<?php /** * The template for displaying the header * */ defined( 'ABSPATH' ) || exit; // Exit if accessed directly ?><!DOCTYPE html> <html <?php language_attributes(); ?>> <head> <meta charset="<?php bloginfo( 'charset' ); ?>" /> <link rel="profile" href="http://gmpg.org/xfn/11" /> <?php wp_head(); ?> </head> <body id="tie-body" <?php body_class(); ?>> <?php wp_body_open(); ?> <div class="background-overlay"> <div id="tie-container" class="site tie-container"> <?php do_action( 'TieLabs/before_wrapper' ); ?> <div id="tie-wrapper"> <?php TIELABS_HELPER::get_template_part( 'templates/header/load' ); do_action( 'TieLabs/before_main_content' );
उत्तर प्रदेश

पनवारी कांड में 34 साल बाद 36 को सुनाई गई सजा…रो पड़े बुजुर्ग, भाजपा विधायक हुए थे बरी

आगरा
 उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के बहुचर्चित पनवारी कांड में आखिरकार 34 साल बाद न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय सामने आया है। मंगलवार को एससी-एसटी विशेष अदालत ने इस भयावह जातीय हिंसा के मामले में 36 आरोपियों को दोषी ठहराया है और 15 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। तीन आरोपी अब भी फरार हैं और उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए गए हैं। अदालत अब 30 मई को दोषियों को सजा सुनाएगी।

डाइनामाइट न्यूज़ संवाददाता के अनुसार, यह मामला 21 जून 1990 का है। जब आगरा के सिकंदरा थाना क्षेत्र के पनवारी गांव में जाटव समाज की एक बेटी मुंद्रा की बारात पहुंची थी। बारात नगला पद्मा से आई थी, जाट समुदाय के लोगों ने बारात को अपने घर के सामने से गुजरने से रोक दिया। इस बात को लेकर भारी विवाद हुआ और विवाद देखते ही देखते दंगे में तब्दील हो गया।

एक व्यक्ति की मौत

गांव में मारपीट, आगजनी और लूटपाट शुरू हो गई। कई घर जलाकर राख कर दिए गए। हालात इस कदर बिगड़े कि पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी। जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई। पूरा आगरा हिंसा की चपेट में आ गया और शहर में कर्फ्यू लगाना पड़ा।

पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे थे राजीव गांधी

इस जातीय हिंसा की गूंज दिल्ली तक पहुंची थी। तत्कालीन विपक्ष के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी खुद पीड़ितों से मिलने आगरा पहुंचे थे। उनके साथ तत्कालीन केंद्रीय मंत्री और आगरा के सांसद अजय सिंह भी मौजूद थे, जिन्होंने दोनों पक्षों से बातचीत कर हालात को शांत करने की कोशिश की थी।

स्थिति हुई बेकाबू, पुलिस को करना पड़ा बल प्रयोग
विवाद इतना बढ़ गया कि पुलिस को लाठीचार्ज और फायरिंग तक करनी पड़ी। गोली लगने से सोनीराम जाट की मौत हो गई। इसके बाद आगरा सहित आसपास के जिलों में तनाव फैल गया। दलितों और जाटों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ। प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए कर्फ्यू लगा दिया और सेना की तैनाती तक करनी पड़ी।

सड़कों पर उतारनी पड़ी थी सेना
पनवारी कांड आगरा का पहला ऐसा जातीय संघर्ष था जिसमें सेना को हस्तक्षेप करना पड़ा था। हालात इतने बिगड़ गए थे कि स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक तंत्र पस्त हो गया था। यह विवाद केवल पनवारी गांव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अकोला तक इसकी आग पहुंची, क्योंकि अधिकांश आरोपी अकोला क्षेत्र के ही रहने वाले थे।

मामला कागारौल थाने में 24 जून 1990 को दर्ज हुआ था, जब एक राहगीर की सूचना पर तत्कालीन थाना प्रभारी ओमपाल सिंह ने केस दर्ज किया। तब से लेकर अब तक इस केस में सुनवाई चलती रही। लंबी प्रक्रिया के बाद अब जाकर पीड़ितों को न्याय मिला है।

80 लोगों के खिलाफ चार्जशीट, 27 की हो चुकी है मौत

घटना के बाद 22 जून 1990 को तत्कालीन थानाध्यक्ष ओमवीर सिंह राणा ने राहगीर की सूचना पर 6000 अज्ञात लोगों के खिलाफ बलवा, जानलेवा हमला, आगजनी, लूटपाट और एससी/एसटी एक्ट समेत कई गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज की थी। जांच के बाद कुल 80 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। इनमें से 27 आरोपियों की अब तक मृत्यु हो चुकी है और तीन आरोपी अब भी फरार हैं।

भाजपा विधायक चौधरी बाबूलाल भी आरोपी बनाया

इस मामले में भाजपा विधायक चौधरी बाबूलाल भी आरोपी बनाए गए थे, लेकिन उन्हें वर्ष 2022 में एमपी-एमएलए कोर्ट से बरी कर दिया गया था। बाकी आरोपियों पर सुनवाई एससी-एसटी विशेष अदालत में चली। कोर्ट ने कुल 35 गवाहों के बयान दर्ज किए और सबूतों के आधार पर 36 लोगों को दोषी ठहराया है।

क्या था पनवारी कांड?

