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छत्तीसगड़

कृषि विज्ञान केन्द्र में मासिक कार्यशाला आयोजित

 बिलासपुर,

कृषि विज्ञान केन्द्र, बिलासपुर में आज बिलासपुर जिले के मैदानी स्तर के वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारियों व ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के साथ केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. अरूण कुमार त्रिपाठी के मार्गदर्शन में मासिक कार्यशाला सम्पन्न हुई। इस अवसर पर कृषि विभाग के उप संचालक पी.डी. हथेस्वर, उप संचालक उद्यानिकी, बिलासपुर कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. शिल्पा कौशिक, श्रीमती हेमकांति बंजारे, डॉ. अमित शुक्ला, डॉ. एकता ताम्रकार, इंजी. पंकज मिंज, डॉ. निवेदिता पाठक, उक, डॉ. स्वाति शर्मा उपस्थित थे।

       उप संचालक कृषि श्री हथेस्वर ने उपस्थित अधिकारियों से वर्तमान समय में ज्यादा बारिश के कारण उत्पन्न जल भराव की स्थिति की सतत् निरीक्षण कर धान एवं अन्य दलहन तिलहन फसलों पर होने वाले दुष्प्रभावों से बचाव के लिए किसानों को सलाह देने का निर्देश दिया। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष अब तक विगत वर्ष की तुलना में बिलासपुर जिले में 28 प्रतिशत ज्यादा वर्षा हुई है, जिससे दलहन एवं तिलहनी फसलों की बोनी का कार्य पिछड़ गया है, विगत 10 दिन से लगातार वर्षा होने के कारण धान के खेतों में भी ज्यादा जलभराव होने के कारण रोपा बहने तथा सब्जी वर्गीय फसलों के सड़ने तथा अनेक रोगों का प्रकोप होने की आशंका है। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. त्रिपाठी ने उपस्थित अधिकारियों से आग्रह किया कि धान की सीधी बोनी (उन्नत खुर्रा बोनी) करने वाले किसान वर्षा कम होने तथा उपयुक्त दशा में खरपतवार तथा पोषक तत्वों का प्रबंधन करें। डी.ए.पी. उर्वरक उपलब्ध न हो पाने की स्थिति में सिंगल सुपर फास्फेट या एन.पी. के. 12:32:16 उर्वरकों का प्रयोग करें। मस्तूरी विकासखंड में कुल 51 हजार हेक्टेयर धान के क्षेत्रफल में से 37 हजार हे. में उन्नत खुर्रा बोनी (DSR) तकनीक से धान की बोनी की गई है, जिसमें जमीन में वर्षा जल का अन्तःस्पंदन  ज्यादा होगा, मृदा संरचना में सुधार होगा तथा भू-जल स्तर में भी बढ़ोतरी होगी। जिले के कृषि विकास अधिकारियों द्वारा कपास, अरहर एवं धान की खेती में किसानों को आने वाली समस्याओं की जानकारी दी गई। वैज्ञानिक डॉ. अमित शुक्ला ने सब्जी वर्गीय फसलों की खेती में समुचित जल निकास सुनिश्चित करने की सलाह दी तथा खेतों में उंची मेढ़ बनाकर उसमें मिर्च, टमाटर, बैगन फसलों के रोपण की सलाह दी। श्रीमती हेमकांति बंजारे ने धान में खरपतवार नियंत्रण के बारे में जानकारी दी। जैसे पोस्ट इमरजेन्स (बुआई के बाद) फिनाक्सीप्रॉप इथाइल (250 मिली) (मेटसल्फ्यूरान मिथालक्लोडिनोफॉप इथाइल) 8 मिली/एकड़ छिड़काव करने से सकरी व चैड़ी पत्तियों वाले खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है। कुछ क्षेत्रों जहां पर मोथा खरपतवार ज्यादा पाया जाता है वहां पर पिनॉक्सीसुलम साइहेलोब्यूटाइल के मिश्रण को 1 ली./ एकड़ के दर से छिड़काव करें। कृषकों को खरपतवार नाशकों के उपयोग के लिए नफ्लेटफेन नोजल का प्रयोग करने की सलाह दी गई। डॉ. स्वाति शर्मा द्वारा धान नर्सरी में लगने वाले तना छेदक के नियंत्रण हेतु क्लोरट्रीनीलीपॉल (0.5 ml) या कार्टाफ हाईड्रोक्लोराइड 4G की 1 किग्रा प्रति 100 वर्गमी की दर से भुरकाव करें। सब्जियों में लगने वाले चुसक कीटों के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोरपीड 200 SL 0.5 मिली/लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। डॉ. निवेदिता पाठक द्वारा पोषण वाटिका में बेल वाली अन्य सब्जियों के बीज उपचारित करके लगाने की सलाह के साथ कद्दूवर्गीय सब्जियों के सहारा के लिए खूटा की व्यवस्था करने की सलाह दी। इंजी. पंकज मिंज द्वारा द्वारा खेती में मशीनीकरण हेतु छोटे-छोटे उपकरण जैसे खरपतवार नियंत्रण के लिए पावर वीडर, सब्जी बीज लगाने के लिए हस्त चलित डिबलर उपयोग करने की सलाह दी। अंत में डॉ. निवेदिता पाठक द्वारा धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कार्यशाला को समाप्त किया गया।

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