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धर्म/ज्योतिष

श्री जगन्नाथ की रथयात्रा में भाग लेने से मिलते हैं तीन महान पुण्यफल

जग के नाथ भगवान श्री जगन्नाथ बड़े दयालु हैं, वह अपने भक्तों की भावना को देखते हुए कृपा करते हैं। यदि कोई भक्त संकोचवश भगवान से कुछ भी न मांग पाए तो उसे भी प्रभु वैसे ही धन-धान्यपूर्ण कर देते हैं जैसे उन्होंने अपने मित्र सुदामा को किया था। भगवान को भक्त अति प्रिय हैं क्योंकि भगवान अपने भक्तों की भक्ति के वश में हैं। श्री जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव में लोग भक्तिभाव से भगवान के दर्शन पाने के लिए जाते हैं तथा अपनी खाली झोलियां भरकर ले आते हैं। भगवान को अभिमान पसंद नहीं है इसलिए अहंकार भाव को त्यागकर प्रभु के दास बनकर भगवान के दर्शन करने वाले को प्रभु बिना मांगे ही सब कुछ दे देते हैं। 

ब्रह्मपुराण के अनुसार, इस रथयात्रा के दर्शन करने मात्र से ही मनुष्य संसार के आवागमन से छूट जाता है। जो भक्तजन रथ की रस्सी का स्पर्श करते हैं अथवा पकड़कर खींचते हैं उन्हें सैंकड़ों अश्वमेध यज्ञों का फल मिलता है। जो भक्त भगवान की रथयात्रा के सम्मान में बड़े श्रद्धाभाव से खड़े होकर उनका दर्शन करते हैं, उन्हें प्रभु अपनी शरण में ले लेते हैं। संसार के सुख भोगने के पश्चात उन्हें मोक्षपद देते हैं।  

स्कंद पुराण के अनुसार जो लोग भगवान श्री जगन्नाथ जी के रथ की परिक्रमा करते हैं अथवा विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करते हैं, वे भगवान विष्णु के समान होकर वैकुंठधाम में वास करते हैं। जो लोग इस समय भगवान श्रीकृष्ण के नाम से दान देते हैं उनका थोड़ा सा दान भी मेरूपर्वत के समान अक्षय फल देने वाला होता है। जो लोग भगवान के रथ के आगे खड़े होकर भगवान को चंवर झुलाते हैं तथा किसी पुष्पों के गुच्छे अथवा वस्त्र से भगवान को हवा करते हैं, वह ब्रह्मलोक में जाकर मोक्ष को प्राप्त होते हैं। इसके अतिरिक्त जिस भी कामना से कोई भक्त इस रथयात्रा उत्सव में भाग लेता है उस पर भगवान की कृपा दृष्टि सदा बनी रहती हैं।  

पुरी से निकलने वाली रथयात्रा में भगवान श्री जगन्नाथ जी के रूप में भगवान श्री कृष्ण ही हैं, उनके साथ उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा जी होती हैं। इन तीनों श्री विग्रहों में भगवान श्री जगन्नाथ जी ही स्थित होते हैं। एक पौराणिक प्रसंग के अनुसार द्वारिका पुरी में एक बार माता रोहिणी भगवान श्री कृष्ण की ब्रज लीलाओं की चर्चा अंत:पुर की रानियों के साथ कर रही थी, उन्होंने द्वार पर सुभद्रा को बिठा दिया ताकि कोई पुरुष वहां न आ सके। उसी समय जब श्री कृष्ण और बलभद्र वहां आए तो बहन सुभद्रा ने तो उन्हें भीतर जाने से रोक दिया परंतु लीलाएं करने वाले भगवान ने दूर से ही माता रोहिणी की ओर से सुनाई जा रही ब्रजलीलाओं का श्रवण कर लिया। जिस कारण दोनों भाई जड़वत हो गए। उसी समय नारद मुनि वहां पधारे तथा उन्होंने भगवान श्री कृष्ण से उस दिव्य रूप को स्थापित करने की प्रार्थना की तो भगवान ने उन्हें नीलाद्री क्षेत्र में निवास करने का वचन दे दिया। माना जाता है कि भगवान श्री जगन्नाथ रथयात्रा नारद जी को दिए वचन का ही दिव्य स्वरूप है।

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