीं करता था, तब वे झंडा-डंडा उठाकर किला लड़ाया करते थे।

वक्त आया तो विजय खंडेलवाल कई बार बैतूल के सांसद रहे। नगर सेठों में उनकी गिनती हुआ करती थी। जनसंघ, जनता पार्टी और मप्र भाजपा को आर्थिक मदद एवं संसाधन वे मुहैया कराया करते थे। इसी वजह से पूछ-परख और बाद में पदों की मेहरबानी पार्टी ने की।

पिता विजय खंडेलवाल के निधन के बाद रिक्त हुई बैतूल सीट के लिए साल 2008 के उपचुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और तत्कालीन पार्टी प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर की सिफारिश पर हेमंत को टिकिट मिला था। चौहान-तोमर की जो़ड़ी ने पूरी ताकत झोंककर हेमंत को जितवाया था।

उपचुनाव जीतने के साल भर बाद वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में पार्टी ने खंडेलवाल को रिपीट नहीं किया था, यानि उन्हें टिकट नहीं दी गई थी। बीजेपी जीती थी, लेकिन खंडेलवाल और समर्थक दुखी हुए थे।

पार्टी ने 2010 में उन्हें बैतूल जिले के अध्यक्ष पद की कमान सौंपी थी। वर्ष 2018 में बैतूल सीट से विधानसभा का टिकट दिया गया। इसे डिमोशन करार दिया गया था। वे चुनाव जीते थे। साल 2023 के विधानसभा चुनाव में शिवराज और संघ की कृपा से टिकट पुनः मिली और जीतने में कामयाब रहे।

शिवराज की जगह, मोहन यादव मुख्यमंत्री बनाए गए। दो बार के विधायक होते हुए और तमाम संभावनाओं के बाद भी यादव काबीना में जगह नहीं मिलने पर खंडेलवाल और समर्थक फिर मायूस हुए थे।

मप्र भाजपा जैसे अहम पद पर नियुक्तियों ने स्पष्ट कर दिया कि पार्टी ने उन्हें बड़ा दायित्व सौंपने की सोच पहले से बना रखी थी।

सेतु और संतुलन बड़ा टास्क 

 मोहन यादव की पटरी दिग्गजों से बैठ नहीं रही है। काबीना बैठकों और सार्वजनिक मंचों पर स्वयं यादव और सीनियर्स लीडर्स के बीच तल्ख्यिां खुलकर नजर आयीं हैं। ऐसे में मोहन यादव के लिए निष्कंटक मार्ग बनाने की चुनौती पर हेमंत खंडेलवाल खरा कैसे उतरेंगे, इसे लेकर कई तरह की शंकाएं-कुशंसकाएं जताई जा रही हैं।

मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार अरूण दीक्षित ने हेमंत खंडेलवाल की ताजपोशी को लेकर ‘सत्य हिन्दी’ से कहा, ‘हेमंत खंडलेवाल को कुर्सी केवल उनके पिता के भाजपा और उससे कहीं ज्यादा संघ पर पुराने अहसानों (संकेत, वित्तीय मदद) की वजह से मिली है।

वे कहते हैं, ‘61 साल के हेमंत जनरेशन चैंज और मप्र में सवर्ण एवं खासकर, बनिया-बामनों से पार्टी की बढ़ती दूरियों को पाटने संबंधी गणित के मान से लाये गये हैं। इस कमी को कितना वे दूर कर पायेंगे, इसका नतीजा आने में वक्त लगेगा।’

अरूण दीक्षित यह भी फरमाते हैं, ‘मोदी-शाह को साधना, खंडेलवाल के लिए आसान नहीं होगा। खासकर अमित शाह की पसंद नरोत्तम मिश्रा को दरकिनार कर, व्याहा नागपुर खंडेलवाल की भोपाल लैडिंग, गले उतरने में वक्त लगेगा। कुल जमा कड़ी परीक्षा कई मोर्चो पर होगी, जिसे देखने में मजा आयेगा।’

खंडेलवाल को बड़ा सुकून कोई बड़ा चुनाव नहीं  

मध्य प्रदेश में अभी कोई बड़ा चुनाव निकट नहीं है। स्थानीय सरकारों के चुनाव होना है। सहकारिता चुनावों में भी खंडेलवाल की परीक्षा होगी। चूंकि वे को-ऑपरेटिव क्षेत्र के बड़े प्लेयर हैं, लिहाजा इस मोर्चे पर खरे उतरेंगे, ऐसा माना ज रहा है। लेकिन तमाम कोण एवं समीकरणों के मद्देनजर, पंचलाइन यही है, ‘हेमंत खंडेलवाल के लिए राह आसान नहीं है।’

फिलहाल तो कड़वा सच, यही है, ‘हेमंत खंडेलवाल के सिर कांटों का ताज सजा दिया गया है। वे इन कांटों को फूलों में कैसे बदलेंगे, और शूलों को ताज से कैसे हटायेंगे, या शूल की धार को कैसे कम करेंगे, सबसे जटिल एवं कठिन काम, खंडेलवाल के लिए यही होगा।’ 

 

 

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