21 जून 1990. आगरा के सिकंदरा थाना क्षेत्र के गांव पनवारी में जाटव समाज की एक बेटी की बारात पहुंची थी. लेकिन जातीय तनाव उस वक्त उबल पड़ा जब आरोप है कि जाट समुदाय के लोगों ने बारात को अपने घर के सामने से गुजरने से रोक दिया. विवाद ने तेजी से आग पकड़ी और हिंसा भड़क गई. देखते ही देखते गांव में दंगे जैसे हालात बन गए. कई घरों को आग के हवाले कर दिया गया.

आगरा पहुंचे थे राजीव गांधी

मारपीट, लूटपाट और उपद्रव पूरे इलाके में फैल गया. हालात इतने बिगड़े कि पूरे आगरा शहर में कर्फ्यू लगाना पड़ा. इस जातीय हिंसा की गूंज दिल्ली तक पहुंची. तत्कालीन विपक्ष के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी खुद आगरा पहुंचे और पीड़ितों से मुलाकात की थी. उस समय आगरा से सांसद रहे अजय सिंह, जो केंद्र में मंत्री भी थे, उन्होंने दंगों को शांत कराने के लिए दोनों पक्षों से बात की थी.

कब-कैसे दर्ज हुआ मुकदमा

22 जून 1990 को सिकंदरा थाने में तत्कालीन एसओ ओमवीर सिंह राणा ने एक राहगीर की सूचना पर एफआईआर दर्ज कराई. 6000 अज्ञात लोगों के खिलाफ बलवा, जानलेवा हमला, एससीएसटी एक्ट और कई गंभीर धाराओं में लिखा गया. इसके बावजूद मौके से एक भी गिरफ्तारी नहीं हो सकी. पुलिस ने इस मामले की जांच के बाद कुल 80 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी.

हाई-प्रोफाइल आरोपी और कोर्ट

इस मामले में भाजपा विधायक चौधरी बाबूलाल भी आरोपी थे. लेकिन उन्हें साल 2022 में एमपी-एमएलए कोर्ट से बरी कर दिया गया था. अब कोर्ट ने बाकी आरोपियों के मामले में सुनवाई पूरी कर ली है. कोर्ट ने 35 गवाहों के बयान सुने हैं. सुबूतों की कसौटी पर 36 लोगों को दोषी करार दिया गया है. इनमें से 32 को कोर्ट ने तुरंत जेल भेज दिया, बाकी की सजा 30 मई को खुले अदालत में सुनाई जाएगी.

खुली अदालत में सजा का ऐलान

इस मामले में जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) बसंत गुप्ता ने कहा, "ये घटना 24 से 1990 दोपहर की है. अकोला गांव में लूटपाट और मारपीट की गई थी. यह घटना जाटव समाज के लोगों के साथ हुई थी. इसमे मुकदमा ओमपाल राणा ने लिखाया था. विवेचना के उपरांत 72 लोगों के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल हुई थी. इस दौरान 22 लोगों की डेथ हो गई. एससीएसटी अदालत ने आज 35 लोगों पर दोष सिद्ध कर दिया है. हालांकि, सबूतों के अभाव में 15 लोगों को बरी कर दिया गया है. सजा का ऐला 30 मई को खुली अदालत में होगा."

इन धाराओं में हुआ मुकदमा दर्ज

इन आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धाराएं 148 (दंगा), 149 (सामूहिक अपराध), 323 (मारपीट), 325 (गंभीर चोट), 452 (घर में घुसकर हमला), 436 (आगजनी), 427 (नुकसान पहुंचाना), 504 (उकसावे की भाषा), 395 (डकैती) और SC/ST एक्ट की धारा 3/2/5 के तहत आरोप तय हुए थे।

क्या बोले सरकारी वकील?

जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) बसंत गुप्ता ने कहा, “यह घटना 24 जून 1990 की दोपहर की है। अकोला गांव में जाटव समाज के साथ लूटपाट और मारपीट की गई थी। मुकदमा ओमपाल राणा की ओर से दर्ज कराया गया था। जांच के बाद 72 लोगों के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गई। अब 35 आरोपियों को कोर्ट ने दोषी माना है, जबकि 15 को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया है। 30 मई को खुले अदालत में सजा का ऐलान किया जाएगा।”

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button